August 20, 2019

पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी

                                                                                                                                                

हेमा म्हस्के

भारतीय महिलाओं को संविधान में 73वां संशोधन कर जो अधिकार दिए गए हैं वह अपने देश में विभिन्न क्रांतिकारी परिवर्तनों में प्रमुख है। इस संशोधन के बाद पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित किया गया है। संशोधन के मुताबिक महिलाओं के लिए भी सभी स्तरों की पंचायतों में कुल सीटों का एक तिहाई भाग आरक्षित किया गया और यही व्यवस्था पंचायत के प्रधान/प्रमुख/अध्यक्ष के पद के लिए भी सुनिश्चित की गई है। यह व्यवस्था देश में आजादी के 45 वर्ष बाद 1992 संविधान में 73वें संशोधन के बाद वजूद में आई। पिछले 27 सालों में पंचायती राज के चुनावों में करोड़ों महिलाएं भागीदारी कर चुकी हैं। चुनावों की प्रक्रिया में शामिल होने के बाद महिलाओं में गजब का आत्मविश्वास आया है और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी भी बढ़ी है।

जानकार बताते हैं कि संविधान में 73वां संशोधन कर महिलाओं को जो अधिकार दिया गया, वह अभूतपूर्व पहल है। ऐसी पहल भारत के सैकड़ों सालों के इतिहास में कभी नहीं की गई। भारतीय महिलाओं को इस तरह की आजादी गौतम बुद्ध के जमाने में पहली बार मिली, जब उन्होंने अपने संघ में महिलाओं के प्रवेश के लिए दरवाजे खोल दिए। ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक तब बौद्ध धर्म की भिक्षुणियां बनने के लिए भारी संख्या में महिला घर की दहलीज पार कर बाहर आई। इससे समझा जा सकता है कि उस समय महिलाएं कितनी घुटन में जी रही थीं। इसके बाद दूसरा दौर भक्तिकाल के दौर में आया, जब भक्त कवियों के प्रोत्साहन में महिलाएं घरों से बाहर आई और भक्ति में रमीं। फिर तीसरा दौर भी आया जब महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई में महिलाओं को खुलकर शामिल होने की अपील की। भारतीय महिलाओं के इतिहास में अब तक आए परिवर्तनों में तीन बार ही ऐसा दौर आया जब महिलाओं को समान महत्व मिला लेकिन यह सब परिवर्तन उनके निजी जीवन तक ही सीमित थे। वे घरों से बाहर जरूर आए पर उनके पास वे अधिकार नहीं थे, जिससे वे अपने स्तर पर कोई निर्णय ले सके। ऐसा मौका उन्हें पहली बार तब मिला, जब भारतीय संविधान में 73वां संशोधन किया गया। इस संशोधन के बाद पंचायती राज चुनावों में महिलाओं की अप्रत्याशित रूप से भागीदारी बढ़ी। वे जीतीं, हारीं और जीत कर पंचायतों में अपने प्रयासों को सामने लाकर लोगों को चौकाया पर कई जगहों पर उनको हताश भी होना पड़ा क्योंकि यह संशोधन जरूर किया गया पर भारतीय समाज में जनजागरण के कार्य नहीं किए गए जिससे पुरुष वर्ग उनके सहकार कर सके। महिलाएं जीत कर आई लेकिन जब अधिकारों के इस्तेमाल की बारी आई तो उन्हें पतियों के दबाव में आकर पीछे हटना पड़ा या पति जो चाहते वही उन्हें करने के लिए विवश होना पड़ा। कमोबेश आज भी यही स्थिति बरकरार है लेकिन जहां महिलाओं को स्वतंत्र से अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया और पंचायतों की हालत में सुधार लाया। कुछ जगहों पर उन्होंने इतना बेहतर कार्य किया जिसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती। महिलाएं पंचायती राज व्यवस्था में स्वतंत्र रूप से कार्य कर सके। इस दिशा में जागृति की बहुत जरूरत है और केंद्र और राज्य सरकारों को सचेत होकर महिलाओं को सशक्त करने के अभियान चलाने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो महिलाओं को दिए गए अधिकार किताबों तक सीमित रह जाएंगे।

