अमितेश सिंह
गाजीपुर: आज देश मे हर तरफ असहिष्णुता की राजनीति चल रही है कुछ लोग अपने को असुरक्षित बता दुसरे देश जाने की भी धमकी भी देते नजर आ रहे है,तो कहीं पुरस्कार वापसी हो रहा है तो कहीं किताब वापसी तो कहीं सम्मान वापसी वही गाजीपुर जनपद मे रमाशंकर पाण्डेय जिन्हे क्षेत्र के लोग हुसैनी के नाम से भी जानते है उन्होनें इन दिनो हिन्दू मुस्लिम एकता की एक नई मिसाल पैदा कर ईमाम हुसैन और कुरान पर अपनी लेखनी से कई किताब लिख डाला है। और वे उन किताबो को मानवता का संदेश देने के लिए जनपद के हर उन दरगाहो और ईमामबाडे पर नजर आते है जहां पर हुसैन को मानने वालो की भीड़ होती है।
मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्ता हमारा। जी हां इन पंक्तियो को इन दिनो जनपद के रहने वाले रमाशंकर पाण्डेय ने चरितार्थ कर डाला है। 50 की उम्र पार कर चुके यह है रमाशंकर पाण्डेय जो जनपद के रेवतीपुर ग्राम मे ब्रहमण परिवार मे पैदा हुए और शुरूआती पढाई गांव मे करने के बाद बीएससी कृषि से कर ईलाहाबाद पालिटेिक्नक कालेज मे कुछ दिनो नौकरी करने के बाद अपने जनपद मे आकर औषधि खेती को बढावा देने के लिए कार्य करते रहे। इसी दौरान इन्हे कुछ लिखने की ईच्छा जगी और उन्होने ईमामम हुसैन के जीवन उनके मानवतावाद और कुरान मे लिखी कई आयतों को पढ कर किताब की शक्ल दे डाला। आज रमाशंकर पाण्डेय 3 किताब लिख चुके है। जिसमे आदी शक्ति निराकार ब्रहम ही सबसे महान जिसका अरबी अनुबाद कर अल्लाह हो अकबर लिखा। उसके बाद हुसैन से ईन्सानियत और अब सर्व शक्तिमान अल्लाह की चाहत (कुरान और अहल ए बैत) लिखकर हुसैन का संदेश जन जन तक पहुचाने की चाहत रखकर ये हर उस जगह पर नजर आते है जहां पर हुसैन और उनकी मानवतावाद को मानने वाले होते है। रमाशंकर पाण्डेय अपने इस संदेश को लोगो तक पहुचाकर खुद हुसैनी बन सिर्फ मानवता की बात करते हुए कहते है की धर्म चाहे कोई हो उसमे कई तरह के लोग होते है जिसमे कुछ उनकी बातों को आगे बढ़ाते है तो कुछ उनकी बातों को गलत ढंग से प्रचार प्रसार कर जेहाद का नाम देते है। जबकि हुसैन कभी भी कत्लेआम की बात नही कहां बल्कि आतंकवाद के आगे खुद और अपने चाहने वालो को न्योछावर कर नजीर पेश किया। रमाशंकर अपना यह किताब वैसे तो लोगो मे बांटते है अगर उसके बदले कोई कुछ देता है तो भी ठीक नही देता है तो भी उसे वह किताब देते है। इसी बातों को ध्यान मे रखकर जनवरी 2015 मे ईरानी एम्बेंसी ने इन्हे किताब छपवाने के लिए 20 हजार का अनुदान भी दिया था।