November 16, 2019

पीछे छूटती यादों में अपनी ही गति से आगे बढ़ता गांव

कंचना कुमारी सिंह
मैं ज्यों-ज्यों अपने गांव कसबा के नजदीक पहुंच रही थी, उत्साह से भरी जा रही थी। पहले सड़कें किरनपुर के बाद नहीं बनी थी। हमलोग पैदल ही जाते थे। रास्ते में अंधरी नदी मिलती थी जो बरसात में लबालब भरी होती थी, हमलोग मुश्किल से पार करते थे। एकबार तो मैं बहते-बहते बच गई थी। मेरा पसंदीदा रूमाल जिसपर काकी ने हाथों से गुलाब का फूल काढ़कर दिया था, हाथों से छूट गया और मैं पूरा ध्यान रूमाल पर केन्द्रित कर उसी ओर लपकी, पानी में बहाव था भैया का हाथ छूट गया, फिर भैया ने ही मुश्किल से मुझे पकड़ा और हमने नदी पार की। खूब डांट मिली थी सबसे। वर्षों मेरी इस बेवकूफी की बातें घर में एकदूसरे से सुनाकर हंसते थे सभी। फिर सड़क बनी पर मिट्टी की, बैलगाड़ी आती थी हमें लेने और बैलगाड़ी पर मां, काकी आदि को बैठाकर हम पैदल ही चलते थे क्योंकि बैलगाड़ी में टप्पर बँधा होता था और गाड़ी के हिचकोलों से सिर में चोट लगती थी। बैलगाड़ी धीरे-धीरे चलती थी। सबसे मजा तो तब आता जब वह किसी गाँव के पास से गुजरती तो अधनंगे बच्चों का झुंड साथ-साथ दौड़ने लगता और गाता ‘‘कनिया मनिया झींगा के झोर, कनिया के ले गेलो बुद्धुआ चोर‘‘ फिर खूब हंसते। हमें भी आनंद आता, पर गांव की औरतों का हमारी शहरी वेशभूषा पैंट-शर्ट, फ्रील वाले फ्रॉक, बालों में सुंदर रिबन, कभी रबरबैंड, पैरों में सैंडल देखकर कानाफूसी करना और हंसना जरा भी अच्छा नहीं लगता।

अब तो सड़कें पक्की बन गई थी, गाड़ी स्पीड में चल रही थी। गांव बदल गया था। बिजली के खंभे दिख रहे थे, छोटी छोटी कई दुकानें खुल गई थी। घरों की संख्या भी बढ़ गई थी, पर अभी भी बड़ी संख्या में मिट्टी के ही घर थे। अचानक मन में ख्याल आया कि वे आम के पेड़ होंगे कि नहीं जिसकी ऊंची डालियों पर मैं चढ़ जाया करती थी, तोते के बच्चे को ढूंढने। मुझे अच्छी तरह याद है मुझ पर तोता रखने का भूत सवार हुआ था, मां के सामने इच्छा जाहिर की तो उन्होंने साफ मना कर दिया था कि फ्लैट छोटा है पिंजड़ा कहां रखेंगे, घर गंदा होगा आदि दलील देकर। जब छुट्टियों में घर आई तो अपने दोस्तों के सामने इच्छा जाहिर की। पप्पू, चनेसरा, मन्ना, सिलिया, मिरिया सभी ने एक स्वर में कहा कि सुग्गा तो बगीचे में आम के पेड़ पर रहता है। बच्चा होगा ही, वहाँ से निकाल लेंगे। बस फिर क्या था, दूसरे दिन से ही अभियान में लग गए। एक-एक पेड़ पर मन्ना, पप्पू और चनेसरा ने देखा, तोता नहीं मिला। छुट्टियाँ खत्म हुई हम वापस कलकत्ता लौट गए। बाद में दादी की चिट्ठियों से पता चला उन्होंने दो तोता खरीदकर पिंजरे में रखा है। खुशी से हम झूम उठे थे और फिर बड़ी मुश्किल से दिन कटे थे, गाँव में तोता पाकर लगा था सब कुछ मिल गया हो। झटके से गाड़ी रूकी और जैसे मेरे ख्यालों पर ब्रेक लग गया।

