धूम… धडाम…धो डाला… आइये आप हैं दिघवारा सारण के आरजेएस बॉक्सिंग क्लब में… रिंग के बाहर निर्देश देते गुरु और अंदर एक दूसरे को पटखनी देती लड़कियां।
ये दृश्य थोडा अलग है… रामभरोसे की बीवी आँख चौड़ी कर के देख रही है। लखन बाबू की मेहरारू तो गुस्से से तमतमाई हुई है… और गाँव के बाकी लोग बाग़ भी कान पर जनेऊ रख कर चल रहे हैं। उफ़… अन्याय होने वाला है। लड़की सब लड़का वाला खेल खेल रही है… विनाश काले विपरीत बुद्धि।
लेकिन फर्क न तो उन रिंग वाली लड़कियों को पड़ता है न ही उन्हें निर्देश दे रहे गुरु पर।
आरजेएस बॉक्सिंग क्लब इस इलाके का पहला बॉक्सिंग क्लब है और इसकी छात्राएं प्रियंका और वर्षा पहली लड़कियां हैं जिन्होंने चौखट से कदम बाहर निकाल कर सीधा रिंग की चौहद्दी के अंदर रख दिया…
खेल के दीवाने दो युवा रोशन सिंह और धीरजकान्त के सपनो का साकार रूप, ये बॉक्सिंग क्लब तब पहली बार चमका जब 2009 में महिलाओं की जूनियर लेवल पर आयोजित राष्ट्रिय बॉक्सिंग प्रतियोगिता में यहाँ से ट्रेनिंग प्राप्त कर रही लड़कियों वर्षा और प्रियंका ने पदकीय जीत हासिल की।
क्षेत्र के लड़के लड़कियों को राष्ट्रीय स्तर के खिलाडियों में बदलने को प्रयासरत रोशन और धीरज, दोनो लोगों ने शिक्षण और सूचना तकनीक का अपना जगमगाता करियर छोड़ कर इस बॉक्सिंग क्लब की स्थापना की थी। इस महगाई भरे दौड़ में भी महज 300 रूपये के रजिस्ट्रेशन चार्ज और 100 रूपये के मासिक शुल्क पर ट्रेनिंग प्रदान कर रहे इन दोनों ने समाज के गरीब तबके से आने वाले प्रशिक्षुओं के लिए प्रशिक्षण बिलकुल मुफ़्त कर रखा है। फिलहाल 13 लड़कियों समेत कुल 30 लड़के/ लड़कियों को स्पोर्ट्स स्टार बनाने में अनवरत् लगे हुए इस स्पोर्ट्स क्लब को अब तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली सिवाय स्थानीय राम जंगल सिंह कॉलेज में कुछ वर्गफुट जगह के।

लेकिन इस सब का आरजेएस बॉक्सिंग क्लब और यहाँ सीख रहे स्टूडेंट्स के जज़्बे पर कोई असर नहीं है… वो पहले भी मैरी कॉम और डिंगको सिंह की राह में आगे बढ़ने के सपने देख रहे थे और अब भी…

