October 14, 2019

नरेंद्र मोदी के जल संरक्षण की सलाह को जन अभियान बनाने में जुटे मनोहर लाल

संतोष कुमार सिंह
गांव का तालाब किधर है? जवाब में चाय की दुकान पर खड़े ग्रामीण ने बड़े अनमने भाव से कहा, सर इब वो तालाब नहाणे जोगा कोनी रह्या, मंदर में धौक मारणी हो तो अलग बात सै। अब तो सारे गांवा में ही योही हाल सै। यो एक गांव की बात न है,सारे हरियाणा में योही हाल है। अब तो सारे देश का योई हाल है। लोग पानी ने तरसै सै। सहसा ही पूछ बैठता हूं कि क्या सरकार ने तालाब बचाने के लिए काम नहीं किया? सरकार ने तालाब बचाण खातिर तो खूब कोशिश करी लोगों का साथ न मिलन क कारण सारा काम अधूरा सै। पहले तो लोगबाग खुदही तालाब बनाया करते, तालाब का पानी पीणे के काम आता,ढ़ोर डांगर नवाने खातिर भी काम आया करते। लेकिन अब तालाब रहे ही कित है। यह सुनते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी पारी शुरू होने के बाद किये गये ‘मन की बात’ की सहसा याद आ जाती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के नागरिकों ने जिस तरह से देश के नागरिकों ने स्वच्छता अभियान को जन अभियान बनाया,उसी तरह जल संचय को भी अभियान बनाया जाना चाहिए ताकि वैसे ही जल संरक्षण के लिए एक जन आंदोलन की शुरुआत हो। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा था कि हमारे देश में पानी के संरक्षण के लिए कई पारंपरिक तौर-तरीके सदियों से उपयोग में लाए जा रहे हैं। जल संरक्षण के उन पारंपरिक तरीकों पर लोगों से चर्चा किया जाना चाहिए। जल संरक्षण के उन पारंपरिक तौर तरीकों में ही एक है ‘तालाब’। उन्होंने कहा कि जल की महत्ता को सर्वोपरि रखते हुए देश में नया जल शक्ति मंत्रालय बनाया गया है। इससे पानी से संबंधित सभी विषयों पर तेज़ी से फैसले लिए जा सकेंगे।

हरियाणा मे चल रहा है विशेष जल संरक्षण अभियान

वैसे तो हरियाणा में मनोहर लाल की सरकार आने के बाद से ही लगातार जल संभरण के क्षेत्र में प्रयास किये गये हैं। तालाबों के संरक्षण के साथ नहरी पानी का विस्तार, हर घर नल का जल जैसी योजनायें चल रही हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के आह्वाण के बाद ‘जल शक्ति अभियान’ की दिशा में हरियाणा ने तेजी से कदम बढ़ाया है। सरकार द्वारा 01 जुलाई से 15 सितम्बर तक चलाए जा रहे ‘ विशेष जल संरक्षण अभियान’ हरियाणा के सभी 19 जिलों में चलाया जा रहा है। इस दौरान प्राकृति जल स्त्रोतों व तालाबों का जीर्णोद्धार भी किया जाएगा, साथ ही 400 नये तालाब भी बनाये जायेंगे। साथ ही साथ हरित क्षेत्र के विस्तार की दिशा में पौधारोपण भी अभियान में प्रमुख रूप से शामिल रहेगा। साथ ही वर्षा जल संचय की दिशा में जिला क्षेत्रों में किए गए प्रेरणादायक कार्यों को भी एक-दूसरे से सांझा करने पर बल दिया। इस काम में सरकार के साथ ही ग्राम पंचायत,गैर सरकारी संगठन, कार्पोरेट क्षेत्र व छात्र सब मिलकर काम करेंगे ताकि वर्षा जल संचय के विषय में लोगों की जागरूकता बढ़े। इतना ही नहीं प्रदेश में अलग—अलग जगहों पर चल रहे राहगिरी के जरिए भी जल बचाओ,जीवन बचाओ, जन शक्ति फॉर जलशक्ति जैसा अभियान चलाकर आम लोगों को पानी बचाने और वर्षा जल संचय के प्रति जागरूक किया जाएगा।

