April 05, 2020

परंपरा की पगडंडी पर धूल-धूसरित हो लुप्त होती गांव की स्मृतियां…

गांव से मेरी स्मृति की डोर अस्सी के दशक के मेरे स्कूली दिनों से जुडी है। गर्मियों की छुट्टी में हम लोग हर साल सपरिवार गांव जाते थे। दिल्ली रूपी कंक्रीट के जंगल से दूर गांव में छप्पर की छांव तले दो-ढाई महीने व्यतीत होते थे। मेरे माता-पिताजी यूपी के उन्नाव जिले के पड़री खुर्द के एक छोटे से गांव तिवारी खेड़ा से ताल्लुक रखते है। उन्नाव जिला कानपुर व लखनऊ के बीच गंगा किनारे है। उन्नाव की जमीन से कवि-शायर और क्रांतिकारी उपजे है। निराला, अख्तर मोहानी और चंद्रशेखर आजाद इस जमीन से निकले मोती है। रोजगार की जरूरतें मेरे पिताजी को दिल्ली महानगर ले आयी, मगर अपनी मिट्टी से उनका जुड़ाव कभी खत्म नहीं हुआ। उनका शरीर बेशक दिल्ली में होता, परन्तु उनकी आत्मा गांव में ही बसती थी। पिताजी का गांव आना ऐसा होता था जैसे कोई बच्चा अपनी मां के आंचल की ओर लपकता है। मुझे याद है बस से उतर कर जब हम अपने गांव की जानिब सामान ढ़ोते हुए पैदल जाते थे तो रास्ते में कितने ही लोग रुक कर मेरे पिताजी से रामजोहार करते थे। छोटे उनके पैर छूते थे, बड़े उन्हें आशीर्वाद देते हुए शिकायती लहजे में पूछते थे कि लालू अबकी बहुत दिनन में आये? मेरे पिताजी हमारे खानदान में सबसे बड़े थे, उनका एक रौब था, हर समारोह में उनकी उपस्थिति लाजमी होती थी।

हमारे गांव में मुश्किल से 50 घर होंगे, हमारा टोला में तब चार घर थे। टोला का अर्थ एक ही जात-बिरादरी या खानदान से है। हमारा घर एकदम किनारे खेतों की तरफ था। घर के सामने कुआं था, जिसके शीतल पानी की मिठास अब तक मुझे याद है। आज हर घर में हैंडपंप लग गया है, लोग अब इस कुएं की तरफ रुख नहीं करते, इसमें जलस्तर भी बहुत नीचे जा चूका है। हमारे टोला का एकमात्र कुआं जिसने सालों हमारी प्यास बुझाई, आज किसी लाचार बुजुर्ग की भांति अपने अंतिम दिन गुजार रहा है।

मुझे अच्छी तरह याद है कि स्कूली दिनों में जब हम गांव जाते थे तब हमारा पैतृक घर कच्चा होता करता था, दुआरे में दो बड़े छप्पर किसी पहरेदार की भांति सर झुकाए दरवाजे पर तैनात रहते थे और धूप व बरसात से घर को बचाते थे। छप्पर के आगे एक नीम का बिरवा था और उस नीम के तले हमारी गाय बंधती थी जिसके थन से मुंह लगा कर मैं अक्सर दूध पी लिया करता था। गाय से मुझे विशेष स्नेह था और गाय के प्रति यह लगाव आज भी कायम है। मेरा दिन का बहुत समय गैय्या के पास ही गुजरता था, मई-जून की तपती दोपहरी में भी उस नीम की छांव तले जो शीतलता मिलती थी, वो आज वातानुकूलित कमरों में भी नसीब नहीं है। नीम तले टूटी खटिया डाल कर मनोहर कहानियां पढ़ा करता। हमारे गांव के घर में तब इस मैगजीन की प्रतियां पड़ी रहती थी)। समय इतना होता था कि काटे नहीं कटता था, इसीलिए हर पाठन सामग्री पढ़ लेता था। मेरे बगल में ही हमारी गाय चुपचाप बैठी जुगाली किया करती थी, मानो किसी गहन सोच में विचारमग्न हो। गाय के गोबर व मूत्र की उस सौंधी-सौंधी गंध का मुकाबला आज का एयर फ्रेशनर भी नहीं कर सकता, आज भी शहर में कभी गोबर की गंध महसूस करता हूं तो मुझे मेरे गांव का स्मरण हो आता है।

