संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: देश के अलग—अलग हिस्सों से आये आदिवासी समुदाय का जमावड़ा अगले चार दिनों तक दिल्ली में होगा। इसे आदिवासी कार्निवल का नाम दिया गया है। इस दौरान हमें आदिवासी संस्कृति,उनके परिवेश, उनका रहन—सहन, खानपान से रूबरू होने का मौका मिलेगा।दिल्ली पहुचे आदिवासियों की शिकायत है कि आयोजक न तो उनके खाने का इंतजाम ठीक से कर रहे हैं और न ही रहने का। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद मंगलवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में राष्ट्रीय जनजातीय कार्निवाल 2016 का उद्घाटन किया।
अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि आदिवासी लोगों के उनकी जमीन छीनने का किसी को अधिकार नहीं होना चाहिए। उनकी सरकार ने आदिवासी लोगों के कल्याण के लिए कई कदम उठाए हैं और उन्हें भूमि का अधिकार मुहैया कराने के लिए एक अभियान शुरू किया गया है। वनबंधु कल्याण योजना के तहत जनजातीय समुदायों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जा रही है और इस दिशा में काम किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने उन लोगों (आदिवासियों) के अधिकार ‘छीनने’ वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल देश में विविधताओं को संजोये रखना और इन्हें भारत की एकता के रूप में प्रदर्शित करना ही देश की ताकत को बढ़ाता है।
प्रधानमंत्री ने आदिवासी लोगों के योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि अगर किसी ने वनों को बचाया है, तो वे आदिवासी लोग ही हैं क्योंकि वन संरक्षण इस समुदाय की संस्कृति है। इस समुदाय ने कई तकलीफें झेलीं हैं। इसके बावजूद इन्होंने अपनी क्षमता से कठिनाईयों पर काबू पाया और आगे बढ़ते गए। पीएम ने कहा, ‘अभावों और काफी परेशानियों के बावजूद आदिवासी लोगों ने जीवन जीने का बेहतर तरीका अपनाया है। हर पल खुशियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना, संकटों में जीना, शिकायत ना करना और समूह में रहना आदिवासी समुदाय से सीखना चाहिए।’
जमीन छीनने का अधिकार किसी को नहीं
प्रधानमंत्री ने कहा कि आदिवासी पीढियों से वनों की रक्षा कर रहे हैं और आजीविका के लिए जमीन के छोटे छोटे टुकडों पर खेती कर रहे हैं। लेकिन उनके पास कोई जमीन का कोई कागज नहीं है। वे वहीं रह रहे हैं जो उनके पूर्वजों ने उन्हें दिया है। लेकिन नियमों में बदलाव के कारण आदिवासियों को अब कभी कभी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
मोदी ने कहा, ‘भारत सरकार राज्यों के सहयोग से आदिवासियों को जमीन के पट्टे देने का अभियान चला रही है। आदिवासियो को उनका हक मिलना चाहिए। ये हमारी प्राथमिकता है। आदिवासियों की जमीन छीनने का इस देश में किसी को अधिकार नहीं होना चाहिए.. उस दिशा में सरकार कठोर कार्रवाई करने के पक्ष में है।’ उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधन अधिकतर वन क्षेत्रों में मिलते हैं जहां आदिवासी रहते हैं। उन्होंने कहा कि विकास लक्ष्यों को हासिल करने के दौरान खनिज संसाधनों का इस प्रकार नहीं दोहन किया जाना चाहिए कि उन लोगों के हित प्रभावित हों।
उन्होंने कहा, ‘लौह अयस्क, कोयला निकालने की जरूरत है लेकिन ऐसा आदिवासी लोगों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।’ मोदी ने कहा कि विगत में जब लौह अयस्क और कोयला निकाला जाता था तब खनिज संपदा वाले क्षेत्रों के आदिवासी लोगों को इससे कभी फायदा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि उपकर लगाए जाने की योजना लागू किए जाने के बाद एकत्र राशि का उपयोग अब सुविधाओं के विस्तार में किया जा रहा है ताकि आदिवासियों को लाभ हो सके। इन सुविधाओं में बुनियादी ढांचा शामिल है।
