December 10, 2019

गांव छोड़ना..गांव के स्वाभिमान को तोड़ने जैसा

एक दिन मेरे बाबा काॅलेज जाने को तैयार थे। तभी बाबा को खोजते बादशाह मियां किसी काम से दरवाजे पर आए। मैं ही दरवाजे पर था। बाबा को संदेश दिया कि ‘बादशाह मियां आए हैं।’ बादशाह मियां कहना और मेरे गाल पर बाबा का थप्पड़ पड़ना, गांव के संबंधों की कथा कहता है।

डाॅ रजनीश कुमार शुक्ल
मेरा गांव कुशीनगर जिला के कसया तहसील में है। बचपन के कुछ वर्ष गांव में गुजारे। प्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई। उस समय की स्मृतियां जीवंत हैं। मेरे लिए 1970 का दशक गांव का दशक है। गांव यानी जो स्वयं पर निर्भर हो और अज्ञेय के शब्दों में कहूं तो गांव तो वही है जिसके हर रास्ते गांव की ओर मुड़ते हों। गांव की विशिष्टता यही है। हल की फाल बनाने से लेकर कपड़े सिलने तक सारा काम गांव में ही होता था। इन कामों के लिए किसी को पैसा लेते-देते नहीं देखा था। यानी जीवन चल रहा था, व्यापार नहीं था। व्यापार नहीं था तो रिश्ते थे। हिंदुओं की लगभग सभी जातियां हमारे गांव में हैं, मुसलमान भी हैं।

मेरे बाबा उस क्षेत्र के बड़े पंडित थे-स्नातकोतर महाविद्यालय में प्रोफेसर पंडित फौजमनी शुक्ल, प्रदेश के बड़े नेता व कार्यसमिति के सदस्य भी थे। एक दिन मेरे बाबा काॅलेज जाने को तैयार थे। तभी बाबा को खोजते बादशाह मियां किसी काम से दरवाजे पर आए। मैं ही दरवाजे पर था। बाबा को संदेश दिया कि ‘बादशाह मियां आए हैं।’ बादशाह मियां कहना और मेरे गाल पर बाबा का थप्पड़ पड़ना, गांव के संबंधों की कथा कहता है। तब से आज तक उनका नाम लेने की हिम्मत नहीं हुई। बादशाह मियां हलवाहा थे जिन्हें हम बाबा कहकर बुलाते थे। गांव में सभी जातियां थीं लेकिन गांव को पंडितों का ही कहा जाता था। जबकि पंडित अल्पसंख्यक थे, उनके पास खेती भी कम थी। शायद इसलिए कि ऐसा कहने से हर किसी को पढ़े-लिखे गांव का निवासी होने का गौरव-बोध होता था। मैं जब प्राथमिक स्कूल का छात्र था उस वक्त भी गांव में प्राथमिक स्कूल के 15-16 शिक्षक थे, 7-8 इंटर काॅलेजों में प्राध्यापक थे जबकि दो लोग काॅलेजों में प्रोफेसर थे। आज यह संख्या उससे बहुत बढ़ी हैं, पर इस बढ़ी हुई संख्या वाले लोग एक बार जब गांव छोड़कर निकले तो उनका कोई रास्ता गांव की ओर नहीं जाता। मैं भी उन्हीं में से एक हूं। उनका गांव छोड़ना गांव के स्वाभिमान को तोड़ना है।

गांव को 1985-86 आते-आते आधुनिक विकास की नजर लग गई। सिर्फ मेरे गांव को ही नहीं, सारे गांवों को ही लग गई। मेरे गांव ने 1985 के बाद, खासकर 1990 के बाद दो चीजें खोई हैं। पहला गांव की आत्मनिर्भरता और दूसरा पारस्परिक आत्मीयता। आज गांव में कोई नाईं नहीं बचा, सब कसया कस्बे के सैलून में हैं। कोई दर्जी नहीं बचा सब टेलर मास्टर होकर भिन्न-भिन्न कस्बे में फैल गए हैं। आज जब गांव में स्थाई बाजार हो गया है तो गांव में कुछ भी नहीं बन रहा है। वही शिल्पकार, दस्तकार वहां रह गए है जिसने मार्केटिंग नहीं सीखी, जो बेचना नहीं जानता। 10 पैसे की 5 चीनी गोली बेचने वाला परचून वाला जो गोली बेचने के बाद स्नेहपूर्वक डांटता भी था कि ज्यादा खाओगे तो दांत खराब हो जायेगा। आज तो मल्टीनेशनल कंपनियों के चाॅकलेट का इस्तेहार गांव में लग रहा है। अब बाद​शाह मियां का नाम लेने पर चांटा मारने वाली पीढी नहीं है। तब कीर्तन की शुरूआत इस्माइल मास्टर के कीर्तन से होती थी। इस्माइल मास्टर कीर्तन के वक्त अपनी पगड़ी को कीर्तन सुनने वाले हनुमान जी के रूप में स्थापित करते थे। पेशे से दर्जी इस्माइल मास्टर हनुमान चालीसा पढ़ा करते थे। कबीर के अनेक भजन उनके कंठ से हमने सुना है। उनके द्वारा गाया गया एक भजन के बोल आज भी मुझे याद है-
‘राम मेरी पिउ मैं तो राम की बहुरिया,
दुल्हिन गाओ मंगल चार, मेरे घर आए राजा राम’।

आज जब गांव को याद कर रहा हूं तो ताजिया याद आ रही है। ताजिया पर न्योछावर के रूप में फेंके जाने वाले बतासे की याद आ रही है। बादशाह मियां के घर नवमी की पूरी व खीर याद रहा है। आज याद आ रहा है कि बाबरी ढ़ांचा टूटने के दिन भी शाम को इस्माइल मास्टर किस प्रकार कीर्तन गा रहे थे, वह दृष्य नजरों के सामने घूम रहा है।