ग्रामीणों का मिल रहा है साथ

सरकार की पहल को आम जनता का साथ मिल रहा है। लोग जल संरक्षण का महत्व समझ रहे हैं, उन्हें पता है कि जल बचेगा तभी जीवन बचेगा। यही कारण है कि ढ़िगावा क्षेत्र में महिलाओं ने मानसूनी बारिश के फुहाड़ के पहले ही घरों की छत साफ सुथरी करना शुरू कर दिया है। ये महिलायें मानसून में आने वाली बरसात का पानी घर की टंकियों आदि में सहेज कर रखा जाएगा। वर्षा जल संरक्षण के प्रति अमीरवास गांव की महिलाओं में खासी जागरूकता दिख रही है। जल संकट से निपटने और भूजल को और नीचे जाने से बचाने के लिए में गांव अमीरवास की महिलाओं ने बरसाती पानी को नालियों बहने से रोकने के लिए घर में ही संचय करने का निर्णय लिया है। सरपंच मंजू देवी कहती हैं कि पानी का महत्व समझाने के लिए हमारी टीम दिनरात लगी है। मानसून आ रहा है बरसाती पानी को बचाने के लिए भी लोगों को समझाया जा रहा है कि बरसाती पानी हमारे लिए जीवदान से कम नहीं है। वे बरसाती पानी को नालियों में न बहने दें उसका संचय जरूर करें। हम यह बात घरों में जाकर महिलाओं को समझा रहे हैं। हमारे गांव में 118 घर हैं और करीब 600 की आबादी। गांव में महिलाओं की टीम बनाई जाएगी। महिलाओं की यह टीम घर-घर जाकर बरसाती पानी संचय करने और इसके फायदों के विषय में लोगों को जागरूक कर रही है।

हरियाणा के गावों में तालाबों की रही है परंपरा

हरित प्रदेश हरियाणा के ग्रामीण समाज में समृद्ध जल परंपरा रही है। गांव—गांव तक फैला तालाब इन्हीं परंपराओं का द्योतक है। पहले गांव की परिभाषा में उसके तालाबों की गिनती होती थी। गांव बसने से पहले तालाब बनाया जाता था। जहां तालाब नहीं, पानी नहीं, वहां गांव नहीं। तालाब का काम पहले होगा तब उसको आधार बनाकर गांव बसेगा। यहां तक की लोग गांव की आबादी पूछने से बदले पूछा जाता था कितने तालाबों का गांव है। तालाब समाज के मन में रहा है, कहीं-कहीं तो उसके तन में भी। तालाबों को अलग—अलग नामों से जाना जाता था मसलन सागर, सरोवर, सर जोहड़-जोहड़ी, बंध-बंधिया, ताल-तलैया तथा पोखर-पोखरी, डिग्गी आदी। अंबाला में अभी भी कई तालाब हैं जो डिग्गी कहलाते हैं। महाभारत काल के तालाबों में कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसर, करनाल की कर्णझील आज भी हैं और पर्वों पर यहां लाखों लोग इकट्ठे होते हैं। यहां तक की सन 1993 का कांग्रेस अधिवेशन भी दिल्ली की सीमा पर सूरजकुंड में हुआ था। वह ऐतिहासिक तालाब भी आज पट चुका है। तालाबों की सर्वत्र की जा रही उपेक्षा का ही कारण है कि पानी संकट बढ़ता जा रहा है।

