दीपक कुमार सिंह
कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। छठ की महत्ता किसी से छिपी नहीं। लोग दूर—दूर से अपने गांव में छठ मनाने आते रहे हैं। छठ में साफ-सफाई का खास महत्व है शहर में घाटों को साफ रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है लाखों-करोड़ों के वारे न्यारे हो जाते हैं, फिर भी वही शिकायत…सफाई नहीं हो पाती कुछ लोग यह सोचकर भी गाँव आ जाते हैं की व्रत को घर परिवार में विधान पूर्वक निभया जा सके लेकिन अब गांव भी बदले—बदले से हैं। वहां भी सामाजिकता सिमट रही है।
अब देखिये न हमारे गाँव बिराटपुर(सहरसा) में पहले चार-पांच पोखर का इस्तेमाल छठ पूजा के मौके पर किया जाता था। पर अब पोखर का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू हो गया है। मछली पालन हेतु अत्यंत गहरा खोद दिया गया है। किनारे में ही दस फ़ीट के आस पास पानी, लोग दुर्घटना से डरने लगे हैं गाँव में पोखर की अत्यधिक खुदाई हो जाने के कारण घाट खतरनाक हो गया है। ऐसे में दलान में ही तात्कालिक रूप से ही घाट का निर्माण। सामाजिक सरोकार प्रभावित हुआ है, इतना तो तय है। फलतः अपने अपने दरवाजे के सामने ही गड्ढे खोदकर छठ मनाने लगे हैं। डबल लेयर प्लास्टिक का इस्तेमाल, ना मिट्टी धंसने का डर, ना कीचड़ होने का। प्योर स्विमिंग पूल जैसा।
यह दृश्य भले ही इस गाँव का हो लेकिन बिहार के ज्यादातर गाँव में लोग इसी राह चल पड़े हैं। सार्वजनिक स्थानों का अभाव, सामाजिकता की कमी, आपस में बढती दूरियां…यानि शहर अपने तमाम मान्यताओं, कुरीतिओं, तथाकथित विकास के नारे को समेटे गाँव को अपने आगोश में लेने को तैयार है। शहर स्मार्ट होते जा रहे हैं और गाँव मॉडल। लेकिन सामाजिकता कम हो रही है।
फिर भी गाँव अभी कई मायनो में बचा हुआ है। शहर के फ्लैट में जिंदगी काटने के लिए जीना पड़ता है। स्टीरियोटाइप जिंदगी रेस्टोरेंट के बासी भोजन की तरह गुजारते जाईये। वही ऑटो, मिनी बस के साइलेंसर से उगलता जहर, ट्रैफिक की मारामारी और हर कोई टेंशन में। गाँव का शुकून हर दर्द का इलाज, बुजुर्गों का पैर छुएँ और पाएं आकाश भर आशीर्वाद। कमेंट भी प्यारा सा, जुग जुग जिय ! कोई बंदिश नहीं, पूरा गाँव आपका, आप पूरे गाँव के, नींद जल्दी खुले और आप भ्रमण पर निकल जाएँ। खुला वातावरण, साफ हवा, ताजगी का अहसास, हरी सब्जी, अपने खेत के चावल, मूंग की दाल, गेहूं के मीठे रोटी और गाय का दूध। आपको गाँव में जिंदगी से प्यार हो जायेगा। राजनीति सीखना हो तो गाँव अवश्य पधारें।
इसलिए वक्त का तकाजा है की गाँव को गाँव बने रहने दें। स्मार्ट शहर या मॉडल विलेज सिर्फ नारे न हों। हम पूर्णता के साथ इस नाते को उसके सही सन्दर्भ के साथ जमीं पर उतारें। इसी में ग्रामीण जीवन की सार्थकता है।

