शहीदों की याद महज श्रद्धाजंलि हक के लिए बिलखता परिवा​र

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The Prime Minister, Shri Narendra Modi laying wreath at the memorial of Abdul Hamid, PVC, at Asal Uttar, in Punjab on November 11, 2015.

अमितेश सिंह, वरिष्ट पत्रकार

शहीदौं की चिताओं पर लगेंगें हर बरस मेले वतन पर पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा। देश पर कुर्बान होने वाले जांबाज बहादुर शहीदों के लिए कही जाने वाली ये बात भी अब शायद गुजरे जमाने की बात हो गयी।अब देश के लिए जान कुर्बान कर देने वाले शहीदों की याद महज साल में एक दिन ही शहादत दिवस पर ही श्रद्धाजंलि तक ही सिमट कर रह गई है। सरकार भी इन शहीदों के शहादत दिवस पर चंद कार्यक्रम कर सरकारी फर्ज निभा रही है।

The Prime Minister, Shri Narendra Modi laying wreath at the memorial of Abdul Hamid, PVC, at Asal Uttar, in Punjab on November 11, 2015.

बेशक शहीदों के परिजनों को अपने छोटे मोटे काम और हकों के लिए लालफीताशाही के सामने मजबूर होना पड़ रहा है। कहानी देश के परमवीर चक्र विजेता शहीद अब्दुल हमीद के परिजनों की है।वीर अब्दुल हमीद की एकलौती बेटी और दामाद को बकाया भुगतान के लिए पिछले दो सालो से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। मामला शहीद के दामाद अलाउद्दीन के रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले भुगतानों से जुड़ा हुआ है।vlcsnap-2015-09-23-22h40m06s4

दो सालों के बाद भी भुगतान न होने से परेशान परिजनों समेत वीर शहीद अब्दुल हमीद के बेवा रसूलन बीबी ने जिला प्रशासन से लेकर सीएम अखिलेश तक ईमेल के जरिये भुगतान की गुहार लगाई। लेकिन इस वर्ष परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद की शहादत का पचासवां वर्ष मनाने वाली सरकार को शहीद के परिजनों की ये समस्या अब तक समझ में नही आई है। जबकि भुगतान न होने से शहीद के बेटी दामाद के सामने घोर आर्थिक संकट खड़ा हुआ है।

मामला कुछ यूं है कि अब्दुल हमीद की बेटी नजबुन निशा के पति अलाउद्दीन 28 फरवरी 2014 को जिला ग्राम्‍य विकास अभिकरण गाजीपुर से लिपिक के पद से सेवा निवृत हुये। उनका पूरा कार्यकाल सराहनीय सेवा के रूप में अभिलेखों में अंकित है किन्‍तु उनका ए0सी0पी0, अवकाश का नकदीकरण, छठें वेतन का एरियर एवं ग्रेच्‍युटी का भुगतान आज तक नहीं हो पाया। बेटी दामाद द्वारा सिफारिश करते करते थक जाने पर स्‍वयं वीर अब्‍दुल हमीद की विधवा और नजबुन निशा की मां रसूलनबीबी ने एक मार्मिक ईमेल के जरिये 01 जून 2015 को प्रदेश के मुख्‍य मंत्री से शीघ्र भुगतान की फरियाद की। जिस पर जिलाधिकारी और मुख्‍य विकास अधिकारी स्‍तर से जबाब मांगा गया था।

गौरतलब है कि भारत पाक युद्ध के दौरान 10 सितम्बर 1965 को वीर अब्दुल हमीद कई पैटर्न टैंकों को नष्ट करने के बाद दुश्मन देश की गोलाबारी में शहीद हो गये थे। उनकी शहादत पर उन्हे भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से नवाजा। इस र्वष 10 सितम्बर को उनकी शहादत के 50 वर्ष पूरे होने पर देश में तमाम जगहों पर शहीद की याद में कई कार्यक्रम किये गये। गाजीपुर में उनके पैतृक गांव धामूपुर में भी अब्दुल हमीद की याद मे श्रद्धाजंलि कार्यक्रम हुआ।जिसमे उ.प्र. सरकार के कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव समेत कई काबीना मंत्रियों ने शिरकत की। इस दौरान शिवपाल ने शहीद के नाम पर गांव में सरकारी अस्पताल,पावर सब स्टेशन समेत उनके गांव को पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने की घोषणा की थी,लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इतने बड़े बड़े दावे करने वाली सरकार को शहीद की बेटी दामाद के भुगतान की समस्या कतई नजर नही आ रही है। शहीद के परिजनों की इस समस्या को लेकर जिला प्रशासन अपना पल्ला झाड़ते हुये मामला शासन पर थोप रहा है।इस मामले को लेकर सरकारी अमला एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल कर अपना पिंड छुड़ाने की फिराक मे लगा हुआ है।

देश के शहीदों के नाम पर केन्द्र और तमाम प्रदेशों की सरकारें समय समय पर बेपनाह वादे और दावें करती रही हैं,लेकिन ये सरकारी वादे और दावें महज राजनीति के खेल ही साबित बोते रहे हैं। सियासत की बिसात पर वीरों की शहादत भी महज मोहरे भर की हैसियत रख रही हैं। इन हालातों में शहीदों के परिजनों की समस्यायें मुफलिसी और उत्पीड़न की खबरे कभी कभी चर्चा का केन्द्र बन जाती है। लेकिन शहीदों के परिजनों के सम्मान और उनकी समस्याओं को लेकर सरकारें कतई गंभीर नजर नही आ रहीं हैं। वीर अब्दुल हमीद के बेटी और दामाद का ये मामला भी केन्द्र और प्रदेश सरकार की लापरवाही का नमूना है। शहीद के बेटी की इस समस्या के चलते जहां उसका परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है,वहीं शहीद के परिजनों के साथ लाल फीताशाही के इस रवैये से लोगों में रोष भी बना हुआ है। वीर अब्दुल हमीद की बेटी का ये मामला तो महज सरकारी अमले की लापरवाह कारगुजारी की एक बानगी भर है। तमाम शहीदों के परिजनों की मुफलिसी,उत्पीड़न और शोषण के मामले जब तब मीडिया की सुर्खियां तो बनते रहे हैं, लेकिन इन भुक्तभोगियों की गुहार और फरियादे सरकारी दरबार में सिर्फ नक्कारखानें में तूती की आवाज बन कर रह जाती है।

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