लॉक डाउन में लॉक हुई बिहार, उत्तर प्रदेश के केला किसानों की किस्मत

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पंचायत खबर टोली

कहीं महामारी की आशंका से जूझते किसान तो कहीं लॉक डाउन के कारण नहीं मिल रहे खरीदार
नयी दिल्ली: कोरोना महामारी के दौरान हुए लॉक डाउन के कारण बाकी किसानों की तरह ही केले की खेती करने वाले किसान इन दिनों खासे परेशान हैं। एक तरफ दक्षिण भारत के किसानों की परेशानी ये है कि लॉकडाउन के कारण आवागमन बाधित होने के कारण वे अपनी फसल नहीं बेच पा रहे हैं या लागत से कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं। वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश के केला उत्पादक किसानों पर पनामा विल्ट नामक फंगस रोग की मार पड़ी जिससे केले की फसल को काफी नुकसान पहुंच रहा है। जानकारों की राय है कि तापमान बढ़ने पर फसल पर यह गंभीर महामारी का रूप पकड़ सकता है। ये स्थिती तब है जब पिछले साल ही यह कहा गया था कि पूरी दुनिया में केले की फसल को बुरी तरह प्रभावित करने वाले फरसेरियम विल्ट अथवा पनामा रोग से उत्तर प्रदेश और बिहार में फसल को व्यापक नुकसान से बचाने के लिए प्रयोगशालाओं में टिशू कल्चर से रोग मुक्त पौधे तैयार किये जायेंगे। लेकिन यहां भी लॉक डाउन का असर हुआ है और आवागमन पर लगी रोक के कारण प्रयोगशालाओं में टिश्यू कल्चर से केले के पौधे तैयार करने तथा पनामा विल्ट बीमारी की रोकथाम के लिए तैयार दवा को किसानों तक पहुंचने में वैज्ञानिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पर रहा है।
सस्ते केला बेचने को मजबूर किसान

कर्नाटक के शिवमोग्गा में केला किसानों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण उनकी फसलें सड़ रही हैं। बाजार में यदि इक्का दुक्का खरीदार हैं भी वो भी सस्ते दामों पर केला बेचने को मजबूर कर रहे हैं। केला उत्पादक किसान विजयेंद्र का कहना है कि हमें उम्मीद थी कि चढ़ती गर्मी में केला कारोबारियों की फसल अच्छी बिकेगी। लेकिन कोरोना के कारण अचानक हुए लॉक डाउन ने सारे किये कराये पर पानी फेर दिया। विजयेंद्र ने चार एकड में केले की खेती की है। उनका कहना है कि सिर्फ वहीं नहीं हजारों की संख्या में बड़े छोटे किसान इस ईलाके में केले की खेती करते हैं। लेकिन बाजार में खरीदार न होने के कारण माल बाहर नहीं जा पा रहा है और स्थानीय व्यापारी चार—पांच रूपये केले बेचने को उकसा रहे हैं। यदि वे ऐसा करते हैं तो केला किसानों को काफी घाटा होगा। यदि वे नहीं बेचते हैं तब भी उनके केले सड़ जायेंगे। ऐसे में किसान समझ नहीं पा रहे हैं कि आगे का रास्ता क्या है।

क्या है उत्तर प्रदेश, बिहार के केला किसानों का हाल
जैसा कि उपर बताया गया कि इन राज्यों में भी केला किसान परेशान है। उनके परेशानी का कारण है फरसेरियम विल्ट अथवा पनामा रोग। यह रोग आमतौर पर पूरे विश्व में केले के फसल को व्यापक तौर पर नुकसान पहुंचाता है। लखनऊ स्थित केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान ने इस समस्या के समाधान के लिए किसानों को रोगमुक्त टिशू कल्चर से तैयार पौधे उपलब्ध कराने के लिए लखनऊ के ही सात्विक बायोटेक के साथ करार किया था। आईसीएआर फूसीकॉन्ट तकनीक से नर्सरी स्तर पर ही पनामा रोग पर नियंत्रण पाये जाने की दिशा में काम भी कर रहा था। लेकिन अचानक हुए लॉकडाउन के कारण प्रयोगशालाओं में टिश्यू कल्चर से केले के पौधे तैयार करने तथा पनामा विल्ट बीमारी की रोकथाम के लिए तैयार दवा को किसानों तक पहुंचने में वैज्ञानिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पर रहा है।
लॉक डाउन लॉक हो गई केला किसानों की किस्मत

टिश्यू कल्चर से प्रयोगशलाओं में उच्च गुणवत्ता के रोग मुक्त तैयार किए जाने वाले केले के पौधे के लिए उत्तर भारत में जाने वाला केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (सीआईएसएच) लखनऊ की प्रयोगशालाएं लॉकडाउन के कारण बंद हो गई थी लेकिन वैज्ञानिकों के अथक प्रयास से 70 प्रतिशत कल्चर को बचा लिया गया था। संस्थान मार्च के अंतिम सप्ताह में इस स्थिति में नहीं था कि टिश्यू कल्चर को जारी रखा जाए या नहीं। जैसे—जैसे तापमान बढ़ेगा इससे केला की फसलों को काफी नुकसान होने की संभावना है और यह गंभीर महामारी का रूप पकड़ सकता है। हालाकि वैज्ञानिकों ने इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित क्षेत्रों को चिन्हित कर दिया है। सरकार ने भी इस दिशा में पहल करते हुए रोकथाम में लगे कृषि वैज्ञानिकों और टिश्यू कल्चर को लाकडाउन से मुक्त कर दिया गया है।
क्या है बीमारी के लक्षण

