के एन गोविंदाचार्य
भारतीय सभ्यता का संचालन बिंदू है गांव। पिछले 200 वर्षों के प्रत्यक्ष और बाद में प्रच्छन्न उपनिवेशवादी मानसिकता का गांव पर हमला हुआ है। गांधी जी ने कहा था कि अंग्रेजीयत जाए, अंग्रेज भले ही रह जाए। अंग्रेज जाए, अंग्रेजीयत चालू रहे, यह उन्हें कबूल नहीं था। इसलिए संविधान सभा की बहसों की सूचना जब गांधी जी तक पहुंची तो गांधीजी ने उसे थोड़ा देखकर किनारे कर दिया। न तो गांवों को माकूल जगह मिली, न गौ-हत्या पर प्रतिबंध की बात स्वीकार की गई थी। और देश के आर्थिक विकास के संदर्भ में भारत गांधी से हटकर नेहरू के विचार और रूस की दिशा में बढ़ गया।

गांधी और नेहरू जी के पत्राचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसमें नेहरू जी ने ग्राम आधारित विकास की संकल्पना को काल-बाह्य बताया और जब गांधी ने सारे पत्रों को सार्वजनिक करने की बात की तो नेहरू जी ने सहमति नहीं दी। तब से सत्तातंत्र में अंग्रेजीयत रच बस गयी। ऐसे में गांव की दुर्दशा, स्रोतों का शाषण और गांव की कीमत पर शहरों का बेतरतीब बढ़ाव और आर्थिक विषमता अपरिहार्य ही थी। आढ़तिया माल और करखनिया माल के मूल्यों में विसंगति ने और स्वायत्त पंचायती व्यवस्था के प्रभावी न होने के कारण गांव के साथ-साथ गाय, खेती और किसान को दुर्दशा का सर्वाधिक शिकार गांव को होना पड़ा। तब तक शि्क्षा व्यवस्था ग्रामीण व्यवस्था से संबंध विच्छेद कर बैठी। विकास के भ्रमजाल का शिकार समाज अनजाने खुदकुशी का शिकार होने लगा। सरकारवाद और हावी हुआ। सन् 80 तक यही सिलसिला चलता रहा। 1990 के बाद बाजारवाद हावी हुआ। परिस्थितियां इस कदर विषम हुईं कि प्रगतिशीलता के नाम पर पशु-शक्ति को खारिज कर दिया गया। आधुनिक खेती के नाम पर हरित क्रांति के दौरान मशीनों का प्रयोग खेती में बढ़ाया गया, जिससे ग्राम समाज भी टूटा और खेती में श्रम के बजाय पूंजी का वर्चस्व बढ़ा। खेती या उत्पादन वृद्धि पर तो ध्यान था लेकिन अन्न उगाने वाले किसानों की निरंतर उपेक्षा की गई। 1993 में पंचायती राज कानून बना, बाद में उसे शहरी पंचायत व्यवस्था से जोड़़ा गया। लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था नौकरशाही के हाथ ही रही।
अस्सी के दशक में खेती और किसानी के बाबत आंदोलन भी हुए लेकिन गहराई से ध्यान नहीं दिया गया। कर्ज देने की व्यवस्था और न्यूनतम समर्थन मूल्य तक ही बात सोची गई। फलतः ग्राम समाज टूट गया, कारीगरों का पलायन बढ़ा। गांव समाज का खेती से संबंध ने भी इस प्रक्रिया को प्रभावित किया। संबंध घटने से तनाव बढ़ा। खेतिहर मजदूर और उत्पीड़ित हुए। उसके समाधान हेतु ऊंट के मुंह में जीऱा की तरह मनरेगा लाई गई। लेकिन उसमें खेती के लिए किए गए श्रम को उस समय जोड़ा नहीं गया। कर्ज माफी की योजना हो या एमएसपी की योजना हो, इसमें राजनीति और वोट की तरफ ध्यान ज्यादा था। इसलिए खेती और किसानों के संबंध में विचारों में समग्रता का अभाव दिखा।
