आलोक रंजन
पटना: कोरोना काल में महामारी के संक्रमण से बचाव के नुस्खे के रूप में उभरे बिहार के क्वारंटाईन सेंटरों से भांति—भांति की खबरें आ रही हैं। कहीं भोजन व व्यवस्था को लेकर मारामारी है। तो कहीं मास्क और साबुन की छीना झपटी। कहीं योगा क्लास चल रहा है तो कहीं से देशी गानों पर विदेशी डांस करते वीडियों वायरल हो रहा है। कहीं से यह भी खबर आ रही है कि दिन भर क्वारंटाईन हुए प्रवासी भले सेंटर में दिन बिता रहे हैं, रात बिताने परिवार के पास चले गए। इस बीच बिहार सरकार का स्वास्थ्य विभाग कोरोना संक्रमण के प्रति तो सतर्क है ही साथ ही जनसंख्या नियंत्रण के उपायों के प्रति भी खासी सतर्कता बरती जा रही है। यही कारण है कि बिहार में सरकार की तरफ से क्वारंटाइन सेंटर से घर लौट रहे मजदूरों को कंडोम के दो-दो पैकेट दिए जा रहे हैं।
कोरोना के साथ जनसंख्या नियंत्रण की कवायद
जब इस बाबत स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारियों से संवाचा गया तो उन्होंने कहा कि सरकार का ध्यान कोरोना महामारी के फैलाव को रोकने पर तो है, साथ ही सरकार यह भी ध्यान रख रही है कि जो प्रवासी बाहर से अपने घर लौटे हैं, वे जनसंख्या बढ़ोतरी में ज्यादा योगदान न दें। यही कारण है कि क्वारंटीन सेंटर से निकलते हुए उन्हें कंडोम के पैकेट दिए जाने की योजना बनाई गई है। जिन प्रवासियों को क्वारंटाइन सेंटर पर कंडोम का पैकेट नहीं मिल पा रहा है उन्हें आशा वर्कस घर-घर जाकर परिवार नियोजन किट दे रही हैं।
बिहार सरकार के दावों पर भरोसा करें तो लॉकडाउन के दौरान करीब 29 लाख प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों से अपने—अपने गांव लौटे हैं। सभी मजदूरों राज्य के अलग-अलग क्वारंटाइन सेंटरों में रखा गया है। लगभग 8 लाख 77 हजार मजदूरों ने क्वारंटाइन की अवधि पूरी कर ली है। ऐसे में उन्हें घर जाने की अनुमती है और बहुत सारे लोग अपने घरों में पहुंच गये हैं। जबकी अभी साढ़े पांच लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर राज्य भर में जिलास्तर, ब्लॉक और पंचायतों के क्वारंटाइन सेंटर में हैं। कोरोना क्वारंटाइन के नियमों को देखें तो 14 दिन के क्वारंटाइन पीरियड समाप्त होने के बाद भी इन्हें घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह निर्णय लिया गया कि क्वारंटाइन सेंटर में समय गुजार चुके सभी प्रवासियों को जनसंख्या नियंत्रण से जुड़े उपायों पर ध्यान दिया जाए क्योंकि इस दौरान इन परिवारों में जनसंख्या वृद्धि की संभावना ज्यादा है। इसलिए क्वारंटाइन सेंटर से घर जाने से पहले उनकी काउंसलिंग की जा रही है। साथ ही गर्भधारण रोकने के साधन भी उन्हें दिए जा रहे हैं. इसमें कंडोम, माला डी आदि हैं।
आशा कार्यकर्ताओं को अहम जिम्मेवारी
बिहार परिवार नियोजन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इसका कोरोना वायरस से कुछ लेना-देना नहीं है। यह एक रूटीन एक्सरसाईज है और विभाग द्वारा समय-समय पर परिवार नियोजन के अभियान चलाया जाता है। इस लिहाज से प्रवासी मजदूरों को शिक्षित करना भी स्वास्थ्य विभाग के अभियान का हिस्सा है। सरकार चाहती है कि राज्य में जनसंख्या नियंत्रित रहे। इसीलिए कंडोम बांटे जा रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक जबतक क्वारंटाइन सेंटर चलेंगे तब तक यहां के निकलने वाले मजदूरों को कंडोम दिया जाएगा। यदि कोई यहां से छूट जाता है तो डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग के दौरान आशा कार्यकर्ता उन्हें घर पर कंडोम के दो पैकेट दे रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि परिवार नियोजन विभाग इस प्रक्रिया को जून महीने के मध्य तक जारी रखेगी। वहीं केयर इंडिया के परिवार नियोजन समन्वयक अमित कुमार ने इस बाबत कहा कि घर-घर जाकर स्वास्थ्य की जांच करने के दौरान गर्भनिरोधकों यानी कंडोम का वितरण करना काफी आसान है। जिन्हें इसका लाभ क्वारंटीन सेंटरों में नहीं मिला, उनके घर कंडोम के पैकेट जल्द ही पहुंचा दिए जाएंगे।
इस लिहाज से देखें तो बिहार में चलाये जा रहे क्वारंटाइन सेंटर भले ही मजदूरों को कोरोना से बचाने के लिए बनाए गए हैं लेकिन यहां जो भीड़ इक्ट्ठी हुई है वो अपने—अपने आप में समाज शास्त्रीय विवेचना का अहम पड़ाव साबित हो रही है।



