November 16, 2019

…गांव में कितना बचा है गांव

रविशंकर सिंह
बचपन तो बहुत पहले पीछे छूट गया था। बत्तीस बरस पहले गांव भी छूट गया, लेकिन जेहन में बचपन और गांव दोनों की यादें जिन्दा हैं। गांव के मेले-ठेले, तीज-त्योहार, नेवान-जेठौन (नवान्न-देव उत्थान ) बहुत याद आते हैं। जेठौन की रात में घर-घर जाकर परसादी खाना और उनके आँगन में बनी सुन्दर अल्पना देखना, काली पूजा की ठिठुराती रात में नाटक देखने के लिए दो-तीन किलोमीटर दूर दूसरे गाँवों में जाना, माघी पूर्णिमा में गंगा-स्नान के लिए गंगा-तट पर जाना याद आता है।
मैं माघी पूर्णिमा के गंगा मेले को नहीं भूल पाता हूं। मेले के दो-चार दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती थी। लोग अपने घर से लाडू (लाई) चूड़ा, मूढ़ी, दही, तरकारी लेकर गंगा-स्नान करने के लिए जाते थे। बैलों को विशेष रूप से सजाया जाता था। उन्हें पोखर में नहलाया जाता, उनके सींगों को काले रंग से रंगा जाता था। उनके गले में घुंघरू और रंगीन फुदने बाँधे जाते। बैलों के गले में बंधी घंटियों की मधुर ध्वनि कानों में अमृत घोलती। बैलों के लिए एक बोझा खेसारी की लतरें और पुआल बांध लिए जाते। रात भर बैल गाड़ियां चलती रहतीं। हम बच्चों के उत्साह के क्या कहने। हाड़ कंपाती रात में हम उठ-उठकर आकाश की ओर निहारते। हमें भोरकुआ तारा के उगने का इंतजार रहता। मेले में दिनभर चहल-पहल रहती। लोगों का मिलना-जुलना होता। फुआ, मौसी, ननद, भौजाई आपस में मिलकर अपना सुख-दुःख साझा करतीं। हम बच्चों को मौसा, मामा, नाना या अन्य रिश्तेदारों के मिलने का इंतजार रहता। उनके मिलने से हमें खाने के लिए गरम-गरम जलेबियां मिलतीं थीं। दिन ढलते-ढलते हमलोग मेले से कूच कर देते। उन मेलों की बात ही कुछ अलग थी। बाजार में वह आनन्द कहां। मेले के साथ-साथ याद आते हैं वे लोग जिनका मुझसे नेह-छोह था, जिनके होने से गांव, मेरा गांव बनता था। वे क्रमश: हमसे बिछुड़ते गए, लेकिन स्मृतियों में जिंदा हैं। काश ! उन दिनों को और उन लोगों को फिर से लौटाया जा सकता।

साहेबगंज, गोड्डा और सुदूर ​पश्चिम तक राजमहल की पहाड़ी की श्रृंखला फैली है। इसकी तलहटी में बसे घने जंगली अंचल को मुगल काल से ब्रिट्रिश काल तक दमन-ए-कोह कहा जाता था। इसी तराई में ललमटिया कोलियरी से कुछ दूरी पर मेरा गांव बसा है। मेरे गांव के लड़के खुद फगुआ का गीत रचकर गाते थे-‘‘सुरसरि तीर एकचारी के पूरब ग्राम धनौरा है भारी।’’ गीत में गांव की चौहद्दी, विशेषताओं और मानिन्द लोगों की कीर्ति का वर्णन होता था। बसंत पंचमी के दिन से ढोलक-झाल बजाकर फागुन की अगुआनी की जाती थी। इस गायन का सिलसिला होली तक जारी रहता था। समय के साथ-साथ चीजें बदल गईं। फिल्मी गानों ने हमारे लोक-स्वर को लील लिया।
मेरा गांव भागलपुर जिला में पड़ता है, यह झारखंड का सीमा इलाका है। यहां की भूमि की बनावट झारखंड से काफी मिलती-जुलती है। ऊपर से ऊबड़-खाबड़ और अंदर से पथरीली भूमि। यहां डीप बोरिंग सफल नहीं हो पाती है। नहर अथवा सदानीरा नदियों के नहीं होने के कारण सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं है। किसान राम भरोसे खेती करते हैं। कभी यहाँ चारों ओर बेंत और सरपत की झाड़ियां हुआ करती थीं। दिन में भी जहां-तहां बाघ दिख जाते थे। कालांतर में आबादी बढ़ती गई और जंगल कटते गए।

