November 16, 2019

संसाधनों के अभाव में कम हो रहा है ग्राम्य जीवन का सद्भाव

डाॅ सदानंद शाही
जिस गांव से जीवन की यात्रा शुरू हुई उस गांव का नाम सिंगहां है। जब मेरा जन्म हुआ तब यह गांव देवरिया जिले की सीमा में आता था। आगे चलकर देवरिया से नया जिला बना कुशीनगर। रामकोला कस्बा से 10 किलोमीटर उत्तर की ओर है हमारा गांव।

एक जमाने में देवरिया जिले को भारत का क्यूबा कहते थे। चीनी बहुत होती थी। हमारे जिले में मुख्य रूप से गन्ने की खेती होती। देश के अधिकांश कृषक परिवारों की तरह ही हमारे गांव में भी ज्यादातर छोटे जोत के किसान परिवार है। मुख्यतः गन्ने की खेती पर ही आजीविका निर्भर है। धीरे-धीरे गन्ना मिलें बंद होती चलीं गई तो लोगों ने बाकी फसलें गेहूं, धान, मक्का और आजकल कुछ लोगों ने केले की खेती शुरू की है। यदि अपने ग्राम्य जीवन की बात करूं तो सब चीजें अब उस तरह से रह नहीं गयी है। ग्राम्य जीवन में संसाधनों की कमी है, अभाव है और पहले की तरह सद्भाव भी नहीं रह गया है।

पहले जब किसी के घर में कोई मेहमान आता था या कोई भी आयोजन होता था तो लोगों के घर से सामान आ जाता था, लोग बिस्तर मांग के लाते थे। कई बार तो बिना मांगे ही जिसके खेत में जो भी सब्जियां होती थी, वह खुद ही पहुंचा देता था। केला, कटहल, पटल, रमतोरई जो भी हो लोग मिल बांट के खाते थे। अभाव के बावजूद ग्राम्य जीवन में एक तरह के सामूहिकता का भाव था। ये चीजें धीरे-धीरे कम हुई हैं। दिखावा बढ़ा है। नतीजा यह है कि इर्ष्या, द्वेष, तरह-तरह के झगड़े गांव का आम परिदृश्य हो गया है। मेरा गांव भी अलग नहीं है।

हमने जिस प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा प्राप्त की वहां मात्र दो शिक्षक थे जगदीश नारायण राय और महात्म पांडे। मुख्य रूप से दो विषयों की पढ़ाई होती थी गणित यानी गिनती पहाड़ा, गुणा, भाग आदि। दूसरी भाषा की पढ़ाई होती थी। वह प्राथमिक स्कूल जिसने हमें गढ़ा, वह अब उपेक्षित हो गई है। जबकि बुनियादी तौर पर विचार करें तो किसी भी गांव के विकास के मानक यही हैं कि गांव में शिक्षा केंद्र, चिकित्सा केंद्र आदि ठीक हों। पंचायती राज व्यवस्था के बावजूद ये विकसित नहीं हो पाए हैं। अब शिक्षकों का उपयोग शिक्षकेत्तर कार्यों मसलन-मिड डे मिल से लेकर जनगणना के कार्यों में किया जाने लगा है।

यदि भाषा के सवाल पर गौर करें तो आम जनमानस में यह धारणा बन गई है कि अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा ग्रहण नहीं करेगा तो कल्याण नहीं होगा। गांव-गांव तक फैल चुके खुदरे किस्म के अंग्रेजी माध्यम स्कूल पैसे कमाने का साधन तो बने लेकिन शिक्षा के माध्यम नहीं बन पाए। नतीजा यह हुआ कि परोक्ष रूप से भोजपुरी और प्रत्यक्ष रूप से हिंदी व गणित जो प्राथमिक स्कूलों में बच्चों का मजबूत कराया जाता था, वह कमजोर होता चला गया। अंग्रेजी मीडियम के कारण हिंदी भोजपुरी से अलग मानी गयी और बच्चे अंग्रेजी भी नहीं सीख पाते। इस तरह से प्राथमिक शिक्षा का पतन होता चला गया।

गांव के जीवन की दो चीजें मुझे प्रेरित करती हैं। जब भी गांव के घर जाता हूं तो वहां से हिमालय दिखाई देता है। हमारी इलाके की मिट्टी काली है। हमारे गांव की हवा में जो नशा है उस नशे का संबंध भांग से है। परती-परात में खूब भांग होती थी। इसको लेकर मेरे किशोर मन ने एक कल्पना कर रखी थी। शिवरात्रि बड़े जोरशोर से मनाई जाती थी। इस अवसर पर एक छोटा मेला लगता था। हमारे किशोर मन की कल्पना की उड़ान गांव से दिखाई देते हिमालय तक जाती और मन में यह बात बसी हुई थी कि हिमालय पर शिव रहते हैं। शिव को भांग पसंद है। जरूर हमारे गांव के इलाके में भांग के लालच में शिव आते रहते होंगे। तमाम अभाव, असुविधाओं के बाद भी गांववालेे खुश-खुश रहते हैं तो मुझे लगता है कि कहीं न कहीं शिव की छाया उनके उपर आती है। इस बात ने हमारे मन में बड़े उदात्त तत्व को जन्म दिया। हिमालय की भव्यता, शिव का मंगल, भांग की मस्ती, एक उदात्त तत्व मेरे चित्त को विशाल बनाने वाला। मेरे मन ने इसे गांव से जोड़ा। छुद्रता, स्वार्थ, इष्र्या, द्वेष से उपर उठने में इसने मदद की।

