August 17, 2018

किसानों की आमदनी तभी दोगुनी होगी, जब महिला किसानों को मिले बराबरी का हक

 

संतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली: आंकड़े बताते हैं कि लोग खेती किसानी छोड़ रहे हैं..सरकार कहती है कि किसानों की आमदनी 2022 तक दुगुनी हो जाएगी..जबकि सच्चाई यह है कि खेती किसानी में काम अब ज्यादातर महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है क्योंकि पुरूष पलायन कर रहा है..और महिलाओं को आप किसान नहीं मानते..महिलाओं को भूमि पर अधिकार नहीं..इसलिए वह सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पातीं ऐसे में बड़ा सवाल कैसे बहुरेंगे खेती किसानी के दिन..कैसे उनकी आमदनी दुगुनी होगी।

जी हां, इन्हीं सब सवालों पर भारत के अलग अलग हिस्सों से महिला किसान प्रतिनिधियों ने खुद को किसान के रूप में मान्यता देने के साथ सरकार से किसानों वाले अधिकार दिए जाने की भी मांग की है।ये महिला किसान दिल्ली में राष्ट्रीय विमर्श के तहत विभिन्न सरकारी मंत्रालय और एजेंसियों के सामने अपनी बात रख रही थीं। महिला किसानों के अधिकारों पर इस राष्ट्रीय विमर्श का आयोजन राष्ट्रीय महिला आयोग, महिला किसान अधिकार मंच और यूएन वीमेन की ओर से किया गया था।

क्या कहा महिला प्रतिनिधियों ने

इतना ही नहीं इन महिला प्रतिनिधियों ने ये भी मांग की कि महिलाओं को ज़मीन और संसाधनों पर व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर हक मिले। साथ ही किसानों के लिए बनायी गयी विभिन्न सरकारी योजनाओं में बराबरी की हिस्सेदारी की भी मांग भी महिला किसानों की तरफ से उठी।

इन लोगों ने ये भी मांग कि है कि अगर सरकार वास्तविकता में किसानों की आमदनी को दोगुनी करना चाहती है तो उसे महिला किसान संगठनों को वित्तीय मदद, प्रोत्साहन और कर में छूट जैसी सुविधाएं प्रदान करनी होंगी।

इन महिलाओं ने किसानों के ज़मीन पर स्वामित्व के मानकों पर सवाल उठाए हैं। इतना ही नहीं इन महिलाओं ने किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति (2007) के मुताबिक ज़मीन के स्वामित्व के परिभाषा के अनुपालन नहीं होने पर भी सवाल उठाए हैं।

इस मौके पर राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरपर्सन ललिता कुमारमंगलम ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं के नाम खेती की ज़मीन और ज़मीन के रिकॉर्ड में होने चाहिए और महिलाओं को किसान के तौर पर मान्यता मिले तभी उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाएगा।

उन्होंने कहा, “खेती किसानी में महिलाओं की भूमिका को मान्यता मिलनी चाहिए और उसे मदद भी मिलनी चाहिए। इस बैठक में महिला किसान प्रतिनिधियों और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बातचीत हुई ताकि महिला प्रतिनिधियों की आवाज़ को सुना जाए और उनकी समस्याओं के मुताबिक सरकार काम कर सके.”

क्या कहती हैं महिला किसान

तमिलनाडु की अमृतमदुराई ने महिला किसानों की समस्या के बारे में कहा, “खेती किसानी में महिलाएं हर क्षेत्र और हर फसल में अपना योगदान देती है, लेकिन उन्हें किसान नहीं माना जाता है। वास्तव में ज़मीन पर महिलाओं को अधिकार देने, मौजूदा क़ानून- हिंदू उत्तराधिकार एक्ट के बावजूद इस  लिहाज से अनुपालन नहीं होता है।”

