अब न वह गांव है, न वे लोग हैं, न वह परिवेश है…

हरिवंश जिस गांव में शिक्षा की भूख बढ़ी, वह भी खुद के कारण नहीं, अध्यापकों के कारण. वे पुराने किस्म के अध्यापक थे, धोती-कुर्ता वाले, हर साल इंक्रीमेंट और तनख्वाह बढ़ाने के लिए आंदोलन करने वाले नहीं, बल्कि अपने बच्चों को शिक्षित करने की प्रक्रिया में आत्मसुख पाने वाले (अपवाद हर दौर में होते हैं, … Continue reading अब न वह गांव है, न वे लोग हैं, न वह परिवेश है…