अब जाति और धर्म में बंटा हुआ गांव है जिसके भिन्न-भिन्न टोलों और जातियों के बीच तनाव पसरा है, संवादहीनता है। पहले गांव के दक्षिण तरफ बसे अछूत जातियों के लोगों को भी चाचा, भैया जैसे संबोधनों से बुलाया जाता था। आखिर क्या हुआ कि गांवों को भेद और घृणा की नजर लग गई। पहले तीन या चार वर्ष की उम्र में भी पूरे गांव में निर्भय रूप से घूम सकता था, आज 50 की उम्र पार करने के बाद उस गांव में शाम के समय एक टोले से दूसरे टोले में जाते हुए डर लगता है। पूरा गांव एक परिवार था, अब तो टोला भी परिवार न रहा। भौतिक सुख-सुविधाएं बढ़ी, लेकिन गांव का एक हिस्सा लगातार गरीब होता गया।
मुझे तो वह गांव याद आता है, जिस गांव में व्यक्ति की पहचान उसके खेत के आकार व कोठार में भरे अनाज से नहीं होती थी बल्कि ऐसे ढ़ेरों लोग थे जिनके दो वक्त की भोजन की व्यवस्था गांव करता था। उन्हें सामाजिक सुरक्षा थी। गांव की बेटी को यह विश्वास था कि गांव के अंदर कोई उसपर बुरी नजर डालना तो दूर, ऐसा सोच नहीं सकता था। गांव में पहले भी झगड़े होते थे, लाठियां चलती थीं लेकिन कुछ देर बाद लोग ले जाकर इलाज भी कराते थे। अधिकार, कर्तव्य और संवेदना की स्वाभाविक समझ 30 साल पहले के गांव में थी, आज संवेदना तिरोहित हो गई है और कर्तव्य ओझल।

मेरे गांव में प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान ट्यूबवेल लगा। दूसरी योजना में गांव के दोनों ओर नहरें बनी। 1962 में धान के खेतों में गेहूं के बीज पड़ने लगे थे। गन्ने के साथ नकदी फसलों को बोने का चलन शुरू हो गया था। हालांकि खेत की जोत छोटी होती जा रही है और परती भूमि का आकार बढ़ता जा रहा है और परत दर परत सख्त हो रही गांव की मिट्टी को जिस आर्द्रता और नमी की जरूरत है, उसके लिए सिंचाई करने वाले वाले हाथ दिखाई नहीं दे रहे। दरअसल मेरा गांव कस्बाई मानसिकता में आ गया है, जो न नगर हो पा रहा है और न गांव बचा है। यह एक ऐसा कस्बा होता जा रहा है, जहां से बाहर जाने के साधन तो बहुत हैं, लेकिन लौटकर आने और आकर गांव का होकर रहने का इंतजाम नहीं है।

गांव को बचाने के बजाए गांव में नगर की सुविधाएं बनाने पर जोर ज्यादा है। अब तो शादी-विवाह भी होते हैं तो भोजन की पांत नहीं बैठती। बूफे आ गया है। पूरे गांव को मनुहार से खिलाने का चलन क्या खत्म हुआ, हर आदमी के मन में एक उद्दाम उद्ंडता भर गयी है। गांव की बेटी की शादी में गांववालों को भी कार्ड देना पड़ रहा है। 30 साल पहले गांव की बेटी की शादी को केंद्र में रखकर पूरा गांव अपने कार्यक्रम निर्धारित करता था। कुछ चारपाई, कुछ बिस्तर सहेज कर रखे जाते थे कि इसकी जरूरत किसी की बेटी की षादी के समय पड़ेगी। तब दिखता था माटी की सुगंध से सराबोर और उतना ही आर्द्र मन वाला आदमी।

डिजिटाईजेशन ने तो एक नयी स्थिति पैदा की है। शायद इसका कुछ सकारात्मक परिणाम भी आगे देखने को मिले। लेकिन आज से 20 वर्ष पहले जब केवल तार वाले टेलीफोन थे शायद कुछ ही घरों में, लेकिन उन कुछ टेलीफोनों ने भी बाहर और भीतर वालों को जोड़ कर रखा था। आज हर आदमी के हाथ में वक्त-बेवक्त रोने वाला बच्चा यानी मोबाइल फोन है। इसने भी एक नए किस्म के टापू बनाए हैं। युवा पीढी़ गांव में रहते हुए भी गांव में नहीं है। वास्तविक संसार से दूर आभाषी संसार में जीने की कोशिश
कर रहा है। सूचना तकनीक के विकास से जिंदगी चलाना सहज, लेकिन जिंदगी जीने में असहता आई है। पर मैं अभी भी विश्वास करता हूं कि जो युवा गांव से दूर हो रहे हैं, वे उपर से चमकने वाली जिंदगी को छोड़कर गांव की ओर लौटेंगे। शहरों में उन्हें गांव की जिंदगी कचोट रही है। हम यह समझ नहीं पा रहे हैं कि सुविधा खड़ा कर गांव नहीं बना सकते, गांव बनाने के लिए मन बनाना पड़ेगा। मुझे गांधी जी का आत्मनिर्भर गांव, स्वावलंबी गांव, दीनदयाल जी का अंत्योदय अब समझ में आने लगा है।

(कुलपति,म.गां.अं.हिं.विश्वविद्यालय,वर्धा सचिव, प्राध्यापक,काशी विद्यापीठ)

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