“इतना ही नहीं, मौजूदा रूझान से चीज़ें और भी ख़राब हो रही हैं। विकास की योजनाओं के नाम पर जिस तरह ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा है, उसमें महिलाओं और उनके क़ानूनी अधिकारों की उपेक्षा की जा रही है। ऐसे में महिलाओं की आधारभूत ज़रूरतें पूरी होने पर भी सवालिया निशान लगता दिख रहा है। चूंकि पुरुषों के नाम पर ज़मीन होती है लिहाजा महिलाओं को मुआवजा भी नहीं मिल पाता है। जब पुरुषों की मौत होती है, जिसमें खेती किसानी के दबाव के चलते आत्म हत्या भी शामिल है तब महिलाओं को जमीन नहीं मिल पाता है क्योंकि कानून का अनुपालन ठीक से नहीं होता है।”

“भूमिहीन दलित के घर का मामला हो तो ऐसी स्थिति में महिलाओं को जमीन देने के लिए सार्वजनिक नीति का भी अभाव है। सार्वजनिक संपत्ति के संसाधन से महिलाओं की आजीविका मिल सकती है, लेकिन उसे भी छिना जा रहा है।”

तमिलनाडु अमृतमदुराई ने ये भी कहा, “इन सबसे महिला किसानों की आजीविका पर असर तो पड़ता ही है, साथ ही घर में और सामुदायिक स्तर पर महिलाओं की स्वायतता पर भी असर होता है।” महिला किसान अधिकार मंच के राष्ट्रीय समन्वय टीम के सदस्य सेजल ढांड ने बताया कि ये समस्या इतनी बड़ी है कि जमीन का रिकॉर्ड लिंग भेद आधार पर दर्ज नहीं होता है, इस दिशा में राज्य सरकार को तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। भारतीय खेती किसानी में महिलाओं की भागीदारी को बताने वाला आधारभूत आंकड़ा मौजूद नहीं है, जिसके चलते प्रगतिशील नियमों और नीतियों के अनुपालन की निगरानी की जरूरत है।

उत्तराखंड के महिला उमंग उत्पाद कंपनी की सुनीता कश्यप ने कहा, “सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के बारे में काफी प्रचारित कर रही है, लेकिन जिस उत्तराखंड राज्य से मैं आती हूं वहां, जंगली जानवरों के हमले के लिए कोई बीमा नहीं है।”

“महिलाएं अपने फसल की सुरक्षा के लिए दिन रात खेतों में रहती हैं, इससे हमारा काम काफ़ी बढ़ जाता है और नुकसान भी काफ़ी होता है, इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।”

सुनीता ने ये भी बताया कि महिला किसानों के सामूहिक उत्पाद में नए आयकर प्रावधानों और जीएसटी के चलते मुनाफ़ा कम हो रहा है। सुनीता ने बताया, “हम लोग जैम और आचार के साथ ऊन के उत्पाद भी बनाते हैं, लेकिन हमें कर में कोई छूट नहीं मिलती है। जीएसटी के चलते हमें 12 फ़ीसदी टैक्स चुकाना पड़ता है, कई बार ये हमारे ग्राहकों से भी नहीं मिल पाता है। सरकार किसानों की आमदनी को दोगुना करने की बात करती है लेकिन इससे आमदनी कम हो रही है। इसलिए हम महिला किसानों के उत्पाद संगठनों पर सभी तरह के टैक्स से छूट देने की मांग करते हैं।”

आंध्र प्रदेश के मालिहगारिपल्ली महिला किसान एफपीओ के नागेश्वरअम्मा ने जलवायु परिवर्तन का जिक्र करते हुए खेती किसानी को और भी लचीला बनाए जाने की बात कही।

नागेश्वरअम्मा के मुताबिक उनके राज्य में कई अच्छी योजनाएं चलती हैं, जिन्हें दूसरे राज्यों में भी अपनाए जाने की जरूरत है। उनके मुताबिक खेती का ख़र्च कम करने की ज़रूरत है ताकि कर्ज कम हो सके।

उन्होंने ये भी कहा कि चूंकि महिलाओं के नाम पर खेती की ज़मीन नहीं होती है लिहाजा उन्हें सरकारी योजनाओं का कोई फ़ायदा नहीं मिल पाता। खेती के लिए क्रेडिट, बीमा और मार्केटिंग सब जगह ऐसा होता है। नागेश्वरअम्मा के मुताबिक महिला किसानों को खेती के क्षेत्र में ज्यादा निवेश की ज़रूरत है।

 

 

 

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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