धान के प्रमुख रोग
अंगमारी रोग, जीवाणु पर्ण, पर्ण झुलसा (पत्ती का झुलसा रोग), स्टेम बोरर कीट, ब्लास्ट या झोंका रोग, खैरा रोग, बकानी रोग, , लीफ फोल्ड कीट, हॉपर, ग्रॉस हॉपर, सैनिक कीट आदि धान के प्रमुख रोक हैं। इनकी रोकथाम समय पर की जानी चाहिए. खरीफ बुवाई सीजन में अब तक धान का क्षेत्रफल लगभग 4% बढ़कर 398.08 लाख हेक्टेयर हो गया है। पिछले वर्ष धान का रकबा 383.79 लाख हेक्टेयर था. धान की फसल में कई रोग लग जाते है. अगर समय पर इसकी रोकथाम के लिए उपाय नहीं किए गए तो फसल बर्बाद हो सकती है. इस लिए यह जरूरी है कि समय-समय पर किसान अपनी फसलों का निरीक्षण करते रहे।
झुलसा रोग
पत्ती का झुलसा रोग धान की फसल में लगने वाली सबसे सामान्य बिमारी है। पौधे की छोटी अवस्था से लेकर उसके पूर्ण विकसित होने तक यह रोग कभी भी हो सकता है। पत्तियों के किनारे ऊपरी भाग से शुरू होकर बीच तक सूखने लगते हैं। सूखे पीले पत्ते के साथ-साथ राख के रंक के चकत्ते भी दिखाई देते हैं। इस रोग के परिणाम स्वरूप बालियां दानारहित रह जाती है।
आखिर कैसे करें रोकथाम
इसकी रोकथाम के लिए 75 ग्राम एग्रीमाइसीन-100 और 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (फाइटोलान)/ ब्लाइटॉक्स-50/क्यूप्राविट को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से 3-4 बार 10 दिनों के अंतराल से छिड़काव करें. इस रोग के लगने पर नाइट्रोजन का छिड़काव कम कर देना चाहिए।
खैरा रोग
खैरा रोग से धान की फसल की निचली पत्तियां पीली पड़नी शुरू हो जाती हैं और बाद में पत्तियों पर कत्थई रंग के छिटकवां धब्बे उभरने लगते हैं। यह रोग अमूमन 1.5 से 2 महीने के बीच लगता है।
रोकथाम
25 किग्रा जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई से पहले खेत की तैयारी के समय डालना चाहिए। रोकथाम के लिए 5 किग्रा जिंक सल्फेट और 2.5 किग्रा चूना 600-700 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

