अधकचरा शहरीकरण, मीठे खेतों में जहर की राख

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रविशंकर रवि
जब भी गांव की चर्चा होती है तो मेरी स्मृति में अपना ननिहाल महेशामुंडा सजीव हो उठता है। महेशामुंडा बिहार के भागलपुर जिले में कहलगांव के निकट एक बड़ा गांव है। जहां मैंने गांव को जीया है, मधुर स्मृतियां, कई तरह के अनुभव मिले। इसलिए वह गांव मुझे हमेशा खींचता था। लेकिन कुछ वर्ष पहले वहां गया तो मेरा मन रोने लगा। गांव बर्बाद हो चुका है। जिन खेतों में गन्ना उपजते थे, वहां पर एनटीपीसी का मुख्य प्लांट बन गया है। उससे निकलने वाला धुआं और राख कई मील तक खेतों में पसर गई है। प्लांट के पास एक नया शहर, नई कालोनी बन गई है। अच्छी दुकानें, सड़कें, कार, बाइक सब कुछ है। लेकिन ये सब महेशामुंडा, खुटहरी जैसे कई गांवों की कब्र पर बने हुए हैं।
एनटीपीसी में जमीन गई तो अचानक ढेर सारा पैसा मिला। किसान इतने पैसे का क्या करते, उनके पास निवेश की कोई योजना नहीं थी। व्यापार करने का अनुभव नहीं था। किसी ने महल बना लिया, तो किसी ने कार खरीद ली। पैसा आया तो व्यसन भी आया। गांव के बाहर शराब की दुकानें खुल गईं। बाहर से काफी लोग आए तो उनके संस्कार भी आए। इलाके का अधकचरा शहरीकरण हो गया। कुछ दिनों में पैसा खर्च हो गया, उधर जमीन चली गई थी जिससे हर साल अनाज मिल जाता था। कुछ खाते थे, कुछ बेचते थे। जो खेत बचे, उनमें उपज कम हो गई। कुछ ही लोगों को नौकरी मिली। किसानों के जवान बेटों के पास सिवा नौकरी के कोई उपाय नहीं है। जो खेतों के मालिक थे, वे एनटीपीसी के लिए काम करने वाली निजी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। कुछ ने ठेकेदारी आरंभ कर दी। गन्ना मिल बंद हो गए है। लोग किसी तरह जी रहे हैं।

छत पर कपड़ा सुखाने से काला हो जाता है। कमरे के अंदर काली राख की परत जम जाती है। हालांकि अब गांव जाने के लिए पैदल नहीं चलना पड़ता। पक्की सड़क बनी तो रिक्शा, ऑटो चलने लगे। लेकिन किसान को खेत चाहिए, उसके बाद ही कुछ और। मैं सोचता हूं कि विकास होना चाहिए, बिजली भी चाहिए, लेकिन किसी प्लांट को लगाने के लिए उपजाऊ भूमि ही क्यों चाहिए। यह तो बंजर भूमि पर भी लगाया जा सकता था।
महेशामुंडा गांव में कई टोले हैं। यह गांव कभी मीठे गन्ने की खेती के लिए विख्यात था। ऊंची जमीन पर गन्ने के खेत कहलगांव ब्लॉक तक फैले थे तो गांव के दूसरी ओर नीचली जमीन पर कोआ नाला तक धान, चना, मसूर, मटर तथा गांव से सटे इलाके में मकई (भुट्टा), महुआ और सब्जियों की खेती थी। गांव तक जाने के लिए भले ही पक्की सड़क नहीं थी। बरसात के दिनों में कीचड़ से भरी घुमावदार सड़क पर बैलगाड़ी चलना भी मुश्किल होता था। तब यातायात का एकमात्र साधन बैलगाड़ी थी। लेकिन पैदल या साइकिल के लिए एक रास्ता बीच से गुजरता था।

गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं थे। केवल निम्न बुनियादी स्कूल था, जहां कक्षा तीन तक पढ़ाई होती थी। हमलोग घर से बोरी लेकर जाते थे। बावजूद गांव में खुशी थी, अपनापन था। फसल कटाई के समय पूरे गांव में चहलपहल रहती थी। आम के बड़े-बड़े बगीचे थे। नाना की जमीन ऊंची भी थी और नीची भी। मैं स्कूल जाते वक्त गन्ना तोड़ता और उसे चूसते हुए स्कूल जाता। छुट्टी के दिन दूर के खेतों में चला जाता, मटर की छिमी तोड़ता, खाता और गमछे में बांध लाता या फिर चने की झंगरी उखाड़ता और कोआ नाला के पानी में उस धोकर हरा चना टूंगता हुआ आता। दरवाजे पर लगे नीम, महुआ और जामुन के पेड़ और उनके पास बना गोहाल। बड़े और मस्त बैल सुबह चार बजे से नाद में बांध दिए जाते क्योंकि छह बजे तक उन्हें हल के साथ खेत जाना होता था। खाने लायक हर चीज गांव में मिल जाती थी। जिनके पास खेत नहीं थे, उनका भी दूसरे से लेकर काम चल जाता था। नाना के घर में आग कभी बुझती नहीं थी। माचिस की जरूरत नहीं पड़ती थी। आसपास के घर के लोग अपना गोइठा लेकर आते थे और आग का एक टुकड़ा लेकर चले जाते थे। इस तरह एक घर का दूसरे घर से संबंध बना हुआ था। किसी घर में उत्सव होता तो मेहमानों के लिए चैकी या खटिया का आदान-प्रदान चलता रहता था। ठंड की शाम में दरवाजे पर अलाव के चारों तरफ लोग बैठते थे। क्योंकि लोग सुबह से विभिन्न कामों में लग जाते थे। मैं उसमें आलू डाल देता और पकने पर उसे खाता। महिलाएं भी अंदर बोरसी लेकर बैठ जाती थीं। सोने के लिए ओसारे में पुवाल बिछाकर उसके ऊपर बोरी बिछा दी जाती, उस पर बिछावन। सारे लोग एक साथ सो जाते थे।

गर्मी के दिनों में दरवाजे के बाहर और आंगन में खाटें लग जाती थीं। कुआं का पानी सभी पीते थे। पानी को साफ करने के लिए कुआं में कतला और गरई मछली डाल दी जाती थी। फ्रीज तो था नहीं, इसलिए कुआं से ताजा पानी निकालकर पीया जाता था। बारिश के दिनों में कुआं में ब्लीचिंग पाउडर डाला जाता था। जब खुजली होती तो मां गोहाल से गाय-बैल के पेशाब और गोबर का लेप शरीर पर लगा देती थी और हमलोग उसकी जलन से उछलते थे, लेकिन खुजली दो दिन में गायब हो जाती थी। सुबह दरवाजे पर लगे नीम के पेड़ की टहनी तोड़कर दतवन कर लेते थे। अक्षर को सुंदर बनाने के लिए नरकट से कलम बनाते और दवात से स्याही लगाकर लिखते। तब फाउंटेन पैन बड़े लोगों के पास होती थी। गांव के विद्यालय की कक्षाएं पास कर ली तो नाना ने कहलगांव के गांगुली माध्यमिक विद्यालय में दाखिला करा दिया। एक कोस दूर था। कई लड़के वहां पढ़ने जाते थे। मैं भी हवाई चप्पल पहनकर पैदल ही एक कोस स्कूल जाता और आता। फिर गांव आते ही रम जाता। अवकाश के दिनों में खेतों पर समय बीतता।

पूरे ननिहाल में मैं ही एकमात्र बच्चा था, इसलिए सभी का प्यारा था। नाना बड़े किसान थे, लेकिन खाना और पहनना मोटा था। नगदी कम थी, इसलिए सोच-समझकर खर्च होता। गन्ने कहलगांव के गुड़ मिलों में बेच दिए जाते। बैलगाड़ियों की लंबी कतार मिलों की तरफ निकल पड़ती। बड़ा खर्च उसी पैसे से आता था। अनाज की बोरियां घर में भरी रहती थीं। कुछ खाने के लिए, कुछ बेचने के लिए। जितनी आमदनी होती, उतना ही खर्च किया जाता था। असुविधाएं भी थीं लेकिन मन परेशान नहीं होता था।
बारिश में लोटा लेकर जाना मुश्किल होता था, लेकिन फिर भी जाते थे। सावन-भादो में बाढ़ आ जाती थी। हमारे स्कूल जाने के रास्ते में भी पानी भर जाता था तो कहलगांव जाने के लिए दूसरा रास्ता पकड़ना होता था। गांव में दो-एक दुकानें थीं। सावन की सोमवारी को हमलोग बटेश्वर थान जाते थे, पैदल। दो कोस तो होगा ही। वहां पर गंगा स्नान करते, मौसी पराठा-सब्जी बनाकर ले जाती थी। मामा कुछ मिठाई खरीद ले आते। गांव से झुंड का झुंड जाता था। गांव में धूमधाम से सरस्वत्ती पूजा होती थी। तीन दिनों तक नाटक होता था। एक माह पहले से रिहर्सल होता था। सभी एक-दूसरे को पहचानते थे।

नए गांव में मेरी सांसें हांफने लगी। किसी तरह रात कटी और सुबह की पहली रेलगाड़ी से भागलपुर आ गया। उसके बाद महेशामुंडा जाता हूं तो कुछ समय के लिए। मन नहीं लगता, मन गन्ना के खेतों को तलाशता है।
(गुवाहाटी से प्रकाशित दैनिक पूर्वोदय के संपादक, ‘लाल नदी नीले पहाड’ पुस्तक के लेखक।)

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