मैं सन 70 से 75 तक अपने गांव में रहा और 75 से 85 तक कॉलेज की पढ़ाई के लिए निकटवर्ती शहर भागलपुर में। उसके बाद नौकरी के सिलसिले में अब तक बाहर-बाहर ही रहा हूं। गांव तकरीबन छूट ही गया है। इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है कि जिन लोगों की मौजूदगी से मेरा गांव मेरा बनता था, अब वे लोग नहीं रहे। लेकिन गांव में घर-घर, आंगन-आंगन जाकर मिलने-बतियाने की आदत नहीं छूटी। जब पढ़ाई से मन उचट जाए या फिर घर की चहारदीवारी से मन ऊब जाए तो फिर अपना बस्ता समेटकर ताक पर रखिए और किसी आंगन में जाकर भौजाई से बतरस का आनंद लीजिए अथवा मित्रों के साथ मिलकर ताश की पत्तियां फेंटिए। उस आनंद के लिए गांव हरदम याद आता है। यकीन मानिए व्यवहारिक तौर पर तो गांव छूट गया है, लेकिन तकरीबन हर रात सपने में मैं अपने गांव में ही रहता हूं।
इस गांव में वे पेड़ होते हैं जो अब नहीं रहे और मेरे वे आत्मीय जन होते हैं, जो गुजर चुके हैं जिन्हें मेरे गांव की वर्तमान पीढ़ी नहीं जानती-पहचानती। अब गांव में ना तो वैसी मिल्लत रह गई है और न वह आनंद रह गया है। गांव केंचुए की तरह सिकुड़ गया है। अब वहां भी लोग अपने-अपने घरों में मुर्गियों की तरह दुबके रहते हैं। हर छत पर एंटीना लगा है, हर घर में टीवी लगी है। लोग अपने आप में ही मशगूल हो गए हैं। खेती लगभग छूट ही गई है। लोग दूसरों से बटाई पर खेती करवाते हैं। पहले लोग हल, बैल कुदाल, रोपनी, कटनी और फसल की जोगवारी के लिए परस्पर जुड़े रहते थे। गांव में हल-बैल की जगह टैक्टर ने ले ली है। देशी बीजों का चलन खत्म हो गया है। गोबर खाद की जगह रासायनिक खाद ने ले ली है। पूजा पाठ में थोड़ा-सा गोबर के लिए लोग दूसरों का निहोरा करते हैं। गिने चुने लोग हैं जिनके दरवाजे पर पशुधन के नाम पर केवल एक-दो गाय, भैंस बंधी हुई है। खेतों में रासायनिक खाद के प्रयोग का दुष्परिणाम साफ-साफ दिखता है। खेसारी की फसल तो खत्म ही हो गई है। जिन खेतों में भर जांघ खेसारी की फसल लगी होती थी, उसमें हम लोग कूद जाते थे तो लगता था मखमली गद्दे पर कूद रहे हैं। उन खेतों में अब बीज डालो तो फसल ही नहीं होती। गांव में कृषि व्यवस्था के टूटने के साथ-साथ संयुक्त परिवार भी टूटा और लोगों का आपसी जुड़ाव भी छूटा। गांव के पढ़े-लिखे युवकों और मजदूरों ने महानगरों का रुख किया। अब गांव लगभग सूना-सूना लगता है। होरहा और भुट्टे का स्वाद, होली और बिरहा का राग तो अब अतीत की बात हो गई है।
गांव के बाहर दक्षिणी छोर पर था बाबा भीखा ठाकुर थान। बाबा किस जाति के थे, यह कोई नहीं जानता। सभी उन्हें अपनी जाति के कुल नायक के रूप में मानते हैं। थान के बगल में बाबा के अरदास गंगा मंडल की भी समाधि बनी है। भीखा ठाकुर थान पर जल चढाने वाले गंगा मंडल की समाधि पर फूल चढ़ाना नहीं भूलते। यहां एक पीपल का पुराना विशाल पेड़ हुआ करता था। आज भी छिन्न मस्तक खड़ा है वह पीपल का पेड़। इसके कोटरों में मेरी कई पीढ़ियों की स्मृतियां बसी हैं। इसकी घनेरी छांव में मेरा बचपन बीता है। इसकी झुकी हुई डाल पर हमलोगों ने झूला झुला है। कितने पक्षियों का बसेरा था इसकी डालियों पर। यहां बंदर-हनुमान उछलते-कूदते हुए ‘हूप-हूप’ का शोर मचाते रहते थे, तोते टांय-टांय करते रहते। आज भी इस थान के प्रति लोगों की आस्था है। वर्ष में एकबार लोग यहां खडाऊं, जनेऊ और चिमटा चढ़ाते हैं। कहते हैं बाबा भीखा ठाकुर रात में चिमटा लेकर खेतों की रखवाली करते हैं। गांववाले बताते हैं कि कई लोगों ने चांदनी रातों में बाबा को खेत की मेड़ों पर घूमते हुए देखा है। क्या मजाल कि बाबा के रहते खेतों से एक दाना भी इधर-उधर हो जाए। खेतों में धान की पत्तन सूखने के लिए छोड़कर लोग अपने घरों में आराम से सोते हैं। कहते हैं कि एकबार किसी चोर ने रात में फसल चुराने की हिमाकत की थी। बाबा ने उसे खेत में उठाकर पटक दिया। उसके बाद तो वह खून की उल्टियां करते-करते मरा।

