काजा: आज फागुन 1 से रोपसंग पूणा का आगाज हो गया है। ज्ञात हो कि गत 14 जनवरी के दिन चंद्रा घाटी के नौ देवी-देवता अपने स्वर्ग प्रवास के लिए आज के दिन तक अपने अपने वास स्थान से स्वर्ग प्रवास में जाना माना जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में गुमंगतिग कहा जाता है। अर्थात नौ देवी-देवताओं का प्रवास माना जाता है।
दौराने गु मंगतिग ऐसा माना जाता है कि इन देवी-देवताओं के अनुपस्थिति में घाटी में प्रेत आत्मा़ओं एवं आसुरी शक्तियों का बोलबाला होना समझा जाता है। इसी लिए बड़े बुजुर्ग, बच्चों, महिलाओं एवं आमजनों को बाहर शोरगुल ना करने की हिदायत देते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये नौ देवी-देवता का सद परिवार अपने मुख्य राजा घेपन के साथ भोट देश से अनाजों का बीज लेकर आ रहे थे, तो सरचू या बारालाचा के आस पास राक्षसों से भयंकर युद्ध हुआ। राक्षस नहीं चाहते थे कि ये देवता अनाजों का बीज लेकर लाहौल जाए। सम्भवत: राजा घेपन के सद परिवार के साथ लाहौल आगमन तक यहां राक्षसों का ही समाराज्य रहा है। आते हुए बारालाचा के समीप भारी बर्फबारी के कारण देवी भोटी एवं ग्युंगडुल मरज्ञेद की देवी की मां जिन का नाम च़िशग कहीं बर्फ के दरारों में फंस कर रह गई थी। जिस का काफी दूरी तय करने तक किसी को भी पता ही नहीं चला कि इन की मां पीछे रह गई है। काफी देर बाद ध्यान में आया तो देखा कि मां तो साथ में है नहीं है,जरूर किसी मुसीबत में फंसी होगी। दोनों बहनें देवी भोटी एवं ज्ञ्युंगडुल अपनी मां को खोजने वापिस पीछे आकर देखते हैं तो मां कहीं बर्फ की दरारों में बुरी तरह फंसी हुई थी। दोनों बहनों ने मिलकर मां को बर्फ के दरारों से बाहर निकाला और अब मां को उठा कर आगे चलने की नौबत आई तो दोनों बहनों के बीच बात हुई कि मां को पीठ दिखाना तो अच्छी बात नहीं होगी।
चलो दोनों बहनें मां की ओर मुंह करके उठाएंगे और आगे वाली को कदम पीछे की ओर बढ़ाते हुए आगे चलना पड़ेगा, ऐसा आपस में फैसला करके चलने लगे तो थोड़ी दूरी तय करने पर दोनों बहनों की हंसी छूट गई।
दो वरदानों से जुड़ी है कहानी
इस पर उन की मां ने उन दोनों को खुश हो कर ये दो वरदान दिये जिसमें पहला वरदान दिया कि दुनिया में चाहे दु:खों का पहाड़ ही क्यों ना टूट जाए लेकिन इंसान की हंसी छूटनी नहीं चाहिए, इसीलिए कई बार किसी के मात्म के अवसरों पर भी हंसी वाली बात निकल जाए तो हंसना ही पड़ता है। दुसरा वरदान था कि देवी भोटी हर बर्ष नौ देवी-देवताओं का मंग आल्च़ी यानि कि स्वर्ग प्रवास से वापसी का स्वागत-सत्कार समारोह का शुभारंभ आदि काल से ही सबसे पहले देवी भोटी के गांव रोपसंग से पूणा के नाम से मनाया जाता है और तद उपरांत अन्य शेष देवी-देवताओं के वास स्थानों में बारी बारी से मनाया जाता है। यह पर्व देवी-देवताओं के स्वर्ग से वापसी की और आसुरी शक्तियों को खदेड़ने की खुशी में मनाया जाता है।
श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है पर्व
अत: इसी कड़ी में आज से चंद्रा घाटी के नौ देवी-देवताओं का राजा घेपन समेत स्वर्ग लोक से घर वापसी और आसुरी शक्तियों का अंत होने की खुशी को मनाने की परंपरा को रंगलो घाटी में पूणा पर्व की संज्ञा दी गई है। इस पर्व को चंद्रा घाटी में जहां जहां भी इन नौ देवी-देवताओं का वास स्थान है वहां बड़े हर्षोल्लास एवं आस्थापूर्वक पूणा त्यौहार मनाया जाता है। उम्मीद है भविष्य में भी इन देवी-देवताओं से सम्बंधित त्योहारों एवं पर्व को श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता रहे।