घर के करीब ही एक आम का बाग था जिसमे बंदरों की टोली अक्सर उधम चैकड़ी मचाए रहती थी। मैं अक्सर भरी दुपहरी उस बाग में अकेला ही चला जाता था और नीचे से बंदरों को पत्थर मारता था। गांव के एक दो कुत्ते भी मेरे साथ हो लेते थे। बंदर गुस्से में मुझे दांत दिखा कर डराते थे। इस खेल में एक अजब ही रोमांच था। शिकार वाली फीलिंग आती थी।आज उस बाग की जगह खेत ने ले ली है। बंदरों की टोली अब भी आती है,मगर घरों की मुंडेरों पर। बाग के बगल में ही एक तालाब था जो गर्मियों में भी पानी से लबालब भरा रहता था। मैं अक्सर वहां अपने भाइयों के साथ नहाने व मछली पकड़ने जाता था। पकड़ी हुई मछलियों को आग में डाल कर भून लेता था और वैसे ही खा भी लेता था। मछली मैं अब भी खाता हूं ,मगर वो सादगी भरा स्वाद फिर कभी नसीब नहीं हुआ। तब गांव में छोटे-बड़े करीब 8-10 तालाब थे जो सदा पानी से लबालब रहते थे। पानी की बहुतायत की वजह से इन तालाबों के निकट कई तरह के पक्षी व जल मुर्गियां भी प्रवास करती थी, कुछ का तो मैंने शिकार भी किया था। आज कुछ तालाब लुप्त हो चुके है, कुछ गन्दगी के ढेर में दब का अपना अस्तित्व खो चुके है और कुछ सूखे पड़े कराह रहे है,पक्षी और जल मुर्गियां भी नहीं रही।

गांव से होकर एक नदी भी गुजरती है जिसे लोन नदी कहते है। इसी नदी के किनारे एक टीला है जिसे स्थानीय भाषा में आंट कहा जाता है। यह टीला मुझे बचपन से ही आकर्षित करता था, कारण इस टीले के नीचे छुपा इतिहास। यहां से असंख्य टूटी-फूटी टेराकोटा से बनी हिन्दू देवी देवताओं की प्रतिमाएं ,हड्डियों के टुकड़े, जमीन से झांकते जली हुई दीवारों के अवशेष व पूरे टीले पर मिटटी के बर्तनों के टूकडे बिखरी पड़ी है। गंगा किनारे के इलाकों में बहुत से गाँवों में ऐसे टीले मौजूद है जिनमें दफन अतीत अपने खोजे जाने की बाट जोह रहे है। प्राचीन दौर में इंसानी बसावट नदी के किनारे ही होती थी। अतीत में कभी इस जगह कोई मंदिर थी जिसे शायद इस्लामिक आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया। अक्सर नदी की ओर जाते समय यहां ठहर जाता था और बिखरे इतिहास के साक्ष्यों द्वारा अतीत को समझने की कोशिश करता था। गांव में रहने के दौरान अक्सर नदी में नहाने जाया करता था, गर्मियों के महीनों में नदी के शीतल जल में नहाने का अपना ही आनंद था। परन्तु आज नदी की ओर कोई पशु तक नहीं जाता। तथाकथित विकास के कचरे ने इस नदी को एक बदबूदार नाले में परिवर्तित कर दिया है। उन्नाव में कई बूचड़खाने धड़ल्ले से गाय-भैंसों का वध कर रहे है। उनका मांस पैक कर के खाड़ी देशो को निर्यात किया जाता है और सारी गन्दगी इस नदी में प्रवाहित कर दी जाती है। जिस नदी ने इंसान व पशुओं को माँ बन कर पाला है और पिता बन कर जमीन को सींचती आयी है, आज नाले के रूप में अपनी अंतिम सांसें गईं रही है। पिछले बरस मैं जब गांव गया तो नदी का यह रूप देखकर मेरा दिल रो दिया।

