विपुल शर्मा
लोकसभा चुनाव 2019 का आगाज हो चुका है। सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनावों में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए अपनी—अपनी रणनीति पर काम करना शुरु कर दिया है। ऐसा माना जा रहा कि आगामी चुनावों में मतदाताओं तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया इन राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार साबित होगा। इसको देखते हुए राजनीतिक दलों के वार रूम 24 घंटे काम कर रहे है। और यहां मौजूद कर्मचारी आगे दिखने की होड़ में हर हथकंड़ा अपना रहे है। फिर चाहे फर्जी अकाउंट के माध्यम से टिव्ट् करना हो या किसी खबर को वायरल करना हो, यहां सब जायज है। इसलिए चुनाव आयोग भी सोशल मीडिया को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। आयोग ने फेक न्यूज और राजनीतिक विज्ञापनों को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है और नियमों का पालन नहीं करने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी जारी की है। भारत में सस्ती इंटरनेट दरों ने सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों को न केवल शहरी इलाकों में बल्कि ग्रामीण आंचलों में भी उतना ही प्रचलित कर दिया है। जानकारी प्राप्त करने के लिए लोगों की निर्भरता इंटरनेट पर बढ़ी है। वहीं ऐसा माना जाता है कि आडियो विजुवल माध्यमों का असर किसी भी व्यक्ति पर अधिक होता है। ऐसे में सही और गलत खबरोंं का आंकलन भी आज हमारे सामाने एक बड़ी समस्या बन गया है।
सोशल मीडिया के इस बदलते स्वरुप पर चिंता जाहिर करते हुए राज्यसभा सांसद अली अनवर का कहना है कि पिछले कुछ समय में देखा गया है कि सोशल मीडिया के माध्यम से धार्मिक उन्माद फैलाने का प्रयास किया जा रहा है। लोगों के बीच खाई पैदा की जा रही है, जो हमारी लोकतात्रिक प्रणाली के लिए अच्छी बात नहीं है। राजनितिक दल वोटों के लिए जनता को धर्म के नाम पर बांट रहे है और चुनावों के दौरान ऐसी घटनाओं में वृद्धि ही देखी जाती है। वहीं हाल में सेना को लेकर भी राजनीति हो रही है, सोशल मीडिया के माध्यम से युद्ध उन्माद फैलाया जा रहा है। राजनेता सैनिकों की वर्दी पहनकर प्रचार कर रहे है और बड़ी ही शान के साथ सोशल मीडिया पर प्रचारित कर रहे है। ऐसा नहीं होना चाहिए। सोशल मीडिया एक ऐसा सशक्त माध्यम बन गया है जहां एक साथ लाखों लोगों तक पहुंचा जा सकता है। ऐसे में यदि कोई गलत खबर इस पर प्रचारित होती है तो इसका असर भी बहुत विस्तृत होता है। कुछ राजनीतिक दल सम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के मकसद से इसका प्रयोग कर रहे है, एक वर्ग विशेष को निशाना बनाया जा रहा है। राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर पार्टियां चुनाव जीतना चहाती हैं, जिसके लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाया जा रहा है।
फेक न्यूज को रोकने के लिए कंपनियों की पहल
YouTube फेक न्यूज को रोकने के लिए ‘फैक्ट चेक’ नाम से एक नए फीचर की टेस्टिंग कर रहा है और जल्द ही इसे जारी भी कर दिया जाएगा। यूट्यूब इस फीचर को खासतौर से भारत के लिए तैयार कर रहा है। इस फीचर के आने के बाद से यूट्यूब विडियो पर पॉप-अप नोटिफिकेशन आएगा। यूट्यूब पर अगर कोई ऐसा विडियो है जिसे यूट्यूब अपनी पॉलिसी के मुताबिक गलत समझता है, तो वह यूजर को उस विडियो के प्ले होने के साथ ही विडियो से जुड़े तथ्यों को चेक करने के लिए पॉप-अप नोटिफिकेशन देगा। इसके साथ ही यूट्यूब अपने फैक्ट चेकिंग पार्टनर्स की मदद से उस विडियो से जुड़ी अतिरिक्त जानकारियों को भी हाइलाइट करेगा। करोड़ों यूजर्स और सस्ते इंटरनेट डेटा प्लान्स के कारण भारत यूट्यूब के सबसे बड़े मार्केट्स में से एक है। इसीलिए यूट्यूब अपने इस नए फीचर को इंग्लिश और हिंदी दोनों भाषाओं के लिए टेस्ट कर रहा है। ऐसे ही फेसबुक ने भी हाल ही में टीवी पर विज्ञापन जारी कर लोगों को फेक न्यूज के प्रति जागरुक करने का प्रयास किया है। विज्ञापनों के माध्यम से फेसबुक ने फेक न्यूज के संभावित खतरों से लोगों को आगाह किया है। एक और लोकप्रिय सोशल मीडिया टूल व्हॉट्सएप इन दिनों अपने प्लेटफॉर्म पर फर्जी खबरों पर नकेल कसने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है। कंपनी एक नए नोटिफिकेशन सिस्टम पर काम कर रही है, जो कि व्हॉट्सएप यूजर के लिए एक अलार्म की तरह काम करेगा। कंपनी का दावा है कि इस फीचर के रोलआउट होने के बाद यूजर जब भी किसी फर्जी खबर को दोस्तों के साथ शेयर करना चाहेंगे, तभी उनकी डिस्प्ले पर स्पैम मैसेज का पॉप-अप दिखने लगेगा। इतना ही नहीं, एक संदेश जो बहुत ज्यादा लोगों के बीच घूम रहा होगा, सिस्टम उसे डिटेक्ट कर बताएगा कि वो एक स्पैम संदेश हो सकता है। हालांकि इसमें सिर्फ उन्हीं संदेशों को शामिल किया जाएगा जो 25 से ज्यादा बार शेयर किए गए हैं। यदि आप ऐसे किसी संदेश को अपने मित्रों के साथ साझा करना चाहेंगे तो इसके लिए आपको ब्राडकास्ट लिस्ट का सहारा लेना होगा।
शिरोमणी अकाली दल सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने कहा कि लोकसभा चुनावों के दौरान सोशल मीडिया पर निगरानी का चुनाव आयोग का फैसला स्वागत योग्य है। आज सोशल मीडिया प्रचार के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण साधन है, इसलिए इसकी विश्वस्नीयता बनाए रखना बेहद जरुरी है। लेकिन समय के साथ सोशल मीडिया की विश्वस्नीयता को लेकर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो रहा है। जनता के बीच ऐसा संदेश जा रहा है कि इस माध्यम का प्रयोग लोगों को गुमराह करने और ब्लैकमेल करने के लिए किया जा रहा है। मेरा मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की आजादी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। लेकिन सच्ची खबरें ही जनता तक पहुंचे इसकी जिम्मेदारी भी हम सबकी है। ऐसे में इन माध्यमों की निगरानी बेहद जरुरी है।
यह तो तय है कि आगामी चुनावों में सोशल मीडिया की भूमिका बेहद अहम होने जा रही है, लेकिन फेक न्यूज से जुड़ी समस्या को रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकार और एजेंसियों की नहीं है। इस समस्या को खत्म करने में आम लोगों की भूमिका भी अहम हो जाती है। किसी भी खबर को यूं ही आगे बढ़ाने से पहले हमें भी उसकी सत्यता जांच लेनी चाहिए। इस समस्या से लड़ने के लिए सरकार के साथ—साथ आम लोगों को भी जागरुक होना होगा।