ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व समेटे हुए है विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला

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ठाकुर संग्राम सिंह

धर्म, क्रम, अर्थ, व्यापार की उत्सव यात्रा का प्रतीक हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला का स्वर्णिम अतीत सम्मेलन प्रधान रहा है. यहां भारतीय विचारधराओं का सतरंगी वैभव, सूरज की प्रथम किरणों की तरह उदीत होता रहा है. गंगा व गंडक के संगम पर स्थित हरिहर क्षेत्र का अपना विशेष धार्मिक महत्व है. पुराणों में वर्णित इस जगह के बारे में कहा जाता है कि ब्रह्मा जी के पुरोहितों में यह देवताओं ने एक यज्ञ का आयोजन किया. कोई कारणवश यह यज्ञ विध्वंस हुआ, फिर देवताओं ने हर की स्थापना की और यज्ञ को सफल बनाया. तब से हरिहर क्षेत्र लोक के रूप में चर्चित हुआ. पद्म पुराण में यह भी वर्णन है कि साल ग्रामीण उत्तर हिमालय के दक्षिण की पृथ्वी महाक्षेत्र है. यहां बाबा हरिहरनाथ का मंदिर है. उसी स्थान पर भगवती, शालिग्रामी पतीत पावनी गंगा में आकर नारायण नदी मिलती है. अत: संगम क्षेत्र होने के कारण इस महाक्षेत्र का महातम बहुत बढ़ जाता है. यह भी कथा है कि नारायणी नदी तथा गंगा का संगम होने एवं महाक्षेत्र के अंतिम भाग होने के कारण ही यहां हरि और हर की स्थापना हुई.

गजग्राह की अन्य कथा
पुराणों में गजग्राह की विभिन्न कथाएं प्राप्त होती है. एक यह भी कथा है कि स्वेत दीप के सरोवर में श्री देवमुनि एक बार स्नान कर रहे थे, तभी एक गंद्रर्भ ने कौतुहलवश उनका पैर पकड़ लिया. मुनी ने क्रुध होकर श्राप दिया तु ग्राह (घरियाल) हो जा व तत्क्षण ग्राह हो गया. दूसरी ओर इंद्रधवण नामक एक राजा किसी गुफा में घोर तपस्या में लीन थे. संयोग से वहां ऋषिवर अगस्त जी पहुंच गये. तपस्या में लीन स्वाभिमानी राजा ने ऋषी का स्वागत सत्कार नहीं किया. क्रोधवश मुनि ने उन्हें श्राप दिया तू गज (हाथी) हो जा. एक समय वह गज गंडक के संगम पर पानी पीने गया. उक्त श्रापित ग्राह ने उनका पैर पकड़ लिया. चीर काल तक दोनों के बीच युद्ध होता रहा. अंत में हरि ने स्वयं आकर दोनों का उद्धार किया और उसी की परिणीति में हरिहर की स्थापना हुई. वह दिन कार्तिक पूर्णिमा का था. इसके अलावे सर्वश्रेष्ट महाकाव्य महाभारत में भी वेदव्यास ने गज और ग्राह की कथा का वर्णन विस्तार से किया है. जिसमें सुव्याख्त गजग्राह युद्ध का स्थल हरिहर क्षेत्र ही चिन्हित किया गया है. महामुनी नारद ने राजा पृथु को पद्मपुराण में 145 श्लोकों में हरिहर क्षेत्र की महत्ता, उत्पति इसकी साधना ने गया और प्रयाग से इसकी तुलना किया गया है.

हरिहर क्षेत्र शालिग्राम क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है. पुराणों के अनुसार शालिग्राम क्षेत्र के चारों दिशाओं में बारह-बारह योजना है. पद्मपुराण के पताल खंड में भी शालिग्राम महास्थल तथा शालिग्राम उत्पति का वर्णन देवी भागवत व ब्रह्मा प्राकृतिक खंड में दर्ज है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन गजग्राह युद्ध होने की वजह से हर वर्ष यहां एक महीने तक मेले का आयोजन किया जाता है. जिमसें देश के विभिन्न भागों से नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं. इसकी ऐतिहासिकता, धार्मिक महत्व की वजह से यह मेला विश्व का प्रसिद्ध मेला कहा जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन देश के विभिन्न भागों से सैकड़ों की संख्या में साधु-संत के अलावे विभिन्न धर्मालंबियों यहां टेंट और तंबू लगते है और पांच दिनों तक सनातन धर्म के अनुसार भजन, कीर्तन, कबीर पंथ के अनुवायी, सीख धर्म के अनुवायी आकर इस मेले की महत्ता में चार चांद लगाते है. हरिहर क्षेत्र मेला क्षेत्र में ही कई मठ-मंदिरों की श्रृंखला है. जहां श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा के दिन जलाभिषेक करते है. मुख्य जलाभिषेक का आयोजन बाबा हरिहरनाथ मंदिर में होता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा व गंडक का संगम स्थल होने के कारण यहां स्नान की पवित्रता को लेकर भी लोग श्रद्धा भाव से जुटते है. धार्मिक महत्व के अलावे करीब एक महीने तक व्यवसायिक कार्यों से भी हरिहर क्षेत्र मेला चर्चित है.
साभार: प्रभात खबर

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