<stroसूखे से निपटने की नायाब योजना लेकर आई है बिहार सरकार। वह ग्रामीण क्षेत्रों में जो तालाब सूख गए हैं, उनमें नलकूप से पानी भरने जा रही है। गर्मी के मौसम में सूखे तालाबों को नलकूपों के पानी से भरने की यह योजना मत्स्यपालन को बढ़ावा देने के लिहाज से तैयार की गई है। मंत्री अवधेष कुमार सिंह ने कहा कि तालाबों में ़नलकूप से पानी भरने के लिए 50 प्रतिषत अनुदान दिया जाएगा। मत्स्यपालन से जुडी सहकारी समितियों को प्राथमिकता दी जाएगी। सूखे की हालत को देखते हुए यह योजना आकर्षक लगती हैं। इससे मत्सपालन और पषुओं के पेयजल की समस्या का फौरी समाधान भी हो सकता है। परन्तु प्रष्न यह है कि सूखाड की वजह से उत्पन्न समस्याओं का वास्तविक समाधान ऐसी योजनाओं से हो सकता है ? हर दो-चार साल में ऐसी हालत बन जाती है। दरअसल, ऐसी योजनाओं की वजह से बिहार का जलसंकट गहरा होता जा रहा है और संकट के वास्तविक स्वरूप की समझ भी नहीं बन पा रही है। बिहार के उन इलाकों की हालत अधिक खराब है जो अतिवृष्टि और बाढग्रस्त कहलाते हैं।
बिहार समेत देष के आधे हिस्से में सूखे की हालत है। देष के 29 राज्यों में से 9 राज्यों ने आधिकारिक तौर पर सूखा की घोषणा कर दी है। 18 राज्यों में औसत से कम वर्षा हुई है। देष के 640 जिलों में से 302 जिलों में औसत से 20 प्रतिषत कम बारीष हुई। यह सुखाड का लगातार तीसरा साल है। अकालग्रसत राज्यों -तेलांगना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेष, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तरप्रदेष, ओडीसा और मध्यप्रदेष में हालत अधिक खराब है। हालांकि केन्द्र सरकार ने नवंबर के तीसरे सप्ताह में अल्प वर्षा वाले सभी राज्यों को सूखा के बारे में तत्काल ज्ञापन देने का निर्देष दिया। राज्यों को राष्ट्रीय सूखा राहत कोष से सहायता पाने के लिए वित्तीय ज्ञापन भी प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। जानकारी मिलने के बाद केन्द्रीय टीम स्थिति का जायजा लेने और आवष्यक सहायता का आंकलन करने के लिए राज्यों का दौरा करेगी। सूखा राहत मद में सहायता पाने के लिए नवंबर तक कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेष और महाराष्ट्र के ज्ञापन मंत्रालय को मिल चुके थे।
बिहार में सुखाड़ जैसी हालत उत्पन्न होने की घोषणा जून में ही हो गई थी और हालत से निपटने के लिए सरकारी कवायद आरंभ हो गई। सरकारी कवायद का मतलब-डीजल अनुदान और दूसरे मदों में सरकारी धन का आवंटन। वैसे इसतरह के अनुदान की रकम कभी वास्तविक किसानों तक पहुंच नहीं पाती, दूसरे यह इतना कम होता है कि उन्हें खास राहत नहीं मिलती। फसल मारी जाती है। सच्चाई यही है कि इन अनुदानों, मौजूदा सिंचाई योजनाओं और कृषि विकास की तमाम घोषणाओं के बावजूद बिहार के खेतों की उपज लगातार घट रही है। डीजल और खाद का खर्च लगातार बढ़ रहा है। वर्षा लगातार कम होती गई है। नेपाल से आने वाली नदियों में पानी घट गया है। इसके मददेनजर जल संरक्षण के उपाय और जल की किफायती इस्तेमाल निहायत जरूरी हो गया है। पर सरकारें लगातार वैसी एकांगी योजनाएं लेकर सामने आती हैं, जो कालांतर में समस्या को बढाने वाली साबित होगी। नलकूपों से तालाब भरने की योजना ऐसी ही है। इससे भूगर्भ जलभंडार का दोहन बढ़ेगा जबकि वहीं तालाब वर्षाजल के संचय के माध्यम बन सकते हैं जिनसे भूगर्भ जल भंडार का पुनर्भरण हो सकेगा।