दरवाजे पर ही एक किनारे धान की तैयारी चल रही थी। चैकी पर कुछ मजदूर धान का अटिया डेंगा रहे थे। मेरा तो जैसे बचपन लौट आया हो, खुशी से उस ओर ही बढ़ी। सब अनजान चेहरे थे, पर एक चेहरा जाना पहचाना लगा, नाम याद नहीं आ रहा था, तभी उन्होंने कहा-हे लअ दीदी आभी गेलय, अरे भीतर जाउ, गरदा छय, केश गंदा होय जैतऊं। मैंने कहा महेन्दर हो। वे हंसने लगे। तभी देखा माँ दरवाजे की आड़ से बुला रही थी, भीतर आओ पहले। मैं दौड़ पड़ी, बाहर पिताजी गांव के कुछ लोगों के साथ बैठे थे, उन्हें प्रणाम कर अंदर चली गई। कितना कुछ बदल गया, पर मेरा घर नहीं बदला। अब तो धान तैयार करने की मशीनें आ गई है..आगे कुछ बोलूँ माँ कहने लगी मशीन खरीदने के लिए रुपए चाहिए और लोन लेकर खरीदने के बाद लोन का रुपया कैसे भरेंगे, अब खेती से कोई लाभ नहीं, खाने भर को अनाज नहीं बचता, वो तो तुम्हारे पिताजी का पेंशन मिलता है कि दिन कट रहा है। चलो छोड़ो पहले चाय पी लो, रोने के लिए एक उम्र भी कम है। मां को मैं गौर से देख रही थी जरा भी नहीं बदली। फोन पर रोज बात करती हूं पर संतुष्टि नहीं मिलती।

जब पिताजी ने रिटायर्ड होने के बाद गांव में रहने की बात कही थी तो मैं चिन्तित हो गई थी। मैं फोन पर मां से जिरह करती, कैसे रहोगी वहां बिजली-बत्ती कुछ नहीं है। ना फ्रीज होगा और ना ही टेलीविजन। बाहर घूमने की कोई जगह नहीं ,पर्दे में रहो अपने घर में घूमो बस। पर मां कहती गांव में जो सुख है वह शहर में नहीं, वहाँ सब बनावटी और मिलावटी। टेलीविजन की यहाँ क्या जरूरत, गांव के लोग ही चलता फिरता टेलीविजन हैं। उस वक्त तो मुझे मां की बातें अटपटी लगी थी, पर धीरे-धीरे शहर की मतलबी दुनिया से मेरा जी भी उबने लगा है। मुझे यह यकीन होने लगा है कि मैं ही नहीं, शहर की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी से बहुत सारे लोग ऊब रहे हैं। रविवार या छुट्टियों के दिन जब आस-पड़ोस के परिवार को पिकनिक मनाने एकांत जगह या पार्क जाते देखती तो यकीन विश्वास में बदलने लगा था। चाय पीकर मैं मां से कहकर पीछे बगीचे में गई, पर वहां आम का पेड़ नही था और ना ही वह अमरूद का पेड़ मुझे मिला जिसकी डाली पर बैठकर मैं अमरूद खाया करती थी, वापस लौटकर मां से सिर्फ इतना कहा वह पेड़ तो नहीं है। मां बोली सबकी आयु होती है बेटा, अब हमारी आयु भी तो पूरी हो रही है। मैंने मां को चिढ़ाते हुए कहा कब? और मां खिलखिलाकर हंस पड़ी साथ में मैं भी। इधर-उधर की बातें करते रात हो गई, इसबीच मां ने खाना भी बना लिया।

पहले तो शाम होते ही हाथ-पैर धोकर कैसे हम सभी भाई-बहन दादी की खटिया पर सवार हो जाते थे। दादी हुक्का गुड़गुड़ाते हुए दिनभर की हमारी कारगुजारी सुनती, यदि एक कुछ छिपाकर बताता तो दूसरा उसकी पोल खोल देता और हम आपस में लड़ पड़ते, तब दादी कहानी सुनाने का लालच देती और हम खुश हो कहानी सुनने लगते। अंधेरा होते ही लगभग सात बजे हम रात्रि का भोजन कर सोने चले जाते। पर अब मैंने गौर किया, भागलपुर से आने वाली अन्तिम बस रात नौ बजे हॉर्न बजाती है तभी खाना लगता है। रात में मैं मां के पास ही सोई। मां ने बताया कि सिलिया टीबी का शिकार हो गई है, अभी अपनी ससुराल में है। मैं बिना सोचे समझे तपाक से बोली मैं जाऊंगी सिलिया को देखने, उसका इलाज करवाऊंगी। जब मां ने कहा कि कल पूजा है और परसों तुम्हें जाना है तो लगा कि हमारी भावनाएँ मरती नहीं, जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाती हैं। एक गहरी सांस ली ही थी कि मां ने बात बदलते हुए कहा अरे चंदनमा के विषय में सुनी कि नहीं, खूब पैसे वाला हो गया है। नेपाल में खूब कमा रहा है, यहां भी पक्का का मकान बना लिया। चंदनमा महेन्दर का बेटा है, फिर महेंदर धान क्यों डेंगा रहा था। जरूर रुपया कमाकर चंदनमा खुद को लाट साहब समझने लगा होगा। इसबार मां ने गहरी सांस ली और कहा उसने नेपाली लड़की से शादी की थी ना, उसका महेन्दर से नहीं बनता। अलग-अलग संस्कृति में पले बढ़े हैं दोनों, कठिनाई तो होगी ही। बात सुनते-सुनते कब सो गई मुझे पता ही नहीं चला। हां, इतना याद है कि मां कह रही थी गांव में टेलीविजन आ गया है, अब पहले वाली बात नहीं रही। गांव के बच्चों के आचरण पर टेलीविजन का प्रभाव खूब दिखाई देता है। औरतें सीरियल देखकर शहरी हो रहीं हैं।

