कांग्रेस का आरोप.. चाह्कर भी मनरेगा को पंगु न कर पाए मोदी

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पंचायत खबर डेस्क

मोदी सरकार द्वारा मनरेगा की सराहना किये जाने के बाद कांग्रेस अब आक्रामक हो गयी है। मनरेगा पिछले बीस महीनों के दौरान लगातार मनरेगा को विधिवत पंगु बनाने के सभी प्रयास कर चुकने के बाद, आज नरेंद्र मोदी की सरकार अचानक मनरेगा का गुणगान करने लगी है । यह वही मनरेगा है जिसने ग्रामीण भारत के करोड़ो श्रमिकों को रोज़गार और आजीविका का कानूनी अधिकार दिया और जिसे मोदी ने कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी विफ़ल योजना बताई थी । एक दशक पहले ग्रामीण भारत के भाग्य विधाता श्रमिक जो अपनी आजीविका के लिए पलायन करने पर मजबूर थे उन्हें उनकी रोजगार की गारंटी का अनुपम अधिकार 2 फरवरी 2006 को पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की प्रमुख सोनिया गांधी जी की प्रेरणा से संसूचित किया गया। यह योजना ग्रामीण भारत की आजीविका की सुरक्षा और समावेशी विकास का सशक्त माध्यम है। यह समूचे विश्व का ऐसा पहला कानून है जिसमें व्यापक पैमाने पर रोजगार गारंटी की प्रदान की गई है । प्रथम चरण में इसे देश के 200 सर्वाधिक पिछड़े जिलों में लागू किया गया था तथा दूसरे चरण में 2007 – 2008 में इसे देश के 130 और जिलों में लागू किया गया । अंततः 1 अप्रेल 2008 में देश के सभी ग्रामीण जिलों में अधिसूचित कर दिया गया। आज यह योजना देश के 662 जिलो के 6858 ब्लॉक और उनके तहत आने वाली 257710 ग्राम पंचायत में लागू है । बीते 10 वर्षो में इस योजना के तहत 1986 . 31 करोड़ व्यक्ति दिवस का रोजगार सृजित किया है तथा इस पर 314877 . 12 करोड़ रु खर्च किये गए हैं । एक ओर अपने क़ानूनी अधिकार को पाकर ग्रामीण भारत का श्रमजीवी उत्साह से भरा हुआ था, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी प्रारंभ से ही इसके प्रति नकारात्मक रवैया अपनाए हुए थी । हद तो तब हो गई जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2015 को मनरेगा के खिलाफ लोकसभा में यह कह दिया कि ” यह जो आप गड्ढ़े खोद रहे हो यह 60 साल के पापों का परिणाम हैं और यह योजना आपकी विफलता का जीता जागता उदाहरण है।”

manदेश में मोदी सरकार जब से आई है वो ग्रामीण भारत के श्रमजीवियों के इस अधिकार को लगातार कमजोर कर रही है । आज इस कानून के तहत अपने 100 दिन के रोजगार पाने के अधिकार से ग्रामीण परिवारों को लगातार वंचित किया जा रहा है । जहाँ 2012 – 2013 में 5173487 और 2013 – 2014 में 4659347 परिवारों को 100 दिनों का रोजगार मिलता था, वह घटकर लगभग आधा रह गया है, अर्थात 2014 – 2015 में 2493840 और 2015 – 2016 में मात्र 2045161 परिवारों तक सिमट गया है । आज देश भर में 13 .13 करोड़ जॉब कार्ड हैं और उस पर श्रमिको की संख्या 27 . 59 करोड़ हैं । जिसमें से एक्टिव जॉब कार्ड मात्र 6 . 35 करोड़ और एक्टिव श्रमिक 9. 83 करोड़ । उनमें 19 . 6 % अनुसूचित और 15 . 22 % अनुसूचित जनजाति के हैं । बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि भीषण सूखे के बावजूद जनवरी माह 2016 में 19513989 परिवारों ने मनरेगा के तहत काम की मांग की और काम सिर्फ 8675141 लोगों को मुहैया कराया गया। इतना ही नहीं कानून के तहत काम नहीं दे पाने पर सरकार को वंचित लोगों को भत्ता देना होता है मगर भत्ता भी बहुत ही सीमित संख्या में दिया गया ।   यह स्थिति अप्रैल 2016 से ही लगातार बनी हुई है । आज एवरेज रोजगार मोदी सरकार में 2015 – 2016 में सूखे के बावजूद 39 . 98 दिन का ही रह गया हैं । आज मजदूरों को समय पर मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है जिससे निराश मजदूर मनरेगा में काम की अपेक्षा पलायन कर रहा है । जहाँ 2012 – 2013 में 7 . 97 कऱोड लोगों को काम उपलब्ध कराया गया था वहीं मोदी सरकार में 2014 – 2015 में 6 . 22 करोड़ और 2015 – 2016 में 5 . 7933 करोड़ अर्थात 2 करोड़ से अधिक लोगों को निरुत्साहित किया गया ।

जहाँ कांग्रेस सरकार मनरेगा पर 2012 – 2013 में 39778. 27 करोड़ और 2013 – 2014 में 38552. 62 करोड़ खर्च करती थी वहीं मोदी सरकार ने इसको   कम करते हुए 2014 – 2015 में 36033 . 81 करोड़ और 2015 – 2016 में 34226 . 8 करोड़ खर्च किये । इतना ही नहीं योजना की पारदर्शिता के लिए कानून में सोशल ऑडिट का प्रावधान है, मगर दुर्भाग्य है कि 662 जिलों मे से वित्तीय वर्ष के अंत तक सिर्फ 145 जिलों में सोशल ऑडिट अभी सिर्फ प्रारम्भ किया गया है । कांग्रेस आशा करती है की अब जबकि मोदी और उनकी सरकार और भाजपा को मनरेगा के गुणो का आभास हो गया है, तो वह इस अभूतपूर्व क़ानून को संवर्धित कर, मौसम और सरकारी बेरूखी की मार झेल रहे ग्रामीण भारत में मनरेगा का समुचित क्रियान्वयन करेंगे ।

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