मत्स्यपालन के लिहाज से कम गहरे तालाब बनते हैं क्योंकि वे तेजी से बढने वाली नस्ल की मछलियों के अधिक अनुकूल होती हैं और मछली के कारोबार में अधिक कमाई हो पाती है। जबकि जलसंचय के लिहाज से गहरे तालाब अधिक उपयोगी होते हैं। उनमें देषी नस्ल की मछलियों का पालन भी हो सकता है। उन नस्लों की मछलियों की कीमत भी अधिक होती है, पर कम समय में अधिक आमदनी के फेर में कारोबारी तथाकथित उन्नत नस्ल की मछलियों का पालन करते हैं। सरकारी तौर पर उन्हीं तथाकथित उन्नत नस्ल के मत्स्यपालन को प्रोत्साहित किया जाता है।
बिहार में इस वर्ष औसत से 31 प्रतिषत कम बारिष हुई है। परन्तु खरीफ फसल में धान का आच्छादन 97.71 प्रतिषत और मक्के का आच्छादन 89.7 प्रतिषत हुआ है। आंकडों के इस मकडजाल का सच केवल इतना है कि बीचडे़ लगाने से लेकर रोपाई तक नलकूपों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। अब फसल को सूखने से बचाने में डीजल का एकमात्र सहारा है। धान की फसल में फूलों के दाने बनने के समय ं पानी की भरपूर जरूरत होती है। इसके मद्देनजर नवनिर्वाचित सरकार ने तीन बार डीजल अनुदान देने, रब्बी फसलों को भी डीजल अनुदान के दायरे में लेने इत्यादि घोषणाएं की। इस मद में 430 करोड आवंटित हो चूके हैं। पिछले आठ वर्षों से 15 जून से 15 जुलाई के बीच औसत से कम बारिष हो रही है। यह धान के बीज डालने का समय है। इस वर्ष उस दौरान लगभग 32 प्रतिषत की कमी रही। कम बारिष की वजह से इस दौरान केवल 16 प्रतिषत खेतों में समय पर बुआई हो सकी। नलकूप का सहारा लेने के पहले किसान वर्षा का भरपूर इंतजार करते हैं। केवल वही किसान बिचडा डाल पाए या उसे सूखने से बचा पाए जिनका सामर्थ डीजल खरीदने की थी। और बिजली विभाग को ग्रामीण क्षेत्रों में आठ-दस घंटा बिजली देने का निर्देष भले मुख्यमंत्री दें, पर बिजली चालित पंपों की संख्या बहुत कम है। जिन इलाकों में नहरें हैं, वहां अंतीम छोर तक पानी पहुंचने में समस्याएं उत्पन्न होती हैं। बिजलीचालित पंप खासकर उन्हीं इलाकों में अधिक है।
उत्तर बिहार के बाढग्रस्त जिलों की हालत अधिक खराब है। पचास साल पहले तक इन गांवों में जरूरत के मुताबिक तालाब होते थे। पोखर ग्राम्य जीवन के अभिन्न अंग होते थे। इनसे कई प्रयोजन सिद्ध होते थे। बरसात के मौसम में वर्षा जल इनमें संचित होता था। बाढ़ आने पर वह पानी पहले तालाबों को भरता था। गांव और बस्ती डूबने से बच जाते थे। अगर कभी बडी बाढ़ आई तो तालाबों के पाट, घाट मवेषियों और मनुष्यों के आश्रय स्थल होते थे। अगर बाढ नहीं आई तो अगले मौसम में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होता था। तालाबों से सिंचाई के लिए पानी निकालने की कई तकनीकें प्रचलित थी। इसके कई उपकरण थे। एक उपकरण था करीन, जिसका जोड़ षायद अन्यत्र नहीं मिलता। पर करीन तो अब विलुप्त हो गए हैं। नई पीढी के लोगों ने करीन देखा भी नहीं होगा। हालांकि बीस-तीस साल पहले यह पूरे मिथिलांचल में तालाब से सिंचाई करने का सबसे अधिक प्रचलित उपकरण था। बड़े खेतों की सिंचाई में इसका उपयोग होता था। यह काठ का पतला, लंबा नावनुमा