संतोष कुमार सिंह
छपड़ा: का हो धीकल, कुनड़ी ना टूटी का। का टूटी कुनड़ी, लागत भी नहीं आ रहा है। अब 2 रूपये किलो कुनड़ी का भाव है, अगर तोड़ें भी तो का फायदा। जाड़ा हो या बरसात, सुबह से लगिए पूरा परिवार, तोड़िए, बोड़ा कसिए, आढ़त पहुंचाईये, और पता चला कि चार दिन कोई व्यापारी ही नहीं आया। बोड़ा का बोड़ा थाक लगा हुआ है और खरीदार ही नहीं है। अब ढुलाई खर्च करके आढ़त पहुचाने और घर का भी आंटा गीला करने से क्या फायदा। देख नहीं रहे हैं अलान पर कुनड़ी झबराया हुआ है पक गया है। ये तो है खेती-किसानी का हाल। ऐसे में जब किसान जब कर्ज के जाल में फस जाता है तो रास्ता क्या है उनके पास “ ख़ुदकुशी के सिवा”। नेतावों के घड़ियाली आंसू, कागज के कुछ टुकड़े।
जी हाँ, ये कहानी सारण जिले के बोधा छपरा की है. जहाँ के किसान भाई माथा पकड़ के बैठे हुए और अपने दिन को रो रहे हैं। रात में तो नींद आती नहीं, सुबह जब अपने कुनड़ी का अलान पर फैले कुनड़ी को देखते हैं तो उनका दुख और बढ़ जाता है।
काफी लागत आती है कुनड़ी की खेती में
यदि कोई किसान एक बिगहा कुनड़ी लगाता है तो उसे प्रति कट्ठा लगभग चार हजार रूपए की लागत आती है। इसमें लत्तर लगाने से लेकर,खाद पानी,कीटनाशक, बांस—बल्ली, मजदूर का खर्च। आम किसानों के वश की नहीं कुनड़ी की खेती। बावजूद इसके किसान कुनड़ी की खेती करते हैं क्योंकि एक बिगहा कुनरी लगाने पर एक सीजन में यदि रेट अच्छा रहा तो वो एक लाख रूपया लाभ कमा लेते हैं। आलू के खेत में ही कुनड़ी का लत्तर, और आगे चलकर आलू उखड़ने पर खीरा,आमदनी का अच्छा जरिया।
नौकरी कर सरकारी और खेती कर तरकारी। नौकरी तो आरक्षण लील लिया, मोटंजा की खेती गंगा जी। जब खेत ढ़हने लगे, अराड़ गिरने लगा तो लगा कि गांव के बूढ़—पुरनिया को शोक लग गया। कुछ घर में तो हरनाधा टंगा गया। लेकिन ऐसे में भी वो नौजवान बधाई के पात्र थे, जो दिल्ली पंजाब पलायन करने के बजाय गांव में ही सब्जी की खेती करना शुरू किए। जिसके पास जो भी जमीन बचा उसी सब्जी की खेती की बदौलत न सिर्फ अपने परिवार का भरन—पोषण किया बल्कि सान से माथा में पगड़ी बांध आढ़त जाते और वहां से नोट लाते। यदि कोई दिल्ली—पंजाब से कोई प्रवासी लौट कर गांव आता तो गांव के बुजुर्गों की यही सलाह होती कि क्या करना दिल्ली—पंजाब जाकर। यहीं कुनड़ी लगाओ और ठाठ से रहो। लेकिन आज किसान लेकिन आज गांव के बुजुर्ग अपने ही सलाह पर जार—जार बेजार हो रहे हैं। कुनड़ी का रेट इतना कम हो गया है कि खर्च निकालना भी मुश्किल। चिंता हो गयी है कि घर का खर्च कैसे चलेगा, और अगले साल क्या होगाा। गांव के वही नौजवान जो बुर्जुगों की सीख और लोक कवि घाघ की यह पंक्ति दुहराते नहीं भूलते थे,— उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान’ आज एक बार फिर से चाकरी की तलाश में गांव को छोड़कर पलायन को तैयार हैं, और इन खेतों में चाकरी करने वाले डेली खेतिहर मजदूर यह सोच कर परेशान है कि यदि खेती ही न रही, तो भीख के जरिए ही निदान ढूंढना परेगा। यहां न कोई मैप दिखता है और न ही कृषि रोडमैप ।
यह सिर्फ इसी गांव की कहानी, नहीं बल्कि सोनपुर से लेकर रिविरगंज तक के हर उस रोड किनारे के गांव की कहानी है, ईलाके की कहानी है जिन गांवों के खेत गंगा के कटाव में आ गये थे, और सरकार केवल बोल्डर बांध नेशनल हाईवे गाजीपुर से हाजीपुर को बचाकर इसे फोर लेन बनाकर बची खुची जमीन को सौदेबाजी का जरिया बना चुकी है, जिसपर व्यापारियों की गिद्ध नजर लगी हुई है।


