नहीं रहे किसान नेता शरद जोशी

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संतोष कुमार सिंह
किसानों के जाने माने नेता और ‘शेतकरी संघटना’ के नेता और संस्थापक थे शरद अनंतराव जोशी का आयु संबंधी समस्याओं के कारण आज यहां निधन हो गया।

वह 81 वर्ष के थे । जोशी ने किसानों के हितों की खातिर संघर्ष करने के लिए 1979 में शेतकरी संघटना की शुरुआत की थी और वह प्याज की पैदावार के लिए लाभकारी कीमतों की मांग के लिए 1980 में प्याज उत्पादकों के एक आंदोलन से सुर्खियों में आए थे। वह 2004 से 2010 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। शरद जोशी अकेले ऐसे सांसद थे जिन्होंने संसद में महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ मतदान किया था। उन्होंने अपने जीवनकाल में किसानों के लिए हमेशा संघर्ष किया। उन्होंने सरकार की किसान विरोधी नीतियों की हमेशा आलोचना की। यही वजह थी कि लोग उन्हें किसानों का नेता मानते थे। शरद जोशी ने अपने जीवनकाल में अंग्रेजी अखबारों में अपने संपादकीय के माध्यम से किसानों के विकास के लिए सराहनीय कार्य किया। उन्होंने कृषि मुद्दों पर कई पुस्तकें भी लिखी। शरद जोशी ऐसे पहले किसान नेता थे जिन्होंने कहा कि किसानों को अनाज के उत्पादन में जितनी लागत लगती है उसके हिसाब से उन्हें फसल का मूल्य मिलना चाहिए। शरद जोशी ने इसके लिए आंदोलन चलाया।

शरद जोशी शेतकारी संगठन के संस्थापक थे, जो संस्था महाराष्ट्र में किसानों के लिए काम करती है। शेतकारी संगठन किसानों की एक गैर सियासी यूनियन है, जिसकी स्थापना बाजार व तकनीक तक पहुंच करने की आजादी हासिल करने को की गई थी।

जब किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे थे तब शरद जोशी ने कहा कि हाथ से गले का फंदा नहीं हथियार उठाओ। शरद जोशी को 1998 में टास्क फोर्स का अध्यक्ष बनाया गया था। तब उन्होंने एक आकलन किया था जिसके मुताबिक 20 सालों में किसानों को सरकारी नीतियों की वजह से तीन लाख करोड़ रूपये का नुक्सान हुआ था। 1998 में किसानों के लिए नए जमाने की शुरूआत हुई जब विश्व बैंक को भी यह मानना पड़ा कि पहली बार भारत के किसानों को सकारात्मक सब्सिडी मिलने लगी है। शरद जोशी किसानों की स्थिति में सुधार को लेकर आधुनिक सोच रखते थे। शरद जोशी की गिनती उन उदारवादी किसान नेताओं में होती थी जो खेती में आधुनिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का हिमायती था। किसानों की आत्महत्या को लेकर जब एक बार शरद जोशी से पूछा गया कि क्या आप मानते हैं कि हरित क्रांति की वजह से कृषि का सारा ढर्रा ही बदल गया, कृषि पूंजी पर आधारित हो गई. कहीं इस कारण किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ने से खुदकुशी तो नहीं बढ़ी है? शरद जोशी ने कहा कि यह हो सकता है मगर इस कारण हरित क्रांति के पूर्व वाले युग में नहीं लौटा जा सकता. हरित क्रांति से पैदावार बढ़ी. देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना. अगर देश में हरित क्रांति से पूर्ववाली स्थिति होती तो किसान भले ही आत्महत्या नहीं करते लेकिन लोग भुखमरी से मर जाते. अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए तकनीक तो बदलनी ही थी.
जोशी के परिवार में दो बेटियां हैं जो विदेश में रहती हैं।

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