गांव के पूर्वी छोर पर कोयली पोखर के किनारे बाबा महंत थान है। बाबा महंत भी ग्राम देवता हैं। वहां रामनवमी के दिन घर-घर से ध्वजा चढ़ती है। लाल-लाल हजारों ध्वजा से सजा हुआ बाबा महंत थान, गांव का रमणीय स्थल। यहां से ही रामनवमी के जुलूस की शुरूआत होती है और गांव के पूर्वी छोर तक जाती है। कभी वहां बड़ा मेला लगता था। अखाड़े में लोग लाठी, वाणा, भाला, बल्लम, बर्छी, तलवार भांजने का हुनर दिखाते थे। इस अखाड़े में हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल होते थे। उन दिनों हिन्दू युवक भी ताजिये के साथ पाइक दौड़ते थे। ताजिया हिन्दुओं के दरवाजे पर भी रखा जाता था। तब ताजिये का आकार बहुत बड़ा हुआ करता था। जब से गांव में बिजली के खंभे गड़े और तारों का जाल बन गया, तब से लोगों के दिलों की तरह ताजिये का आकार भी छोटा हो गया है। अब मुसलमान युवक हिन्दुओं के अखाड़े में नहीं आते और हिन्दू युवक भी ताजिये के जुलूस में शामिल नहीं होते।

