आलोक रंजन
रामनगर: काशी से इतर गंगापार रामनगर भी नगर परिषद के चुनावी समर में तप रहा है मगर इसकी तपिश आम मतदाताओं को महसूस हो ऐसा लग नहीं रहा है। इस सियासी जंग में चुनाव लड़ने वाले पूरा जोर लगा रहे है लेकिन मतदाता इस सियासी घमासान से दूर दिख रहे। न कोई मुद्दा है, न विकास के वायदे है, न पुराने हिसाब किताब की बात है, न सवाल है और न जबाब। सबसे बड़ी बात न कोई सत्ता है न विपक्ष। सब अपनी अपनी लड़ाई लड़ रहे है। नगर पालिका के अस्तित्वहीन होने के बाद रामनगर के लगभग 56 हजार मतदाता 35 उम्मीदवारों में से तीन पार्षद चुनने जा रहे है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक रामपुर वार्ड में सर्वाधिक 15 उम्मीदवार है तो गोलाघाट में 13 प्रत्याशियों के बीच जंग छिड़ी है। यही खासा दिलचस्प है कि जिस पुराना रामनगर में सर्वाधिक मतदाता है उस वार्ड में प्रत्याशियों की संख्या सबसे कम है। इस वार्ड में महज सात उम्मीदवार ही मैदान में है। पिछले पांच साल यहां नगरपालिका की सत्ता थी।
25 सभासद और पालिकाध्यक्ष लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। लेकिन अब पालिका रही ही नहीं तो पुराना हिसाब किताब ही मायने खो बैठा है। प्रत्याशी न मुद्दे उठा रहे है न समस्या। आम मतदाता उलझन में है कि पूछे तो किससे पूछे। हिसाब ले तो ले किससे। पुराने जनप्रतिनिधियों से वास्ता पड़ ही नहीं रहा। लगभग सारे प्रत्याशी जनता के सामने विकास के ही सब्जबाग और सुख दुःख में खड़े रहने के वायदे के साथ दंडवत है।
सीवर और जलनिकासी की समस्या से जूझ रहा है पूरा इलाका
पुराना रामनगर का कोदोपुर क्षेत्र में भी ऐसी ही समस्या है। मगर यह पब्लिक से जुड़ी हुई समस्या सुलझेगी कैसे इस पर कोई बात ही नहीं कर रहा। न तो मतदाता सवाल उठा रहे हैं और न हीं प्रत्याशियों के पास कोई ब्लू प्रिंट दिखाई देता है। मुद्दा तो यह भी बड़ा था कि रामनगर पालिका के साथ हुआ सियासी खेल किस साजिश के तहत हुआ। भाजपा उम्मीदवारों से यह उम्मीद करना कि वे इस पर बात करेंगें बेमानी ही होगी, लेकिन सपा और कांग्रेस भी कहीं इसकी चर्चा नहीं कर रहे है। जबकि गृहकर को लेकर आसमान सिर पर उठा लेने वाले नेता अब सीन में ही कहीं नहीं दिख रहे है। वे खुद ही अपने वर्चस्व की लड़ाई में उलझे हुए है। जबकि अब रामनगर के लोगों को गृहकर समेत निगम द्वारा लागू सभी कर देना होगा। लेकिन वोटों की जंग में ये मुद्दे हवा हो गए है।

रामनगर की यह सियासी घमासान जाति, धर्म, पैसे पर ही केंद्रित हो रही है। किस जाति के कितने वोटर है यह सबको अंगुलियों पर पता है। लेकिन किसी को यह पता नहीं है कि अपना सियासी जंग हार चुका रामनगर किस बिना पर अपने अस्तित्व को बरकरार रख सकेगा किसी को नहीं पता। जिनको हार का डर था, वर्चस्व को मिलने वाली चुनौती से डर था वे तो अपना काम कर गए। लेकिन रामनगर को ऐसे दोराहे पर खड़ा कर गए जहां से आगे जाने पर राजनीतिक बियाबान ही मुंह बाए खड़ा दिखता है।

