July 14, 2020

कंक्रीट का जंगल उगाना तो ठीक पर्यावरण को दरकिनार कर नहीं बचेगा जीवन

डॉ रणविजय निषाद

कालान्तर में भौतिक समृद्धि के साथ सम्पूर्ण विश्व उत्तरोत्तर प्रगतिपथ पर अग्रसर है, तो दूसरी तरफ हमारी उदात्त सभ्यता और संस्कृति से विमुखता, भोगवादी जीवनशैली के कारण जल-थल और वायुमण्डल पूर्णतयः संदूषित हो चुका है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, जल का अतिशय दोहन, प्राकृतिक संसाधनों का अविवेकपूर्ण प्रबंधन तथा ईंट-भट्टों की अत्यधिक संख्या होने के कारण पूरे देश-प्रदेश में किसानों की कमर, फसलों तथा बागानों की गिरती उत्पादन क्षमता ने तोड़ कर रख दिया है तो दूसरी तरफ आम जनजीवन धुंध धुंआ, कोहरा, स्मोग और फाग या अत्यधिक गर्मी/ठन्ढक की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। । ईंट बनाने वाली चिमनियाँ तथा सडकों का चौडीकरण आज अभिशाप बन गयी हैं। जिन क्षेत्रों में ईंट पकाने के लिए चिमनियाँ धधक रही हैं वहां बागानों से आम,अमरूद,नींबू,केला,बैर तथा आंवला जैसे उपयोगी बाग सूख रहे हैं या बांझपन के शिकार हो रहे हैं।


कहने को तो तीन चौथाई जलांचल है पर सम्पूर्ण जलांचल औधोगिक कल-कारखानों,सीवर, अधजले शव,वन- उन्मूलन व जलीय जन्तुओं के आखेट के कारण समवेत अपराधी की भांति बह रहा है। जिसके पीने से जलीय जीवों के साथ ही साथ मानव जीवन भी संकट में है। 80% बीमारियाँ प्रदूषित पानी के सेवन से होती हैं।

उदाहरण के रूप में यदि कौशाम्बी जनपद को ही लें तो ए तरफ कौशाम्बी जनपद का ऐतिहासिक महत्व बौद्ध भूमि के रूप में विश्व के मानचित्र पर हम सब को गौरवान्वित करता है तो दूसरी तरफ जनपद का दिन-प्रतिदिन गिरता जलस्तर भयावहता की ओर ले जाता प्रतीत हो रहा है। जनपद के आठ ब्लाकों में से कड़ा, सिराथू, मंझनपुर तथा मूरतगंज पूरी तरह से डार्क जोन में चले गये जहाँ का जलस्तर तीसरे चैम्बर में अर्थात 280 से 350 फिट बोरिंग पर पानी मिलता है। सरकारी तन्त्र ने वर्ष 2012 में कौशाम्बी के इन ब्लाकों में सबमर्सिबल के बोर पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया था। नेवादा और कौशाम्बी ब्लाक सेमी डार्क जोन में हैं यहाँ का जल स्तर 180 से 200 फिट पर है। सरसंवा ब्लाक में नहरों के कारण 100 से 120 फिट बोरिंग पर पानी मिलता है। अतः पर्यावरण व जलीय संकट चिन्ता व चिन्तन का विषय है।
वर्त्तमान में जो पेड़-पौधे विष-पान करते थे उनकी मूढमति लोगों ने बिना सोचे समझे खूब कटाई की है, जिन चील-गिद्ध-बाज़ों से वायुमण्डल की सफाई होती थी वे डाइक्लोबिन युक्त गाय व भैसों का मांस खाने से मरने लगे। कालसर्प व गौरय्या आंगन से गायब हो गयी हैं। स्मरण रहे कि सर्प भी विषैली गैसों का पान करता है तथा आॅक्सीजन देता है।
कालान्तर में अत्यधिक पेट्रोलियम पदार्थों के सेवन व ईंट-भट्टों से निकलने वाली ट्राइक्लोरोइथिलीन,कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन डाईऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसी विषयुक्त गैसों ने सम्पूर्ण वायुमण्डल को प्रदूषित कर दिया है। आज वायुमण्डल विषैली गैसों का पर्याय बन गया है। जिसके कारण अम्लीय वर्षा (स्टोन-लैप्रोसी: ताजमहल के संगमरमर का पीलापन होना) व रक्षा कवच ओजोन पर्त(क्लोरोफ्लोरोकार्बन के कारण) छिद्रित होने से सूर्य की पराबैगनी किरणें निर्बाध रूप से हमारे त्वचा को नुकसान पहुंचा रही हैं और कैंसर जैसी घातक बीमारियों को जन्म दे रही हैं। परिणामतः पशु-पक्षियों के साथ मानव जीवन भी संकट में है।