आज भी खरे हैं तालाब

ऐसा नहीं है कि आज हरियाणा के गांवों में तालाब नहीं है। आज भी गांवो में तालाब खरे हैं लेकिन उसका स्वरूप बदल गया है। पहले तालाब के निर्माण से लेकर उसके उड़ाही,रखरखाव की जिम्मेवारी समाज की होती थी। उसने साद को समस्या की तरह नहीं बल्कि तालाब के प्रसाद की तरह ग्रहण किया था। गांव के किसान, कुम्हार और गृहस्थ न सिर्फ तालाब का निर्माण करते बल्कि वे मिट्टी काटते, अपनी गाड़ी भरते और इसे खेतों में फैला कर उनका उपजाऊपन बनाए रखते। इस प्रसाद के बदले वे प्रति गाड़ी के हिसाब से कुछ नकद या फसल का कुछ अंश ग्राम कोष में जमा करते थे। फिर इस राशि से तालाबों की मरम्मत का काम होता था। यह माना जाता कि तालाब की उड़ाही समाज की सेवा है, श्रमदान है। गांव के हर घर से काम कर सकने वाले सदस्य तालाब पर एकत्र होते थे। हर घर दो से पांच मन मिट्टी निकालता था। काम के समय वही गुड़ का पानी बंटता था। पंचायत में एकत्र हर्जाने की रकम का एक भाग उड़ाही के संयोजन में खर्च होता था।

अब मानी जाती है सरकार की जिम्मेवारी

जैसे—जैसे समय बदला ग्रामीण समाज की तालाबों को लेकर ग्रामीणों की रुचि कम होती गई। गांवों में तालाब अब लुप्त होने के कगार पर हैं,जहां हैं भी वहां भी तालाब के रखरखाव की समस्या है। यहां तक की अब तालाबों की सुंदरता भी खत्म हो रही है, नतीजतन तालाब के अन्दर जाने के लिए जहां सीढि़यां दिखाई नहीं देती, वहीं तालाब के किनारों का भी कोई अता पता नहीं चलता। तालाबों का वजूद समाप्त होने पर सबसे ज्यादा परेशानी पशुओं को हो रही है क्योंकि कई गांवों में तो तालाब पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।

दशकों पुरानी है यह समस्या

तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों के सूखने या बर्बाद होने का सिलसिला दशकों पुराना है। इसे 1900 के आसपास विवाहों के अवसर पर गाई जाने वाली ‘गारियों’, विवाह-गीतों के जरिये भी समझा जा सकता है। बारात जब पंगत में बैठती तो स्त्रियां “फिरंगी नल मत लगवाय दियो” गीत गातीं। लेकिन नल लगते गए और जगह-जगह बने तालाब, कुएं और बावड़ियों के बदले ‘वाटर वर्क्स’ से पानी आने लगा। नल के जल के बढ़ते चलन की वजह से लोगों को अपनी जरूरतों के लिए पीने का पानी तो मिल जाता है लकिन इसके चलते पशुओं को पीने व नहाने के लिए भारी मशक्कत का सामना करना पड़ रहा है।

केंद्रीय कार्यक्रमों का हरियाणा में सफल कार्यान्वयन

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार की ज्यादातर फलैगशिप कार्यक्रम चाहे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ हो या फिर आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, कौशल विकास के कार्यक्रम, हर घर बिजली पहुंचाने के लिए म्हारा गांव,जगमग गांव योजना इन सभी में मनोहर लाल के नेतृत्व में पिछले साढ़े चार वर्षों में न सिर्फ लंबी दूरी तय की है,बल्कि बाकी के राज्यों के लिए मिसाल भी कायम किया है। प्रधानमंत्री के मन की बात के जरिये जल संपदा की स्थिती को लेकर चिंता जताये जाने के बाद से ही हरियाणा में तेजी से इस दिशा में काम होना शुरू हो गया है और उम्मीद की जा सकती है कि बाकी के कार्यक्रमों की तरह इस अभियान को भी हरियाणा मनोहर लाल के नेतृत्व में जनअभियान बनाने में सफल होगा।

(हरियाणा एक्सप्रेस से साभार)

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