मोदी ने विकास और जंगलों का संरक्षण साथ साथ किए जाने पर बल दिया। साथ ही उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए देश भर में 100 से ज्यादा र्बन (ग्रामीण.शहरी) सेंटर स्थापित किए जाने की बात की।
मोदी ने वनों के संरक्षण तथा प्रदूषण में कमी के लिए आधुनिक तरीके से खनन पर बल दिया वहीं आदिवासियों के उत्पादों के प्रभावी विपणन के जरिए उन्हें आर्थिक रूप से अधिकारसंपन्न बनाए जाने की भी बात की। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधन अधिकतर वन क्षेत्रों में मिलते हैं जहां आदिवासी रहते हैं। उन्होंने कहा कि विकास लक्ष्यों को हासिल करने के दौरान खनिज संसाधनों का इस प्रकार नहीं दोहन किया जाना चाहिए कि उन लोगों के हित प्रभावित हों।
खनन हो लेकिन पर्यावरण हो संरक्षित
प्रधानमंत्री ने कहा कि, ‘लौह अयस्क, कोयला निकालने की जरूरत है लेकिन ऐसा आदिवासी लोगों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।’ मोदी ने कहा कि विगत में जब लौह अयस्क और कोयला निकाला जाता था तब खनिज संपदा वाले क्षेत्रों के आदिवासी लोगों को इससे कभी फायदा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि उपकर लगाए जाने की योजना लागू किए जाने के बाद एकत्र राशि का उपयोग अब सुविधाओं के विस्तार में किया जा रहा है ताकि आदिवासियों को लाभ हो सके। इन सुविधाओं में बुनियादी ढांचा शामिल है। मोदी ने कहा कि सरकार अब उन्नत प्रौद्योगिकी पर जोर दे रही है जो यह सुनिश्चित करता है कि खनन के दौरान पर्यावरण पर गंभीर असर नहीं हो।
कलात्मकता को मिलेगा बढ़ावा
इस समुदाय की कलात्मकता की चर्चा करते हुए मोदी ने कहा कि जंगल की सामान्य चीजों जैसे – बांस से हमारे आदिवासी भाई-बहन ऐसी चीजें बनाते हैं कि अगर फाइव स्टार होटल में उन्हें जगह मिल जाती है तो लोग हैरान हो जाते हैं कि कैसे बना इसे बनाया गया होगा। वो ऐसी कई चीजें बनाते हैं लेकिन उनकी जितनी ब्रांडिंग होनी चाहिए, जितनी मार्केटिंग होनी चाहिए, उस दिशा में बहुत कुछ होना बाकी है।
गौरतलब है कि चार दिनों तक चलने वाले आदिवासी कार्निवाल के दौरान आदिवासी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का बड़े पैमाने पर पेश किया जाएगा और उन्हें बढ़ावा दिया जाएगा। परंपरागत सामाजिक-संस्कृति पहलुओं पर डॉक्यूमेंट्स की एग्जीबिशन, कला/कलाकृतियों की एग्जीबिशन, कल्चरल प्रोग्राम, खेल, पेंटिग और परंपरागत मेडिकल पद्धतियों की एग्जीबिशन आयोजित की गयी है। इसमें पूरे देश से
प्रगति मैदान के हॉल 7 में होंगे प्रोग्राम 600 जनजातीय कलाकारों और लगभग 8000 जनजातीय प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। प्रगति मैदान के हॉल नंबर 7 में 26 से 28 अक्टूबर, 2016 तक वर्कशॉप और एग्जीबिशन आयोजित की जाएगी।
रहने—खाने के इंतजाम को लेकर दुखी
झारखंड के अलग—अलग जिलों से कार्निवाल में भाग लेने आये कई प्रतिनिधियों ने बताया कि न तो उनके आने—जाने के ट्रेनों में पुख्ता इंतजाम किया गया और न ही दिल्ली में रहने का। उनका आरोप है कि सैकड़ों की संख्या में जनरल डब्बे में इन्हें लाया गया है। कई प्रतिनिधियों ने इससे खफा होकर रास्ते में ही दिल्ली न जाने का फैसला किया। दिल्ली पहुचे आदिवासियों की शिकायत है कि आयोजक न तो उनके खाने का इंतजाम ठीक से कर रहे हैं और न ही रहने का। गुरूद्वारा रकाब गंज में कई महिलाओं और पुरूषों को एक ही कमरे में जगह दी गयी है।




