अमरनाथ की रिपोर्ट
गंगा और गंडक की गोद में बसा है राघोपुर। प्रदेश की राजधानी से सटा,गंगा पार का इलाका. बिदूपुर और राघोपुर प्रखंडों में फैला है। इलाका परिचय का मोहताज नहीं है। पूरे देश में चर्चित रहा है यह इलाका। डेढ. दशक से यह इलाका लालू-राबड़ी के नाम से चर्चित रहा। इस बार भी चर्चा में है। लालू और राबडी ने बेटे को अपना राजनैतिक उत्तराधिकार सौंपने में इस क्षेत्र को रणक्षेत्र में बदल दिया है। पूरे देश की निगाहें इसकी ओर लगी हैं। महागठबंधन और एनडीए यहां आमने सामने हैं। एक तरफ राज्य मे सत्ताधारी तबके की पूरी ताकत है तो दूसरी ओर केन्द्र सरकार के नियंता अपनी पूरी ताकत झोंकने में लगे हैं। इनके बीच फंसा इलाका अपनी बेबसी पर खामोश है। पंद्रह वर्षों के लालू-राबडी राज को अगर छोड़ भी दें तो दस वर्षों के सुशासन के दौरान भी इलाके के साथ न्याय नही हुआ। चुनाव के वक्त एकबार फिर तरक्की के सपने दिखाए जा रहे हैं।
राघोपुर क्षेत्र 1995 में तब चर्चा में आया जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इसे अपना क्षेत्र चुना। 1980 से 1995 तक लगातार विधायक रहे समाजवादी उदय नारायण राय उर्फ भोला राय ने लालू के विधानसभा पहुंचने की राह बनाने के लिए इस्तीफा दे दिया और उन्हें यहा से चुनाव लड़ने की पेशकश की थी। लालू जनता दल के टिकट पर 1995 में यहा से चुनाव जीते। हालांकि बाद में लालू यादव चारा घोटाले में जेल चले गए। उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी। उनके विधानसभा पहुंचने का सुरक्षित रास्ता राघोपुर से ही बना। राबड़ी देवी 2010 तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-जदयू के उम्मीदवार सतीश कुमार ने राबडी देवी को पराजित कर दिया। इसबार लालू-राबडी के छोटे पुत्र तेजस्वी यादव यहां से चुनाव मैदान में हैं। स्वाभाविक तौर निवर्तमान विधायक सतीश कुमार भाजपा के उम्मीदवार हैं।
प्राचीन काल में यह क्षेत्र तीरभूक्ति व कोटिग्राम कहलाता था और मगध के अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण करने में इसी रास्ते का इस्तेमाल किया था। अजातशत्रु ने 16 बार वैशाली पर आक्रमण किया था। ऐतिहासिक चेचर ग्राम समूह इसी क्षेत्र का हिस्सा है जहां पुरात्वात्विक खुदाई में मानवीय सभ्यता के कई कालखंडों के अवशेष मिले हैं। चेचर के बुजुर्ग रामपुकार सिंह ने अनेक अवशेषों को सहेज कर रखा है। उनका संग्रह अब एक संग्राहलय का रूप ले चुका है। भगवान बुध्द के प्रिय शिष्य आनन्द का कार्यक्षेत्र और निर्वाण स्थल इसी क्षेत्र में है। निर्माण व विध्वंस, रचना और संहार के अवशेषों को अपने सीने में दबाए यह क्षेत्र तमाम भौगोलिक कठिनाईयों को झेलते हुए सशक्त अस्तित्व के साथ खड़ा है। यहां की खेतिहर आबादी ने प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ सहचर्य स्थापित कर लिया है। पर लोगों के सामने सवाल है कि वर्तमान राजनीति के दांवपेंच में आखिर कब तक छले जाते रहेंगे हम .
महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के बावजूद इस इलाके का अपेक्षित विकास नहीं हुआ। हालाकि लालू दंपत्ती ने इसके प्रयास जरूर किए। वर्षभर नाव से गंगा पार करने वाले लोगों के लिए लालू यादव ने मुख्यमंत्री रहते पीपा पुल का सौगात दिया था। लेकिन पक्का पुल आज तक नहीं बन सका है। इसके लिए राबड़ी देवी ने कई बार केन्द्र का दरवाजा भी खटखटाया। इधर चुनावों के ठीक पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने छह लेन वाले पुल का शिलान्यास किया है। यह पुल कब बनेगा, इसके बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि इसे लेकर केन्द्र और राज्य के बीच रस्साकस्सी चल रही है। यूपीए की पहली सरकार के दौरान प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत कुछ सड़कें जरुर बनी। पर शिक्षा का बुरा है। राघोपुर और बिदूपुर में एक भी डिग्री कालेज नहीं है। इटर कालेज हाईस्कूल को अपग्रेड करके बना दिए गए, पर उनमें पढ़ाई शुरू नहीं हूई है। आधी से अधिक आबादी को शुध्द पेयजल उपलब्ध नहीं है। इलाके के लोग आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश हैं। 70 गांवों के भूजल में आर्सेनिक खतरनाक स्तर पर है। स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। राबड़ी का बनवाया रेफरल अस्पताल चालू नहीं हो सका है। सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है। दक्षिण बिहार को उत्तर बिहार से जोड़ने वाली बिजली परियोजना गर्त में चली गई है।
लालू-पुत्र तेजस्वी के उम्मीदवार होने से राघोपुर की ओर सबकी नजर लगी है। चुनाव आयोग की नजर चुनाव खर्च को लेकर यह संवेदनशील क्षेत्र है। राजनेतों की नजर में यहा लालू दंपत्ती की अग्निपरीक्षा होनी है। इसलिए लालू-राबड़ी के साथ-साथ उनकी बड़ी बेटी मीसा भारती ने भी यहा डेरा डाल दिया है। पर इनकी समस्या पड़ोस की महुआ क्षेत्र है जहां से लालू के बडे पुत्र तेजप्रताप उम्मीदवार हैं और तीन मजबूत यादव नेताओं के चक्रब्यूह में फंस गए हैं।
