किसानों के परिश्रम और वैज्ञानिकों के शोध के कारण खाद्यान्न उत्पादन की दृष्टि से भारत अधिशेष राष्ट्र बना

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केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने 5 मार्च को एसोचैम और इन्वेस्ट इंडिया के साथ भागीदारी में खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय द्वारा ‘मध्य प्रदेश में कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण के अवसर’ विषय पर आयोजित एक सम्मेलन को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश के 86 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं और जब तक उन्हें सशक्त नहीं बनाया जाता है, तब तक गांवों के आत्मनिर्भर बनने और कृषि क्षेत्र के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

पीएम किसान सम्मान निधि के अंतर्गत, देश के 10.5 करोड़ किसानों को 1.15 लाख करोड़ रुपये की धनराशि दी जा चुकी है, जिससे इन किसानों की वार्षिक आय 6 हजार रुपये तक बढ़ गई है।

कृषि मंत्री ने कहा कि छोटे और मझोले किसानों को महंगी फसलों की खेती की ओर आकर्षित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे उन्हें कृषि तकनीक का लाभ मिले और गुणवत्तापूर्ण व वैश्विक मानकों के स्तर की फसल का उत्पादन कर सके।

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के अंतर्गत कृषि अवसंरचना के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया जा चुका है, जिससे गांवों में शीतगृह, वेयरहाउस जैसी अवसंरचनाओं का निर्माण होगा। इससे फसल का पर्याप्त प्रसंस्करण करके किसानों को ज्यादा लाभ पहुंचाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार देश में 10 हजार नए कृषक उत्पादन संगठन (एफपीओ) स्थापित कर रही है। सरकार इन एफपीओ पर 6865 करोड़ रुपये खर्च करेगी। एफपीओ से जुड़ने पर किसान की खेती में लागत तो कम होगी ही और उन्हें बेहतर बाजार एवं एकीकृत सिंचाई सुविधाओं का लाभ भी मिल सकेगा। एफपीओ को खेती के लिए ब्याज में 3 प्रतिशत तक की छूट पर 2 करोड़ रुपए तक का ऋण दिया जाएगा।

कृषि मंत्री ने कहा कि हमारे किसानों के परिश्रम और वैज्ञानिकों के शोध के कारण खाद्यान्न उत्पादन की दृष्टि से भारत अधिशेष राष्ट्र है। भारत दूध, बागवानी उत्पादों के मामले में भी दुनिया में अग्रणी है। अब खाद्य प्रसंस्करण पर ध्यान देने की जरूरत है। खाद्य प्रंस्करण मंत्रालय कई योजनाओं के साथ इस दिशा में तेजी से कार्य कर रहा है।

कृषि मंत्री तोमर ने जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि क्षेत्र के सामने मौजूद चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि धान व गेहूं में ज्यादा पानी लगता है, इसलिए किसानों को पानी की कमी वाले क्षेत्रों में इन फसलों के बजाय दलहन, तिलहन के साथ ही मोटे अनाज की खेती पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। श्री तोमर ने कहा कि कोविड-19 के संकट के दौर में लोगों का ध्यान प्रतिरोधकता बढ़ाने की ओर बढ़ा है। पूरी दुनिया में यह सिद्ध हो गया है कि मोटे अनाज प्रतिरोधकता बढ़ाने में कारगर हैं। ऐसे में मोटे अनाज की खेती, उसे बेहतर बाजार दिलाने और उसके प्रसंस्करण पर ध्यान देना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि तिलहन के प्रसंस्करण से स्व सहायता समूहों को जोड़ा जाना चाहिए, इससे गांव की कमजोर वर्ग की महिलाओं को भी आर्थिक लाभ हो सकेगा।

कृषि मंत्री ने मध्य प्रदेश के विषय में कहा कि ग्वालियर-चंबल अंचल में खाद्य प्रंस्करण के क्षेत्र में अपार संभावनाए हैं और इनका दोहन करके इस क्षेत्र के छोटे व मझोले किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार किया जा सकता है।

तोमर ने कहा कि मुरैना जिला शहद की दृष्टि से भी अग्रणी है। नेफेड ने शहद के लिए एक एफपीओ बनाया है, जिसके माध्यम से गुणवत्ता युक्त शहद उत्पादन में वृद्धि, बेहतर पैकेजिंग-मार्केटिंग हो सकेगी। यहां से देश के साथ ही दुनिया में भी शहद की बिक्री की गई है।

इस कार्यक्रम में डाबर, हाइफन, पतंजलि, यूपीएल जैसी प्रमुख खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों और फ्लिपकार्ट जैसी आपूर्ति श्रृंखला कंपनियों ने भागीदारी की। इस सम्मेलन में उद्यम से सरकार (बी 2 जी) और उद्यम से उद्यम (बी 2 बी) बैठकें भी हुईं। पंजीकृत उद्यमियों, एफपीओ और स्व सहायता समूहों के लाभ के लिए पीएमएफएमई योजना का विवरण भी प्रस्तुत किया गया।

इस सम्मेलन में राज्य सरकार के अधिकारियों और एसोचैम के सदस्यों ने भी भाग लिया।

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