मनीष अग्रहरि
प्रधान मंत्री जी अपने मन की बात कार्य क्रम में कहते हैं “हमे आईटीआई चाहिए, आईआईटी नही। लेकिन ये क्या आईआईटी में भी हमारे ग्रामीण बच्चों ने बाजी मारते हुए 25 फीसदी सीट झटके हैं। हालांकि जनसंख्या अनुपात को देखे तो इनकी संख्या लगभग 65 फीसदी तो होनी ही चाहिए थी। एक रिपोर्ट के अनुसार एक अंग्रेजी अख़बार की यह खबर स्वतः ही ध्यान खींचती है कि “25फीसदी आई आई टी सीट्स गै्रब्ड बाई रूरल स्टूडेंट। मतलब आई आई टी में प्रवेश पाने वाले 25 फीसदी ग्रामीण है दरअसल में आई आई टी मुम्बई ने “ जेईई एडवान्स 2015” के नाम से एक रिपोर्ट जारी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक 25 फीसदी नव प्रेवेशी छात्र ग्रामीण क्षेत्रो से है। ये सभी छात्र अपनी शिक्षा हिन्दी माध्यम से लिए है। कहने की जरूरत नही कि इनमें से ज्यादातर हिंदी पट्टी के बीमारू राज्यों से होगे। रिपोर्ट आगे कहती है कि 250 छात्रो के पिता और तकरीबबन 900 छात्रो की मां अशिक्षित है। 1100 विद्यार्थियों के पिता मात्र दसवी जमात पास है। 1600 नव प्रेवेशी निम्न आय वर्ग से आते है। वही दूसरी तरफ 1500 छात्र ऐसे है जिनके पिता की आय आठ लाख रूपये वार्षिक से अधिक है। बड़ी स्पष्ट विषमता है 1600 छात्र निम्न आय वर्ग से है मगर लगभग 1600 यानि 1500 छात्रो के पिता की वार्षिक आय 8 लाख रूपये से भी अधिक है। इस आकड़े का सीधा मतलब है कि ज्यादातर विद्यार्थी जो आई आई टी के चोखट तक पहुच रहे है वह संभ्रान्त और धनवान परिवारो से ताल्लुक रख रहे है।
रिपोर्ट आगे बताती है कि 888 छात्रो के पिता खेती करते है। 232 छात्रो के पिता डाक्टर है। 466 छात्रों के पिता इंजीनियर है। 1548 छात्रो के पिता ब्यवसायी है। इसे हम इस तरह से भी पेश कर सकते है कि एैसे छात्र जिनके पिता डाॅक्टर, इंजीनियर या ब्यवसायी है उनकी संख्या का कुल जोड़ 2246(दो हजार दो सौ छियालिस) है। जब कि वही ऐसे छात्र जिनके पिता किसान है उनकी संख्या मात्र 888 है।आश्चर्य की बात है कि पिछले वर्ष आई आई टी में नव प्रवेशियों का यह आकड़ा महज दस फीसदी ही था। आगे यह कि देश का सबसे बड़ा जनसंख्या वाला सूबा उत्तर प्रदेश है। मगर यहां के छात्र राज्यस्थान के 1965 से कम मात्र 1259 की संख्या पर ही सिमट गये। क्या गजब बिषमता है। पहले आय की, फिर पेशे की, अंत में प्रदेश के प्रतिनिधित्व की। मगर इस विषमता में भी एक समता है, वह यह कि गांव के हल्कू गिनती में तो आगे है मगर शैक्षणिक नुमाइदगी में पीछे है।
जनगणना 2011 के आकड़ो के अनुसार 72.2 फीसदी जनसंख्या गांवो में बसती है। 27.8 फीसदी जनसंख्या शहरो में बसती है। प्रश्न उठता है कि आखिर आजादी के 68 वर्षो बाद भी गांव और उसके लोग संख्या में तो आगे है मगर आई आई टी के चैखट तक पहुचने मे क्यो पीछे है ?यह विषमता क्यो बरकरार है ? क्या गांवो में प्रतिभाओ की कमी है? मेरे विचार से तो एैसा कदापि नही है। हुक्मरानों की हसीन योजनाओं ने इतने दिन क्या किया ?
भला हो बिहार जैसे गरीब राज्य के आनंद कुमार जैसे सपूत का जो सुपर 30 नाम से प्रति वर्ष गरीब और मेधावी बच्चों की एक खेप आई आई टी में भेज रहे है। आनंद की यह सेवा बिल्कुल निः स्वार्थ है। सरकारी सेवा स्वांग है नही तो आंकड़े यह न होते । उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर शहर महात्मा महंत दास महिला (एमएमडीएम) कालेज की प्राचार्या डा ममता रानी के शब्दों में कहें तो वह यह कि-
“ वक्त आने से बदल सकती है पत्थर की भी तकदीर, शर्त इतनी है कि सलीके से तराशा जाये”
ग्रामीण बच्चो को अब तक सही से तराशा ही नही गया बस खोट यहीं है। इस बावत ग्रामीण क्षेत्रो में गरीबी उन्मूलन हेतु वित्तीय साक्षरता के प्रति कार्य कर रही संस्था एशियन इंटरनेशनल के वरिष्ठ प्रशिक्षक और ग्रामीण विकाश के छात्र रहे ठाकुर रूशिल सिंह कहते है “ग्रामीण क्षेत्रो में तो प्रतिभाओं का टोटा नही है मगर संसाधनों का जरूर टोटा है। इसके लिए सरकार को कोचिंग संस्थानों को गावों की ओर भी कूच करने के लिए कोई कंक्रीट प्लान तैयार करना चाहिए। प्लान के बाद मानिटिंरिंग भी अवश्य हो। सेकेडरी स्कूल के पाठ्यक्रम में निजी क्षेत्रो और सरकार के तरफ से मिलने वाले बेहतर स्कालरशिप योजना को शामिल करना चाहिए।”
निकुंज किश्वर याद आते है –
“ हम क्या करे जो अब इन्तजार न करे।
या यूं ही अपने दिल को बेकरार न करे।।
डनका दावा है कि कल, आज से बेहतर होगा,
चलो न आने वाले कल का इंतजार करे।”