गांव के दशहरे के मेले की याद आज भी आती है। दशहरे पर बड़ा मेला लगता था और मंगलवार, बृहस्पतिवार और शनिवार को गंवईं बाजार लगता था जो अब खत्म हो गया। बाजार और मेले का आकर्षण हर बच्चों की तरह मेरे मन में भी होता था। खेल, तमाशे लगते थे जो खत्म हो गए। अब इसके स्थान पर गांव में एक चैराहा कायम हो गया है। दारू का अड्डा भी खुल गया है। एक तरह की सांस्कृतिक चेतना जो होली गाते-मनाते गांवों में दिखाई देती थी, वह चेतना दारू के अड्डे में डूबी हुई दिखाई देती है। सामूहिकता का भाव घीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। शहर के अंधानुकरण ने गंवई संस्कृति को दूषित करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

कुशीनगर में भगवान बुद्ध की निर्वाण भूमि है और बुद्ध जहां पैदा हुए वह जगह लुंबिनी हमारे गांव से 100 किलोमीटर है। ऐसा लगता है कि उस पूरे इलाके में बुद्ध की छाया है। बुद्ध ने महसूस किया सब्बम दुखम। वो दुख हमारे गांव के आस पास दिखाई पड़ता है। उसकी कराह भी सुनाई पड़ती है लेकिन यह भी लगता है कि इस भूमि पर बुद्ध की छाया है। यह छाया हमारे गांव के इलाके पर बनी हुई है। जिस धरती पर मैं चलता हूं उस धरती पर बुद्ध भी चलते रहे होंगे। यह जो बुद्ध की उपस्थिति वातावरण में महसूस करते हैं, यह भी हमें उदात्त बनाने और बड़ा बनाने में प्रेरित करती है। इस तरह से अलग तरह की दार्शनिकता हमारे ग्राम्य जीवन में दिखाई देती है।

‘‘अंखिया से अंखिया मिलाव ए बलमुआ ए जिंदगी के कौन बा ठिकान’’ तो सारी मारपीठ, झगड़ा-झंझट ईर्ष्या-द्वेष के बाद भी यह दार्शनिक बोध कि जीवन नश्वर है, यह नश्वरता उदासीन नहीं करती है। जीवन ने जो अवसर दिया है उसे मना लेने को प्रेरित करती है। मुझे लगता है कि यह कहानी भारत के हर गांव की है। गांव-गांव की है।

दो बातें हमें बचपन से बताई और पढ़ाई गई थी कि हमारा देश ग्राम प्रधान देश है, कृषि प्रधान देश है लेकिन कृषि को लाभकारी बनाने और कृषक जीवन को उन्नत बनाने के प्रयास नहीं हुए जो हुए भी, वे कारगर सिद्ध नहीं हुए।

लोक कवि घाघ ने कहा था-उत्तम खेती मघ्यम बान, निखित चाकरी, भीख निदान। एक जमाने में खेती को अच्छा माना जाता था। अब मामला एकदम इसके उलट हो गया है। लोग नौकरियों की ओर जाते है क्योंकि इसमें कुछ पैसा मिल जाता है। जबकि खेती इतनी जटिल हो गयी है कि वह जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पा रही है। इसी कारण पलायन हो रहा है। गांव में शिक्षा, चिकित्सा केंद्र पर्याप्त संख्या में होते तो बुनियादी जरूरतों के लिए शहर में आने की जरूरत न होती। एक तरफ शहरी ढ़ांचे चरमरा रहे हैं वहीं दूसरी ओर गांव सुविधा के अभाव में खाली होते जा रहे हैं।

आधुनिक व्यवस्था के अंदर, लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर ऐसा स्वायत्त, आत्मनिर्भर गांव बनाए जाने की जरूरत है जहां ग्रामीण खेलकूद जैसे कबड्डी, खोखो, चिक्का, कुश्ती आदि परंपरागत खेलों को बढ़ावा देने का माहौल हो। इन खेलों की विशेषता यह है कि एक तरफ जहां यह सामाजिकता को मजबूत करता है वहीं दूसरी ओर बिना किसी अलग से खर्चीले साधन की व्यवस्था किए बिना भी खेले जा सकते हैं। खेल लोगों को जोड़ने का काम करता है।

यदि गांव विकसित होंगे तभी शहरों की तरफ विस्थापन कम होगा और गांव आत्मनिर्भर हो सकेंगे। लेकिन दुर्भाग्य यह है आजादी के इतने दिनों बाद भी गांव हमारे नीति निर्माताओं की प्राथमिकता में नहीं हैं। खेती को लाभदायक बनाने की बात तो बहुत हो रही है, लेकिन जमीन पर इसका असर नहीं दिख रहा।
हिन्दी विभाग, बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय।

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