भैंस पर सवार, वो सामाजिक चेतना का सूत्रधार

0
1382

अनुशक्ति सिंह

वो देखिये बिहार में सामाजिक चेतना के सूत्रधार आ रहे हैं, भैंस का सींग पकड़ा और कर ली सवारी…. इनका दावा है की इन्हें भैंस भी नहीं पटक पायी, तो और कोई क्या पटकेगा….. जी बात किसी और की नहीं, लालू प्रसाद की हो रही है। नब्बे के दशक का बिहार के एकछत्र नेता, जिसकी लोकप्रियता समाज के हर तबके में थी।bhais

१९७५ की सम्पूर्ण क्रांति के दौर से १९९० के जनता-दल के प्रतिनिधि के रूप में बिहार का सिरमौर बनने तक लालू आये, खूब आये… आते ही सामाजिक चेतना का नया बिगुल फूंका, इसके प्रभावी आवाज बनके उभरे। वो नेता जिसको सुनने के लिए सदियों से सामाजिक परिदृश्य से अलग रहे लोग, अपना झोला-झंडा लेकर सुदूर गाँवों से भी पैदल चले आते थे और जब उनका प्रिय नेता अपनी रौ में बोलना शुरू करता था कि ‘कैसे उसका बचपन भी उन्ही भैसों के बीच बीता और कैसे उसने ये मुकाम हासिल किया’ तो तालियों से आसमान गुंजायमान हो उठता था… इसी के साथ, बदलाव की नयी खुशनुमा बयार बहने लगी थी… धीरे-धीरे उठने वाले कदम अब उड़ रहे थे… दिन-भर थक कर दो जून की रोटी कमाने वालों को शिक्षा की नेमत से नवाजने के लिए ‘चरवाहा विद्यालय’ के सृजन की उद्घोषणा हुई… उसके नींव के पत्थर के भी डाले गए और प्रिय नेताजी का नाम भी स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। समाज की वो इकाई जो अब तक अपने होने की बात से अनजान थी, अब अपने वजूद की कीमत समझने लगी थी। वो दक्षिण टोला, जिसको मैला उठाने, मजूरी करने, चमड़ा बनाने, ताड़ी चुआने के अलावा अपनी महत्ता किसी और काम में नहीं दिखी थी, अब जिंदगी को नए सिरे से देखने के लिए तैयार हो रहा था… और जब ये सब चल रहा था लगभग ठीक उसी वक़्त मंडल कमीशन उपहारों की अपनी झोली लेकर साथ आ रहा था। सब सुन्दर था, सब विकासवान था लेकिन कहीं न कहीं कुछ लय में नहीं था… पहले से ही हिस्सों में बंटे समाज की आंतरिक खाई बढती जा रही थी। मतभेद ‘द्वेष’ का रूप लेता जा रहा था और खूनी रंजिशें अपना सर उठा रही थी… वो भैंस जिस पर की गयी सवारी की कहानी बता-बता कर नेताजी अपना वोट बैंक तगड़ा करते चले गए थे, उसी भैंस के हिस्से का अरबों-खरबों का खाना कुछ लोग गटक रहे थे और दोष की छींटे नेताजी पर भी आ रहे थे। सामजिक चेतना का वो नारा भी हलका पड़ रहा था और नेताजी सत्ता के मोह में फंसे पड़े, अपने बाद सामाजिक न्याय की बागडोर अपनी पत्नी को सौपी। उधर साल दर साल बीत रहा था और इधर अराजकता चरम पर थी। न सिर्फ सामजिक चेतना का नारा मध्यम पड़ रहा था बल्कि ये अब कुछ ही लोगों के हाथ की मलाई रह गया था… रोज भैंस चराकर, बकरी बांधकर, खेत कोड़कर, चमड़ा काटकर घर लौटने वाला ‘चरवाहा विद्यालय’ का वो संभावित छात्र पढ़ाई का ककहरा तो नहीं सीख पाया लेकिन उस विद्यालय की नीव ज़रूर दरक रही थी… इसके साथ विश्वास भी टूट रहा था। कभी उनकी एक आवाज़ पर अपने गाय-भैंस को बथान में छोड़ कर दौड़ पड़ने वाले लोग डरने लगे थे कि कहीं उनके पीछे कोई उनकी मवेशी ही न उठा ले जाए। हालांकि विकास पर दावा नेताजी ने अब भी नही छोड़ा है लेकिन जनता जनता ने पंद्रह सालों के बाद अब अपने लिए विकास का नया मसीहा चुनना श्रेयस्कर समझा । नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने—सुशाषण लाने और जंगल राज खत्म करने के वादे के साथ।bhaissssss
इनकी सामजिक चेतना वालों से खूब ठनी भी। दोनों ने अपने-अपने अलग दांव खेले थे। एक ने बिना समुचित शिक्षा के डिग्री प्राप्त करने का प्रबंध किया था तो दूसरे ने उन डिग्रीधारकों को बिना जांचे, परखे नयी पीढ़ी को पढ़ाने का जिम्मा देकर, इस शिक्षा प्रणाली पर मुहर लगा दी थी। गौरतलब रहे, चेतना की इस गलाकाट प्रर्तिस्पर्धा में भी चरवाहा विद्यालय की नींव दरक ही रही थी। स्कूल में आर टी इ भले लागू हो और पढाई का कानून बन गया हो लेकिन भैंस की सवारी अभी भी उसी पुरकशिश अंदाज़ में हो रही है। खैर समय बदला है, मौसम बदला है और इस चुनावी मौसम में विकास बाबू और चेतना वाले नेताजी एक-दूजे के सहयोगी बने पड़े हैं… अब तो अच्छे दिन भी जुमला हो गया है। वक्त ही बताएगा कि चरवाहा विद्यालय का नसीब कितना बदलता है और भैंस पर बैठे इस फोटो वाले बच्चे के घर तक भी उत्थान की अलख पहुँचती है या नहीं … ?

 फोटो: अजय कुमार

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here