यह  बीमारी जमीन में विकसित होने वाले फफूंद से फैलती है। फंफूद केले की जड़ के माध्यम से उसके तने में पहुचंता है तथा पानी और पोषक तत्वों के प्रवाह को रोक देता है। इस बीमारी का प्रकोप बढ़ने पर पहले पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं और बाद में पौधा ही गिर जाता है। रोगग्रस्त टिशू कल्चर सामग्री और बाढ़ के कारण भी यह बीमारी तेजी से फैलती है। करीब 20 साल पहले दक्षिण पूर्व एशिया में इस बीमारी का पता चला था। इस बीमारी से केले के बाग पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं और किसानों को भारी अर्थिक नुकसान होता है।

 

क्या कहते हैं वै​ज्ञानिक

सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ सबट्रापिकल हार्टिकल्चर के निदेशक डॉक्टर शैलेंद्र राजन का कहना है कि यह घातक फंगस पनामा फ्यूजेरियम विल्ट पिछले कई सालों से सक्रिय है, जिस पर काबू पाने के लिए हर देश में अपना-अपना तरीका अपनाया जा रहा है। भारत में खेतों के बीच आइसोलेशन और टिश्यू कल्चर नई पौध को तैयार कने का तरीका अपनाया है। टिश्यू कल्चर से नई पौध का 70 फीसद हिस्सा ही तैयार हो पाया है। तत्काल इस बीमारी से बचाव का एक ही रास्ता है कि एक खेत को दूसरे खेत से अलग रखा जाए।’ प्रभावित खेत की मिट्टी व पानी से दूसरे खेत को बचाना होता है। टिश्यू कल्चर वाले पौध ही लगाए जाएं। इसीलिए सरकार ने टिश्यू कल्चर और रोकथाम में लगे लोगों को लाकडाउन से मुक्त कर दिया है।
वहीं इंडियन काउंसिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आइसीएआर) के महानिदेशक डॉक्टर त्रिलोचन महापात्र का कहना है कि ‘केला की फसल में फ्यूजेरियम विल्ट की महामारी आने वाले महीनों में उग्र हो सकती है। इसके लिए आइसीएआर के पास फ्यूजीकांट प्रणाली है, जिसका उपयोग इसके प्रबंधन में सक्षम है। लेकिन कोरोना के चलते लागू लाकडाउन के दौरान यह संभव नहीं हो पा रहा था। तापमान बढ़ने के साथ ही पहले से विकसित बायोकंट्रोल एजेंट का सक्रिय करना होता है।’ इस फंगस पर काबू पाने के लिए एक प्रोजेक्ट मंजूर किया गया है।
सीएसएसआरआई के प्रधान वैज्ञानिक दामोदरन ने बताया कि वह दवा दिए जाने वाले किसानों के संपर्क में हैं। बीमारी से गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में चरणबद्ध ढंग से दवा उपलब्ध कराई जानी है। उन्होंने कहा कि दवा केवल एक ही जगह उपलब्ध है, इसलिए उनका नैतिक दायित्व है कि वे किसानों को समय पर दवा उपलब्ध कराएं।

यूपी और बिहार में बीमारी का प्रकोप

आइसीएआर के वैज्ञानिकों के मुताबिक केले की फसल में यह रोग फिलहाल केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में ही व्याप्त है। देश के अन्य राज्यों में इसका प्रकोप अभी नहीं है। इससे उत्तर प्रदेश के सात जिलों बिहार के पांच जिलों में इसका प्रकोप है। बिहार के वैशाली ,पूर्णिया , कटिहार , खगड़िया तथा कई अन्य जिलों में व्यापक पैमाने पर केले के बाग है । उत्तर प्रदेश के भी कई जिलों में केले की खेती की जाती है। इन जिलों के कई स्थानों में पनामा रोग की समस्या पायी गयी थी जिसका लम्बे समय तक अध्ययन किया गया । वैशाली जिले में केले की मालभोग प्रजाति को इस बीमारी से दशकों से भारी नुकसान हुआ था। डाक्टर राजन का कहना है कि अगर किसान कुछ समय तक दूसरी फसलों की खेती कर लें तो संभव से उस खेत से यह फंगस खत्म हो जाए। इसके लिए किसानों की जागरुकता पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। सीएसएसआरआई के प्रधान वैज्ञानिक दामोदरन ने बताया कि वह दवा दिए जाने वाले किसानों के संपर्क में हैं। बीमारी से गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में चरणबद्ध ढंग से दवा उपलब्ध कराई जानी है। उन्होंने कहा कि दवा केवल एक ही जगह उपलब्ध है, इसलिए उनका नैतिक दायित्व है कि वे किसानों को समय पर दवा उपलब्ध कराएं।

इस बात की भी संभावना है कि 14 अप्रैल को 21 दिन की अवधि पूरी होने के बाद भी देशव्यापी लॉकडाउन को आगे बढ़ाया जा सकता है। कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस में कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लॉकडाउन बढ़ाने की अपील की थी। ऐसे में सरकार ने टिश्यू कल्चर और रोकथाम में लगे लोगों को लॉकडाउन से मुक्त करने का इन किसानों का लाभ हो सकता है लेकिन सरकार को दक्षिण भारत के विजयेंद्र जैसे केला उत्पादकों को रहे नुकसान की भी सुधी लेनी होगी तभी इन किसानों के लिए आगे का रास्ता बन सकता है।

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