1980 के बाद शहरीकरण, ग्रामों से पलायन, जड़ से कटी शिक्षा व्यवस्था के कारण कई पीढ़ी शिक्षा से विमुख हो गई। राजनीति के कारण सरकारों ने नौकरी दे पाने की असमर्थता को हमेशा छिपाया। इसलिए 1990 के दशक में किसानों ने अपने इलाके में पूरक रोजगार की व्यवस्था नहीं की और जहां के समाज के स्वभाव में स्थानिक आजीविका पर जोर रहा, वे नकदी फसल की ओर बढ़ गए और कर्ज, सर्मथन मूल्य और सामाजिक प्रतिष्ठा के चक्रव्यूह में फंस गए। तंबाकू, कपास व अन्य नकदी फसलों की खेती कर रहे लोग ही आत्महत्या के सर्वाधिक शिकार हुए।

अब पिछले 20 वर्षों में छोटी जोत, कम पूंजी, कम लागत की बहुफसली मिश्रित खेती के प्रति रूझान बढ़ा है। कम्पोस्ट, नेडप-खाद व सुभाष पालेकर द्वारा प्रतिपादित जीरो बजट खेती की ओर किसानों का रूझान बढ़ा है और किसान आंदोलनों के परिणाम स्वरूप स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें सामने आईं। हाल के दशक में किसान आंदोलन तीव्र होते गए। पिछले वर्षों में पंचायतों को किसान आंदोलन के दबाव में 40 लाख रूपए का अनटायड फंड निर्गत किया गया। पंचायतों की कार्यावधि के दौरान पंचायतों को दिए गए 29 कामों के लिए वित्तीय अधिकारों की मांग जोर पकड़ रही है। पंचायत में ग्राम सभा के गठन, संचालन विधि और जागरूकता पर अब समाज और सरकार दोनों का ध्यान गया है।
ब्रम्हदेव शर्मा ने जो विचारों से प्रखर गांधीवादी थे, पत्थल गढ़ी की शुरूआत बस्तर जिले में की थी, उन्होंने किसानों को चक्रवृद्धि ब्याज के खतरे से आगाह किया। अभी तक ग्रामसभा को संगठित और फलदायी बनाने की चुनौती है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को बिना राजनीति के अमल में लाना दूसरी बड़ी चुनौती है। कम पूंजी, कम लागत, मिश्रित और बहुफसली खेती की ओर मुड़ना, स्थानीय व प्रखंड स्तर तक स्वायत्त बाजार संगठित होना तीसरी बड़ी चुनौती है। आगे का समय इस बात की प्रतीक्षा करेगा कि समाज और सरकार ने इन चुनौतियों के समाधान के लिए क्या किया?
हमें पंचायती राज व्यवस्था को अधिक मजबूत करने के लिए ग्राम सभा को मजबूत बनाने की जरूरत है। आज देश के ज्यादातर हिस्सों में ग्राम सभा की बैठक कागजी खानापूर्ती मात्र रह गई है। इसको ठीक करने की जरूरत है। ग्राम सभा की बैठक नहीं होने के कारण कई तरह की समस्याएं हो रही हैं। ग्राम सभा की मूल अवधारणा में था कि उस भूभाग के अंतर्गत रहने वाले सभी लोग नैसर्गिक रूप से ग्राम सभा के सदस्य माने जाएंगे। इसीलिए हमने मांग किया था कि कुल जीडीपी का सात फीसद बजट पंचायतों को दिया जाए। इस दिशा में काम बढ़ा है। ऐसा भी नहीं है कि गांवों में काम नहीं हो रहा है लेकिन चुनौती बड़ी है। नयी पीढी़ के लोग इस दिशा में सक्रिय और प्रयोगशील हैं। बिनोबा भावे का कहना था कि सरकारी काम कम असरकारी है। जबकि होना यह चाहिए था कि गांव के विकास के लिए असरदार काम हो। हमारा गांव, हमारा देश, सबको भोजन, सबको काम, यही हो मूल संदेश। लेकिन यह तभी संभव है जब हम चाहत से देशी, जरूरत से स्वदेशी, मजबूरी में विदेशी को अपनाएं। यहीं से विकेंद्रीकृत व्यवस्था शुरू होगी और हमारे गांव मजबूत होंगे।
(प्रसिध्द विचारक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध। भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में रहे। राष्ट्रीय स्वाभिमान मंच के संस्थापक।)