सुबह हंगामे से ही मेरी नींद टूटी। किसान का घर उसपर जोर से बोलने की आदत- अरे कोदरा उठाबअ ना, चल जल्दी चल। हेरय छौड़ा तोयं डलिया लेले। हेरे बहैरा नयँ सुनय छँय रे.. मुझे एकाएक देखकर पुटिया बोला- तोयँ कखनी अइलौ? अभी रहबो ना? हमरा पते नय छैलय। माँ उससे उलझ गई, राते फिर से ‘‘चढ़ा लिया”, कल बताया था ना। पुटिया बड़बड़ाते हुए घर से निकल गया- आदे नय रहय छय। तभी मां ने चाय का गिलास मेरी ओर बढ़ाया, गिलास लेकर मैंने पूछा बर्तन तो हुमनी माय ही मांजती है ना। मां बोली, हां मुड़ली के मरने के बाद से वही करती है। मुड़ली …मुड़ली इस घर का पीर, बावर्ची, भिश्ती सबकुछ। अपनी मर्जी की मालकिन। भाषण देने में नंबर वन, गांववालों की इन्दिरा गांधी। पिताजी की बातों को ध्यान से सुनती और बढ़ा-चढ़ाकर गांववालों को सुनाती। उसके बालों का अपना ही स्टाइल था, सिर हमेशा साड़ी से ढका रहता। आगे बालों के लट लटकते पर पीछे बाल नहीं होते थे, बिल्कुल सफाचट। मेरे कारण पूछने पर उसने बताया कि गरदन पर बाल रहने से ‘‘उकरू” लगता है। गांव के बच्चे अक्सर उसे चिढ़ाते ‘‘मुड़ली दी के पीछु चाँद, आगु सुरूज भगवान” और मुड़ली छड़ी लेकर बच्चों को बनावटी गुस्सा दिखाते दौड़ाती। मुड़ली गाँधी जी की विचारधारा से प्रभावित थी, वह छड़ी रखती पर मारती नहीं। कहीं झगड़ा होते देखती गांधी बाबा की जय गरजने लगती।

वक्त कहां रूकता है किसी के लिए, वह अपनी गति से चलता है।

मुड़ली की जगह हुमनी माय ने ले लिया, उसे अपना नाम याद नहीं। एकबार पूछा था तो बोली, बच्चा छेलइय त फलनमा के बेटी आरू नकसुरकी, ऊ हमरा नाक बहैय छैलय ना यही लियय, फनूं बियाह होलय त फलनमा कनिया आरू आब हुमनी माय। पति की दूसरी बीबी को उसने बेटा के लिए बड़े प्रेम से अपना लिया है। हुमनी माय आ गई थी, मैं हाल-समाचार ले ही रही थी कि मन्ना आ गया और उसे देखकर मैं सन्न रह गई। चेहरे पर अनगिनत झुर्रियाँ उसके संघर्षशील जीवन की कहानी सुना रहे थे। दो दिन कैसे कट गए पता ही नहीं चला। मुम्बई वापस लौट तो आई पर स्वयं को वहीं छोड़ आई थी मां की आँखों में, पिताजी की बातों में ,खेतों में, पेड़ों में और साथ लेकर आई थी मन्ना, हुमनी माय, महेन्दर, चलित्तर, शिवा, असिया की बातों को।

पूर्व असिस्टेन्ट प्रोफेसर, हिंदी, नॉर्थ बंगाल सेंट जेवियर कॉलेज,रायगंज व जनरल सेक्रेटरी, बिहार प्रदेश महिला कांग्रेस कमेटी

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