घट गई है गंगा की जलधारण क्षमता

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अमरनाथ, वरिष्ट पत्रकार

गंगा की इस बाढ़ ने बड़ी समस्या को रेखांकित किया है। गंगा की जल धारण क्षमता काफी घट गई है। इसके कई कारण है। और परिणाम गरमी में पानी बहुत घट जाना तथा बरसात में धारा का उफन जाना है। इस साल दोनों स्थितियां प्रत्यक्ष हुई हैं। अभी भयावह बाढ़ की हालत है। बिहार के बीचो बीच से प्रवाहित गंगा के तटवर्ती सभी जिलों में बाढ़ आई हुई है। गंगा का पानी उन तटवर्ती इलाकों में भी प्रवेश कर गया है जहां आमतौर पर कभी पानी नहीं जाता था। उधर गर्मी की शुरूआत में ही गंगा में पानी इतना कम हो गया था कि फरक्का एनटीपीसी में बिजली का उत्पादन बंद कर देना पड़ा।

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसके लिए फरक्का बराज को सीधे तौर पर जिम्मेवार ठहराते हैं। उनका कहना है कि इस बराज से लाभ कम और नुकसान अधिक हो रहा है। केन्द्र सरकार बराज को हटाने पर गंभीरता से विचार करे। इसका तत्काल फैसला करना संभव नहीं हो तो केन्द्र सरकार खुले दिमाग के विशेषज्ञों को बिहार भेजकर गंगा की अवस्था का अध्ययन कराए और उसके पेट में जमा गाद हटाने का उपाय निकाले ताकि नदी की अविरलता बहाल हो सके। फरक्का बराज के निर्माण काल से ही गंगा के पेट में भारी मात्रा में गाद जमा होता गया है। जगह जगह टापू उभर गए हैं।

मुख्यमंत्री कोई नई बात नहीं कह रहे। समाजिक कार्यकर्ताओं का बडा समूह वर्षों से इसे उठाता रहा है। फरक्का बराज की वजह से गंगा की हालत ऐसी सर्पणी की तरह हो गई है जिसके मुंह को जकड़ दिया गया हो और छटपटा रही हो। नदी फूलती है, तटों की ओर फैलती है। अपने साथ आई सिल्ट को तल में छोड़ती है, तटों पर तेजी से कटाव करती है और बराज से फाटकों से फुंफकारती हुई निकलती है। हर बराज के साथ ऐसा होता है। फरक्का की हालत अधिक विकराल है। बिहार उसका शिकार है।

फरक्का बराज की डिजायन कलकत्ता बंदरगाह को सिल्ट मुक्त पानी देने के लिए हुआ है ताकि बंदरगाह के पास सिल्ट का जमाव खत्म कर नव्यता (जहाज चलने की क्षमता ) बनाई रखी जाए। अर्थात बराज गंगा के पानी को रोककर उसे यथासाध्य सिल्टमुक्त करके कलकत्ता बंदरगाह की ओर हुगली नदी में अतिरिक्त पानी भेजने की व्यवस्था की गई थी। गंगा की नव्यता का यह संकट दामोदर नदी पर बराज बनने से उत्पन्न हुआ था। पर फरक्का बराज से कथित तौर पर सिल्ट-मुक्त होकर आए पानी में भी सिल्ट होता है और बंदरगाह को हर साल सैकड़ों करोड़ खर्च कर ड्रेजिंग करानी पड़ती है। यह ड्रेजिंग बंदरगाह के पास होता है। फरक्का के उपर जमा सिल्ट की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है।

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गंगा में सिल्ट पहले भी आता था। पर गंगोत्री से आई प्रचंड वेगवान धारा गरमी के दिनों में भी उस सिल्ट की सफाई करती रहती थी। दामोदर की धारा उसकी सहायता करती थी। इस बारे में बराज के निर्माण के समय ही कलकत्ता के इंजीनियर कपिल भटटाचार्य ने विस्तार से लिखा है। उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया गया। बराज बनने के बाद गंगा की सिल्ट बहाने की कोई व्यवस्था नहीं रही। गरमी के दिनों में गंगा में पानी घट जाता है। लेकिन सिल्ट की सफाई नहीं हो पाती। बराज का अवरोध रहता है। सिल्ट नदी के पेट में जमता जाता है। नतीजा है कि फरक्का बराज के पास नदी का गहराई घटती गई और चोड़ाई लगातार बढती गई़ है। बराज के कई फाटक सिल्ट के भारी जमाव से जाम हो गए। उनसे पानी नहीं निकलता, ठहर जाता है। सिल्ट की वजह से बराज के उपर जगह जगह टापूनुमा संरचनाएं बन गई हैं। उनसे टकराकर बाढ़ के पानी का उलटा प्रवाह होता है। गंगा की सहायक नदियों-कोशी और गंडक आदि नदियों के पानी का विसर्जन थम जाता है, बल्कि उलटा प्रवाह होता है।