उपकरण होता है जिसे रस्सी और बांस के सहारे तालाब के किनारे लगाया जाता है। बैलेंस-पुली तकनीक से इसके एक सिरे को पानी में डाला जाता और फिर निकालने पर दूसरे सिरे से पानी उलीचा जाता है। अब नलकूप गाडने वाले कारीगर लगभग उसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। जब अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत हो तो बांस की टोकरी में रस्सी बांधकर उपकरण बनाया जाता है जिसे दो आदमी मिलकर पकडते और झटके से पानी उलीचते। यह पानी मोरियों के सहारे खेतों में पहुंचा दिया जाता। बाद में जब डीजल पंप आए तो उन पंपों से भी तालाब का पानी निकाला जाने लगा। डीजलपंप लगाकर तालाब से पानी निकालना नलकूप से पानी निकालने की अपेक्षा सस्ता होता है। सूर्य की रोषनी और हवा के संपर्क से तालाब का पानी अधिक गुणवत्तापूर्ण होता है।
तालाबों की परंपरा पूरे मिथिलांचल रही हैं और उनके नष्ट होने का असर भी पूरे इलाके पर पडा है। तालाबों में एकत्र जल भूमिगत कूंडों से सीधे संपर्क के कारण सदा तरोताजा बना रहता है और सूर्य के ताप के प्रभाव में विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों का स्वतः उपचार कर स्वयं को षुद्ध और स्वच्छ बनाए रखता है। इनमें एकत्र जल रिस-रिसकर भूजल-कूंडों को भरता है। तालाबों का भू-जलकूंडों से संपर्क दोतरफा लाभदायक होता है। उसके सतह पर पडी वर्षा की बूंदें अपनी आवेगिक गति और ष्षक्ति के कारण भूगर्भ में अधिक गहराई तक जाती हैं। यही कारण है कि कूंए और तालाब आज भी भूगर्भ के इस्तेमाल के भी सर्वोत्तम साधन बने हुए हैं।
कूओं का उपयोग यद्यपि सीमित प्रयोजनों से होता था। पहले इसे पेयजल का बेहतरीन स्रोत माना जाता था। भूगर्भीय जल-कूंडों से संपर्कित होने से इसका जल तरोताजा बना रहता है। आज जब भूजल में आयरन, फलोराईड, आर्सेनिक इत्यादि हानिकर रसायन निकलने लगे हैं, तब उनके निराकरण का उपाय खोजना पडता है। ऐसे में कुओं की प्रासंगिकता और उपयोगिता बढ़ गई है। भूजल में इन जहरों के बारे में षोध करने वाले वैज्ञानिकों ने कुओं को बेहतरीन पाया है। खुली हवा, सूर्य की रोषनी और भूगर्भीय जलकूंडों के प्रत्यक्ष संपर्क की वजह से कुओं में ऐसे रसायनों का प्राकृतिक उपचार हो जाता है। पेयजल के स्रोत के तौर पर कूंओं का इस्तेमाल करने में केवल इतना ध्यान रखना होता है कि उसमें गंदा पानी नहीं जाए, केवल वर्षा का षुद्ध जल ही एकत्र हो। इसके खास इंतजाम किए जाएं। उंचा जगत बने। उसकी नियमित मरम्मत की जाए। संभव हो तो बरसात को छोडकर बाकी दिनों में कूएं को ढंककर रखा जाए। समय-समय पर नीम के पत्ते या चूना डालकर कीटाणु रहित बनाए रखने के इंतजाम किया जाए। कूएं से पानी निकालने में पहले आमतौर पर बाल्टी-डोरी का व्यवहार होता है। कूंओं के अधिक गहरा होने पर चरखी भी लगाई जाती है। चापाकल की तकनीक आने के बाद कुएं में पाइप डालकर पंप भी लगाए गए। पर विकास के विकास के मौजूदा दौर में तालाबों और कूओं की संपूर्ण भूमिका की व्यावहारिक तौर पर अनदेखी की गई।
सूखे के वर्तमान दौर में बिहार में जल प्रबंधन के मौजूदा तौर तरीकों की समीक्षा करने और तालाब, कूएं आहर-पइन की परंपरागत प्रणाली को अपनाने की जरूरत रेखंाकित हुई है। इसे कहने की जरूरत नहीं।