ईंट-भट्टों से निकलने वाली गैसों के कारण आमों में मञ्जूषा नहीं लगती आस-पास के लोग दमा-स्वांस व घुटन महसूस कर रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिव्यक्ति लगभग 200 से 600 ग्राम कूड़ा-कचरा प्रतिदिन उतपन्न करता है। सायंकाल वायुमण्डल मे विषैली गैसों के मिश्रण से बनी पेराॅक्सी एसिटिलीन नाइट्रेट (PAN) गैस के कारण ही आंखों में मिर्च व जलन जैसा महसूस होता है जो नेत्र विकार का प्रमुख कारण है। आज जल व पर्यावरण प्रदूषण, मानव एवं प्रकृति के परस्पर सम्बन्ध की पुनःसमीक्षा को प्रस्तावित करती है। इस बात को समझना होगा कि हम प्रकृति को जीत नहीं सकते हैं,प्रकृति की गोद में जाना ही श्रेयस्कर होगा। वायु जिसमें हम सांस लेते हैं हमारे स्वस्थ जीवन का एक आवश्यक घटक है। दुर्भाग्य से आज हम जिस हवा में सांस लेते हैं वह अत्यधिक प्रदूषित हो गई है। विकसित व भारत जैसे विकासशील देशों में भी वायु प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है। हवा में लगातार नए-नए खतरनाक पदार्थ जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, ग्रीनहाउस गैस आदि सामान्य स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करती हैं। शहरों में बढ़ती जनसंख्या औद्योगीकरण में वृद्धि, मोटर वाहनो की बढती मांग,ईंट भट्टे प्रदूषण में वृद्धि के मुख्य कारण हैं । इसके साथ ही कमजोर पर्यावरण विनिमय,भीड़ भाड़, खराब सड़कें और वाहन के खराब रखरखाव भी इस में योगदान देते हैं। प्रदूषण से जानवर ,पशु ,पक्षी एवं वनस्पति बुरी तरह से प्रभावित हैं। NGT व कोर्ट के रिपोर्ट के बाद ईंट भट्टों को पूर्ण रूप से बन्द कर, सीमेन्टेड ईंट को बढावा देकर स्क्रैब व अन्य अपशिष्ट का समुचित इस्तेमाल किया जा सकता है।
वायुमण्डल में प्रदूषण से ओज़ोन परत जो हमें सूर्य की हानिकारक विकिरणों से बचाती है का क्षय होता है । ओज़ोन परत के क्षय होने से अनुचित पराबैंगनी किरणें हमारे वायुमंडल में सीधे प्रवेश कर जाती हैं, जिससे मनुष्य को आनुवांशिक विकृति ,जीन परिवर्तन एवं त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। प्रदूषण पेड़-पौधों, जीव जंतुओं के जीवन को ही नष्ट कर सकता है। ओज़ोन परत में कमी से पौधों में प्रकाश संश्लेषण पर भी नकारात्मक प्रभाव देखा गया है । शासन-प्रशासन को ईंट-भट्टों को तत्काल प्रभाव से सीज कर देना चाहिए। तथा आम जनमानस में “पौध लगाओ-जीवन बचाओ” ; “जल बचाओ-जीवन बचाओ” व जलीय स्वच्छता के प्रति जनजागरण फैलाकर अधिकाधिक वन लगाने की आवश्यकता है।
(लेखक पेशे से शिक्षक व पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।)

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