Farakka2WEBफरक्का बराज का पहला शिकार पशिचम बंगाल का मालदा और मुर्शिदाबाद जिला होता है। मालदा में 55 किलोमीटर और मुर्शिदाबाद में 104 किलोमीटर किनारा कटाव का शिकार है। पचासों हजार हेक्टेयर जमीन गंगा के गर्भ में समा गई है, ढाई लाख से अधिक लोग बेघर हो गए हैं। मालदा के सामने गंगा पार साहेबगंज जिले (झारखंड) में निकली जमीन पर दो-ढाई लाख कटाव पीड़ितों की बस्ती पनप गई है जिसे सरकारी भाषा में अवैध कहा जाएगा और वहां किसी तरह की जन सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसतरह की हालत बिहार में गंगा की लंबी धारा के दोनों तटों पर जगह जगह है। भागलपुर, मुंगेर से पटना जिले तक और उधर खगड़िया, बेगुसराय, समस्तीपुर, हाजीपुर से छपरा तक जगह-जगह लोग गंगा की छटपटाहट को झेल रहे हैं। मगर अफसोस है कि गंगा तट की समस्याएं मीडिया में यदाकदा ही आती है।

गंगा का कटाव पहली बरसात के बाद जून महीने में ही से आरंभ हो जाता है। उससे बचाव के लिए स्पर बनाए जाते हैं। पर स्पर स्वयं कटाव का शिकार बन जाता है। फिर नए स्पर बनाए जाते हैं. मगर विस्थापित आबादी का पुनर्वास नहीं होता। विडंबना है कि कोषी और दूसरी सहायक नदियों की बाढ़ के समाचारों से अखबार और सरकार दोनों हलकान रहते हैं, पर मूल कारक गंगा से होने वाले नुकसान को भूक्तभोगियों के अलावा कोई नहीं जानता, जनमानस में कोई समझ नहीं है। उन स्थलों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है जो गंगा से हर साल पीड़ित होते है।

गंगा अपनी शुद्धिकरण क्षमता के कारण विख्यात रही है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु होते हैं, जो विषाणुओं और अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को खत्म कर देते हैं। पहाड़ों पर तेज धारा के चलते नदियों का वेग बहुत अधिक होता है। इसी प्रचंड वेग में स्वयं शुद्धीकरण की प्राकृतिक व्यवस्था है। लेकिन गंगा जैसे जैसे हरिद्वार से आगे बढती जाती है, उसके प्राकृतिक गुण घटते जाते हैं और कानपूर में पूरीतरह समाप्त हो जाते हैं, प्रदूषित जल रह जाता है। इलाहाबाद में यमुना के माध्यम से चंबल का पानी आने पर नदी फिर पुनर्जीवित होती है। पर उसमें गंगाजल नहीं होता।

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बिहार में गंगा के मूल स्रोत गंगोत्री का जल नहीं आता। भीलंगना से लेकर कन्नौज, कानपूर तक बने बराज उसका सारा पानी निकाल लेते हैं। बिहार में बक्सर के पास प्रवेश के समय गंगा में चंबल और कर्मनाशा जैसी छोटी नदियों का पानी होता है और बनारस समेत कई शहरों का कूडा-कचरा और मैला पानी। बिहार में घाघरा, गंडक, कोसी आदि सारी नदियों से आए पानी को समेटकर गंगा आगे चलती है तो फरक्का बराज उसे रोक देता है। वहां पानी जमता है और फैलता है। इसतरह पानी का उलटा प्रवाह आरंभ होता है। तनिक पहले मिली कोशी पर तत्काल इसका असर पड़ता है। कोशी अत्यधिक सिल्ट लेकर चलने वाली नदी है। बिहार की दूसरी नदियां भी सिल्ट लाती हैं। तटबंधों से बंधी होने से सभी नदियां गंगा में भरपूर सिल्ट पहुंचाती हैं।

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