पंचायत खबर डेस्क
गाजीपुर: दिल्ली सहित देश के कई ईलाकों में चिकनगुनिया और डेंगू का कहर जोरों पर है। लोग पपीता और उसका पत्ता ढूंढते फिर रहे हैं। लेकिन पपीता मिले भी तो कैसे आपने अपने घर के बाड़ी से पपीता को गायब कर दिया है। जबकि वैज्ञानिकों का मानना है कि पपीता न सिर्फ स्वास्थय के लिए लाभकारी है अपितु इससे किसानों को आर्थिक लाभ भी है। पपीता की खेती के प्रति किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र, पीजी कालेज गाजीपुर के चेयरमैन राजेश्वर प्रसाद सिंह के दिशा निर्देशन में केन्द्र के उद्यान वैज्ञानिक डा विनोद कुमार सिंह ने कृषि विभाग के सेवारत कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया। इस दौरान बताया पपीता बहुत ही पौष्टिक एवं गुणकारी फल है। किसान इसकी खेती अकेले या अमरूद, आम, बेर के पेड़ों के बीच खाली जगह पर भी कर सकते हैं।
पपीता को घर या उसके बाहर खाली पड़ी जमीन पर भी लगाया जा सकता है। पपीता लगाने के डेढ़ वर्ष के अन्दर फल मिलना शुरू हो जाता है। कम समय, कम लागत में अधिक पैदावार व अधिक आमदनी प्राप्त होने के कारण पपीता की खेती करना किसानों के लिए अधिक फायदेमंद है। इसके कच्चे फलों से पपेन एन्जाइम प्राप्त होता है। दोमट एवं बलुई मिट्टी में इसका उत्पादन सफलतापूर्वक किया जाता है। पौध से पौध व कतार से कतार से दूरी डेढ़ मीटर रखने पर 1742 तथा 2 मीटर पर 105 पौध प्रति एकड़ लगते हैं। पपीते की उन्नतशील प्रजातियां मधु, हनी, पूसा डेलिसियस, पूसा ड्वार्फ, पूसा नन्हा, सीओ-7, पीके-10 हैं। इसके अलावा मयूर, सूर्या पकफ्लैस्ड प्रमुख संकर किस्में हैं। एक एकड़ पौध रोपण के लिए मात्र 125 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। बीज को 3 ग्राम कैप्टान दवा प्रति किग्रा0 की दर से उपचार करके, 15 सेमी0 की दूरी पर 2 सेमी0 गहराई में लगाकर पौध तैयार करना चाहिए। पौध रोपण हेतु 2 ग 2 मीटर पर 50 ग 50 ग 50 के गड्ढ़े बनाकर उसमें सड़ी गोबर की खाद, मिट्टी या वर्मी कम्पोस्ट बराबर मात्रा में मिलाकर भर देना चाहिए। पौध को पाली बैग में भी उगा सकते हैं। 10 किग्रा0 सड़ी गोबर की खाद प्रति पौधा तथा 500 ग्राम अमोनियम सल्फेट सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटैशियम सल्फेट 2 एवं 4 के अनुपात में प्रति पौधा देना चाहिए। पपीता के प्रमुख रोगों में लीफकर्ल, मोजैक रोग से प्रभावित पौधों को निकालकर नष्ट कर दें तथा सफेद मक्खी चेपा की रोकथाम के लिए 2.50 मिली0 मैलाथियान 50 ईसी को 250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर दें। उपरोक्त तरीके के अपनाकर पपीते की खेती करने पर प्रति पौध 40 किलोग्राम तथा प्रति एकड़ 200 से 250 क्विंटल तक पैदावार मिल जाती है।
साथ ही मौसम अनुकूल होने के कारण समस्त सेवारत कर्मचारियों को यह बताया गया कि विकास खण्ड स्तरीय किसान मेले में उपस्थित किसानों एवं प्रक्षेत्र भ्रमण के समय किसानों को फलदार वृक्षों की खेती के प्रति अधिक से अधिक जागरूक करें, क्योंकि यह आय किसानों की अतिरिक्त आय होती है, जो आज के परिवेश के लिए किसान के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम के अन्त में समस्त कर्मचारियों द्वारा वृक्षारोपण कार्यक्रम भी कराया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारम्भ केन्द्र के सीनियर साइंटिस्ट एण्ड हेड डा दिनेश सिंह ने किया। प्रशिक्षण प्राप्त कर अधिक से अधिक किसानों को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया। इस कार्यक्रम में केन्द्र के डा डीके सिंह डाॅ0 सुनीता पाण्डेय सहित 24 प्रशिक्षणार्थी उपस्थित थे।