महज चालीस-पचास साल पहले की बात है। गांव में चारों ओर पर्याप्त परती भूमि थी। भूमि सरकारी थी। आप जिधर निकल जाएं वहीं एक मैदान होता था। यह ढोर-डांगर का चारागाह हुआ करता था। गांव के पानी का इधर ही निकास था। बरसात में ये मैदान पानी से लबालब भर जाते थे। पानी सूख जाने पर इन मैदानों में उजली माटी की एक परत बिछ जाती थी-खरवा माटी अर्थात खारा माटी। इस मिट्टी का इस्तेमाल लोग सोडा की तरह कपड़ा धोने में करते थे। औरतें इस मिट्टी से सिर के बाल धोती थीं। समय बदलता गया और मैदान लुप्त होते गए। लोगों ने इस पर अपना अधिकार जमा लिया। धीरे-धीरे चारागाह विलुप्त हो गए। अब तो गांव में पशुओं की संख्या भी नगण्य रह गई है। खेती ट्रैक्टर से होने लगी है। बैलों का क्या काम? हां, कुछ लोग दूध के लिए गाय-भैंस जरूर पालते हैं। उन्हें खूंटे में बांधकर चारा खिलाया जाता है। उन दिनों चरवाहे घर-घर से पशुओं को हांक कर चारागाह में ले जाते थे। गोधूली बेला में ढोर-डांगर के गले में बंधी हुई घंटियों की रूनझुन वातावरण को सुरमय बना देती थी। भैंस की पीठ पर बैठे चरवाहों की बंशी की टेर सुनाई देती थी। गांव के चारों ओर ताड़, खजूर, बबूल, नीम, पाकड़, बकैन, पीपल और बरगद के पेड़ थे।
समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। अब गांव में न तो कच्ची सड़क है और ना धूल उड़ाती हुई बैलगाड़ी है। 1983 के बाद गांव में तारकोल की सड़क बन गई है। पक्की सड़क से गांव की संस्कृति में बड़ा बदलाव आया। पहले गांव एक तरह से आत्मनिर्भर था। दैनिक जरूरतों की चीजें गांव में ही उपलब्ध हो जाती थीं। चमड़े के जूते, चप्पल, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी के सामान, सखुआ के पत्तल गाँव में बन जाते थे। अब इन रोजगारों पर षहर का कब्जा हो गया। गांव से सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर कहलगांव थरमल पावर प्लांट के बन जाने बाद गांव के युवक सबेरे-सबेरे साइकिल लेकर प्लांट निकल जाते है। शाम में थके-मांदे घर लौटते तो अपने-अपने दड़बे में दुबक जाते हैं। अब चौपाल संस्कृति का लगभग अंत ही हो गया है। सड़क के दोनों ओर चाय-पान की दुकानें खुल गईं। कभी यहां घनी अमराई और बंसवारी हुआ करती थी। दिन में भी इधर अकेले आने में डर लगता था। यहां जानवरों के कंकाल पड़े रहते। कौए, कुत्ते, सियार और गिद्ध आपस में छीना-झपटी करते रहते। अब तो गांव में न सियार की बोली सुनाई पड़ती है, न गिद्ध दिखाई देता है। कितना बदल गया है गांव। अब फूस-मिट्टी के घरोंदों की जगह भले ही पक्के मकान बन गए हैं। कुछ लोग पढ़-लिखकर अफसर भी बन गए हैं।


खेती घाटे का सौदा बन गई है। मेरा गांव गंगा से आठ-दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मुझे अच्छी तरह याद है कि 1975 से पहले बरसात में गंगा का पानी गांव के पश्चिमी और उत्तरी छोर पर आता था, लेकिन दो-चार दिनों में वापस लौट जाता था। बाढ़ के पानी के साथ आयी हुई माटी खेतों के लिए उर्वरक का काम करती थी। इससे धान और मसूर की फसल दोगुनी हो जाती थी। 1975 के बाद जब से फरक्का बांध बना, तब से बाढ़ का पानी खेती के लिए विनाशकारी बन गई। जेठ की धूप में किसान जमीन जोतते हैं, बीज बोते हैं, रोपाई करते हैं और जब धान की फसल लहलहाने लगती है, तो गंगा हहराती हुई आती है और फसल को लील जाती है। किसान अपने खेतों के पास जाकर गंगा मैया के लौट जाने के लिए प्रार्थना करते हैं। गंगा मैया का दिल नहीं पसीजता। वह टस से मस नहीं होती। पंद्रह-बीस दिनों के बाद जब गंगा का पानी लौटता है तो खेतों से सड़ी हुई लाष की तरह गंध आने लगती है। अपनी मेहनत पर पानी फिरता हुआ देखकर किसानों का मन बैठ जाता है। जिसने अपनी आंखों से किसानों के सपनों पर पानी फिरते हुए नहीं देखा है, वे भला कैसे जान पायेंगे कि किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं।

एक समय था जब मेरे गांव में पक्की सड़क नहीं थी। विद्यालय और पोस्ट ऑफिस तो थे, लेकिन अस्पताल, बैंक और बाजार नहीं था। साक्षरों की संख्या कम थी। उन दिनों अकेले-अकेले या सामूहिक रूप से रोज शाम में लालटेन पीली रोशनी में रामायण पढ़ी जाती थी। प्रभाती गायन सुनकर नींद खुलती थी। लोगों में अपेक्षाकृत मिल्लत ज्यादा थी। अब वे अच्छाइयां यादें बनकर रह गईं हैं।

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