समाज की रचना और व्यवस्था में महिलाएं और पुरुष समान रूप से महत्वपूर्ण है। दोनोें एक—दूसरे के पूरक भी हैं। किसी एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं है। संबंधों और जिम्मेदारियों के निर्वाह में योगदान की दृष्टि से महिलाएं सदैव आगे दिखाई पड़ती है लेकिन फिर भी जब बात अधिकारों के प्रयोग और किसी मामले में निर्णय लेने की आती है तो महिलाओं को कमतर आंका जाता है। अब समय आ गया है कि यह सोच बदलनी चाहिए और महिलाओं को प्रदत्त अधिकारों के मुताबिक स्वतंत्र होकर कार्य करने का मौका दिया जाना चाहिए। देश और ग्राम सभा में लगभग आधी सदस्य महिलाएं हैं। उनका श्रम, विचार और निर्णय, गांव के विकास के लिए जरूरी है। बहुत से कार्य केवल महिलाएं ही कर सकती हैं, इसलिए उनसे जुड़ी समस्याओं का निवारण महिलाएं बेहतर ढंग से कर सकती हैं। परिवार की तरह ग्राम सभा में भी दोनों की समान सहभागिता हेनी चाहिए।

संविधान में 75वें संशोधन में महिलाओं को 33 फीसदी का आरक्षण दिया गया है। वे पंचायतों के सभी पदों पर चुनी जा रही हैं और अपनी जिम्मेदारियों के निर्वाह का प्रयास कर रही है। अब महिलाएं भी ग्राम सभा और ग्राम पंचायतों की बैठकों में हिस्सा लेती है। वे सरकारी अधिकारियों के साथ अच्छे तालमेल के साथ कार्य कर रही है। महिला पंचायत सदस्यों ने पुरुषों के मुकाबले अपने को अधिक जवाबदेह तरह से प्रस्तुत किया है। महिलाओं के कार्यों में ज्यादा ईमानदारी देखी जा रही है। गांव स्तर की समस्याओं के समाधान की समझ महिलाओं में अच्छी है। इन्होंने आपस में मिलकर अपनी जरूरतों के हिसाब से समाधान निकाला है। महिला सदस्यों के कार्य को देखते हुए गांव की अन्य महिलाएं भी प्रोत्साहित हुई है। महिलाओं की भागीदारी पहले से महिलाओं और बच्चों से संबंधित मुद्दों पर अब ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है।

इन सबके बावजूद बहुत कुछ करने की जरूरत है, जिससे महिलाओं को भागीदारी और समझ पर उचित निर्णय लेने के अधिकार सुनिश्चित किए जाएं। इसके लिए यह कोशिश करनी होगी कि बैठकों का आयोजन महिलाओं के सुविधानुसार किया जाए। पंचायत के कार्यों में महिलाओं को भाग लेने के लिए प्रोत्साहन और सहयोग दिए जाएं। महिला पदाधिकारियों को इनकी जिम्मेदारी के कार्य उनके संबंधी स्वयं ना करके उन्हें सहयोग देकर खुद करने दें। महिला की जानकारी दी जाए और उनके विचारों का सम्मान हो। ग्राम सभा की बैठकों में महिलाओं को अपनी बात कहने और निर्णय लेने का अवसर प्राप्त हो।

इसके अलावा प्रतिनिधियों की बाधाएं दूर करने के प्रयास किए जाएं। महिलाओं में शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। पुरुषों के गैर प्रभावों को कम किया जाए। उनके ज्ञान और कौशल को बढ़ाया जाए। आर्थिक रूप से उन्हें स्वतंत्र होने में मदद की जाए। महिला प्रतिनिधियों को सार्वजनिक जगहों पर भाषण देने, नेतृत्व करने, कार्यालय और वित्तीय प्रबंधन और बैठक आयोजित करने और संचालित करने का प्रशिक्षण दिया जाए। महिला प्रतिनिधियों को रचनात्मक कार्यों के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक, मीडिया, शिक्षा और सांस्कृतिक क्षेत्रों के प्रसिद्ध लोगों के साथ बातचीत कर सकें।

(लेखिका पुणे में लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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