संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: प्रसिद्ध पर्यावरणविद, जल संरक्षण कार्यकर्ता और देश में,प्रदेश में, गांव में पर्यावरण पर चर्चा करना हो,पानी पर चर्चा करना हो,ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा करना हो। कोेई लेख, इंटरव्यू चाहिए। विशेषांक तैयार करना है। संपादकिय पृष्ट पर लेख डालना है। विशेष पेज तैयार करना है। अखबारी दफतरों में वरिष्टों में पास अनेक नामों में एक महत्वपूर्ण नाम..अनुपम मिश्र से बात कर लो। हम जैसे पत्रकारिता के नवसिखुओं के लिए सहज भी। लेकिन सबसे मुश्किल था कि बिना गये बात नहीं होगी। तकनीकि के इस युग में वे मोबाईल रखते नहीं थे,और लैंड लाइन पर बात करने से अच्छा था, आमने- सामने जाकर बात कर लेना। टॉपिक चाहे पर्यावरण से जुड़े किसी भी विंदू पर हो,लेकिन सवाल के लिये रहें तैयार। ‘कितने खड़े हैं तालाब’ पुस्तक पढ़ी है। यदि नहीं पढ़ी तो जाते समय एक पुस्तक आपको इस स्नेह के साथ मिलेगा कि ले जाओ पढ़ो।
आज अनुपम मिश्र नहीं रहे। तड़के ही खबर मिली कि पिछले कई माह से बीमार अनुपम मिश्र का देहांत हो गया। जिसको जहां खबर मिली मानो वहीं ठहर गया। जो पहुंच सकते थे, वे अंतिम दर्शन को पहुंचने के लिए तैयारी में जुट गए। अनुपम मिश्र के पार्थिव शरीर को पूर्वाह्न 11 बजे गांधी शांति फाउंडेशन लाया गया जहां से उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई। उनका अंतिम संस्कार निगम बोध घाट में किया गया। उनको श्रद्धांजलि देने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक, समाजसेवी अौर राजनेता भी मौजूद थे।
इसके अलावा लोग सोशल मीडिया पर अपने अपने तरीके से अनुपम मिश्र को याद कर रहे हैं। शिवानंद तिवारी लिखते हैं..अभी व्हाट्सऐप पर खबर मिली।अनुपम मिश्र नहीं रहे।कुछ कहने के लिए शब्द नहीं है। विख्यात पर्यावरणविद् थे।या जल संरक्षण के हमारे पारंपरिक ज्ञान को दुनिया के सामने उजागर करने वाले अध्येता थे।आज के ज़माने में बग़ैर टीभी या मोबाइल फ़ोन या व्यक्तिगत सवारी का जीवन जीने वाले अनोखे जीव थे।उनके विषय में कुछ भी कहना पुरा नहीं पड़ता है। उस अनुपम भाई को श्रद्धांजलि। वरिष्ट पत्रकार प्रियदर्शन ने लिखा है, “स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस दौर में वे चिट्ठी-पत्री और पुराने टेलीफोन के आदमी थे. लेकिन वे ठहरे या पीछे छूटे हुए नहीं थे. वे बड़ी तेज़ी से हो रहे बदलावों के भीतर जमे ठहरावों को हमसे बेहतर जानते थे। ” वहीं ओम थानवी लिखते हैं,“हमारे समय का अनुपम आदमी – ये शब्द प्रभाष जोशीजी ने कभी अनुपम मिश्र के लिए लिखे थे। सच्चे, सरल, सादे, विनम्र, हँसमुख, कोर-कोर मानवीय। इस ज़माने में भी बग़ैर मोबाइल, बग़ैर टीवी, बग़ैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुरते-पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक। ‘गांधी मार्ग’ के सम्पादक। पर्यावरण के चिंतक। ‘राजस्थान की रजत बूँदें’ और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी बेजोड़ कृतियों के लेखक।”
इसके अलावा अनगिनत लोगों ने अपने-अपने तरीके से इस पर्यावरण विद को याद किया।
अनुपम मिश्र की महत्वपूर्ण रचनाएं
गांधी शांति प्रतिष्ठान के ट्रस्टी एवं राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि के उपाध्यक्ष अनुपम मिश्र की चर्चित किताबे हैं आज भी खरे हैं तालाब (1993) और राजस्थान की रजत बूंदें (1995),हमारा पर्यावरण’ देश में पर्यावरण पर लिखी गई एकमात्र किताब है । उनकी किताब “आज भी खरे हैं तालाब” की 13 भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पानी के संचय की लोक विधियों का ऐसा दस्तावेज है जिसमें यह बताया गया है कि कैसे बिना कुछ विशेष किए समाज अगर चाहे तो पानी को किस तरह सहेज सकता है और अपने वर्तमान एवं भविष्य को जल संकट से मुक्त कर सकता है। इतना ही नहीं विकास की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते समाज को कुदरत की क़ीमत समझाने वाले अनुपम मिश्र ने देश भर के गांवों का दौरा कर रेन वाटर हारवेस्टिंग के गुर सिखाए। इतना ही नहीं।अनुपम मिश्र ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने देश में पर्यावरण पर काम शुरू किया। जब सरकार के लिए पर्यावरण कोई चर्चा का विषय नहीं था और सरकार में पर्यावरण का कोई विभाग तक नहीं था। उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान में पर्यावरण कक्ष की स्थापना की.इसके साथ ही वे जीवन पर्यंत गांधी शांति प्रतिष्ठान से निकलने वाली द्विमासिक पत्रिका गांधी मार्ग का संपादन करते रहे।
मिश्र को पर्यावरण क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1996 में इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