वैसे तो हर पी​ढ़ी की अपनी अलग स्मृतियां होती होंगी लेकिन यदि अपने पीढ़ी की बात करूं तो उस पीढ़ी से संबंध रखता हूं जिसने सभ्यता, इंसान और परिवेश को बदलते देखा है। तीन दशक पहले जब गाँव आया करता था तब हर घर के आगे बैल बंधे होते थे, संपन्न घरों के आगे बैलगाड़ियां भी होती थी। बैलगाड़ी उस दौर की कार हुआ करती थी। उस वक्त को याद करके अब भी रोमांचित हो उठता हूं। जब हमें अपने गांव से अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे गांव जाना होता था, भोर में उठ कर बैलों को खिलाकर तैयार किया जाता था, गाड़ी की फर्श पर सूखी घास और उसके ऊपर चादर बिछा कर आरामदायक बना दिया जाता था और फिर सूरज उगने से पहले ही छुन-छुन घंटी बजाते अलमस्त बैल चल पड़ते थे हमारी मंजिल की ओर। यह सफर ४-५ घंटे का होता था, बातचीत व आपसी मेलजोल के लिए पर्याप्त समय होता था जिस वजह से रिश्ते प्रगाढ़ बनते थे। वापसी में बैलों को रास्ता बताना नहीं पड़ता था,वे इतने समझदार होते थे कि स्वयं उसी रास्ते से घर आ जाते थे। आज बाइक से उन्हीं गांवों का रास्ता महज आधे घंटे में तय हो जाता है, रिश्ते भी दो मिनट्स मैग्गी की तरह हो गए है, बात करने के लिए किसी के पास वक्त ही नहीं है। तब सफर लम्बा होता था मगर सुकूनदायक था, सड़कें कच्ची व धूलभरी थी मगर कभी कोई दुर्घटना नहीं होती थी। सड़क किनारे तब छायादार फलदार पेड़ हुआ करते थे जिनकी छांव में रुककर लोग सुस्ता लेते थे, आज स्ट्रीट पोल्स खड़े दिखते है। बैलों की जगह ट्रेक्टर ने ले ली और बैलगाड़ी की जगह बाइक ने। जिन बैलों ने सदियों से मानव इतिहास का चक्का खींचा था, आज तरक्की की सड़क पर राह भटक कर बूचड़खाने पहुंच गए हैं। कच्चे रास्तों पर बैलगाड़ी के चलने से बने गढ़ों के निशान हैं मगर बैलगाड़ी नहीं।

मेरे नजदीक एक आदर्श गांव की अवधारणा वह गांव कतई नहीं है जिसका शहरीकरण हो चुका है।

आदर्श ग्राम वही है जहां विकास की सड़क के साथ-साथ परंपरा की पगडंडियां भी चलती हों। पर अब जो गांव है,वहां न चिड़ियों की चहचहाहट है,न गौशाला की मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू। न बैलगाड़ी है,न घोड़ागाड़ी। न आम का बाग बचा है और न बगीचा, न हल है और न बैल। न खेत बचे,न खलिहान। जमीन के नाम पर जो टुकड़ा बचा है, उस पर पड़ोसी की गिद्ध नजर। यदि बचा पाया तो शायद गांव से जुड़े याद को समेटने-सहेजने के लिहाज से आखिरी सौगात होगी जिसे किसी कीमत पर बचाए रखना चाहता हूं,सहेजे रहना चाहता हूं, अपने साथ समेटे चलता हूं।

हां,पल पल गुजरते दोपहिया व चौपहिया वाहनों के हॉर्न जरूर खलल डालते हैं। यानी सिर्फ है मशीनी जीवन व मशीन का धुआं। न शाम ढले मंदिर से आती झाल और मृदंग की आवाज, यह बात और है कि घर से निकलते ही डेक पर बजता कानफोड़ू संगीत जरूर खलल डालता है। क्या भूलूं, क्या याद करूं? सब कुछ सपना सरीखा लगता है, मानों उंघते हुए सपनों में गांव का वर्तमान ढूंढ़ रहा होउं। मिलना क्या है, निराशा के सिवा। जिसे लोग गांव की तरक्की कहते हैं, उसमें न समाज बचा है, न समाजिकता, जहां न रिश्ता बचा है, न रिश्तेदारी। बस बंधे-बंधाए लीक पर चलता जीवन, जहां न उल्लास है, न अपनों से मिलने का हर्षोल्लास।

हमारे परिवार के अधिकतर लोग शहरों में आबाद हैं। अपने क्षेत्रों में खूब फल फूल रहे है, उच्च पदों पर आसीन है मगर हमारी जड़ें आज भी गांव में ही है। गांव आज भी मुझे अपनी ओर खींचता है क्योंकि इस गांव की मिट्टी में मेरे पूर्वजों का पसीना व राख मिली है। मेरे स्वर्गवासी पिताजी, दादाजी व परदादाजी की अस्थियां गांव में ही विसर्जित हैं और मरने के बाद मेरी भी अस्थियां मेरे गांव से मेरा नाता जोड़े रखेंगी। यादों को समेटे रहने की कवायद में गांव जाता हूं। पता नहीं हमारी अगली पीढी़ पता पूछने पर गांव का पता बताएगी या फिर दिल्ली के कंक्रीटनुमा जिंदगी के वन रूम फ्लैट की दास्तां सुनाएगी।

(प्रसिद्ध व्यंग्य चित्रकार (कार्टूनिस्ट))

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