June 06, 2020

प्रवासियों के स्वागत को कितना तैयार है गांव

डॉ प्रदीप कांत चौधरी
आज लाखों-करोड़ों लोग सड़क पर हैं। कुछ चल रहे हैं, कुछ बैठे हैं। कुछ जान देकर भी अपने गांव पहुंच जाना चाहते हैं, कुछ शहरों में ही बैठ कर काम-धंधा शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं। तमाम सैद्धांतिक बहसों के बीच एक सवाल सबके मन को कुरेदती है : यदि गांव चले भी जाएं तो काम क्या करेंगे? प्रायः यह समय ‘गांव बेहतर या शहर’ के विवाद में फंसने का नहीं है, यह समय गांव और शहर दोनों को साथ ले कर समाधान ढूंढने का है। इन सब सवालों को लेकर एक ​तरह की द्विविधा है। यह भी कह सकते हैं कि गांव एक द्विविधा में खड़ा है।
क्या है गांव की द्विविधा


गांव एक द्विविधा में खड़ा है, एक तरफ तकनीक और पूंजी से भरा ‘हाइपर विलेज’का विकल्प है और दूसरी तरफ अतीत का रूमानी गांव जो सिर्फ पारंपरिक तकनीक में ही विश्वास रखता था। या फिर इन दोनों के बीच कहीं जा कर अटकेगा भारतीय गांव। जो भी हो लेकिन गांव की विभिन्न परिकल्पनाओं पर चर्चा बहुत जरूरी है। गांव भले द्विविधा में हो लेकिन शहर को कोई द्विविधा नहीं। शहर जानता है कि उसे फैलना है और फैलते जाना है। तकनीक और पूंजी का भंडार बड़ा करते जाना है। गांव को क्या करना है? पीछे मुड़ कर हल बैल के युग में जाना है या नयी तकनीक का इस्तेमाल कर अपने को आमूल-चूल बदल डालना है? यदि बदलना है तो वह गांव रह भी जाएगा या सिर्फ शहरों की भोंडी नकल बन जाएगा?
गांव का नाम लेते ही दूर दूर तक फैले खेत,बाग-बगीचे, तालाब, पतली सड़कें और गलियां, छोटे-छोटे घर, मवेशी, एक जगह बैठ कर गप्पें मारते लोग वगैरह की याद आने लगती है। गांव में जिंदगी की धीमी रफ्तार याद आती है। सामुदायिक बंधन, नातेदारी, एवं पीढ़ी दर पीढ़ी के आपसी संबंध याद आते हैं। लेकिन शहरीकरण ने इन सभी समीकरणों को भारी चुनौती दे डाली है। शहरों ने गांव के सामने उसकी अस्मिता के सवाल खड़े कर दिये हैं। शहर गांव से पूछता है कि तुम्हारी परंपरा में कुछ बचेगा या सब कुछ तिरोहित हो जाएगा!
खेती को लेकर द्विविधा

द्विविधा यह भी है कि क्या पारंपरिक खेती बच जाएगी? पारंपरिक खेती तो किसान सिर्फ अपनी खपत के लिए करते थे बाजार के लिए नहीं। लेकिन अब कोई सिर्फ अपनी खपत के लिए खेती करके अपना गुजर बसर कर सकता है क्या? ट्रैक्टर से खेत जोतने में कम समय और पैसा लगे तो भी किसान हल-बैल से खेत जोतेगा क्या? ज्यादा उपज लेने के लिए खाद और कीटनाशक का प्रयोग नहीं करेगा क्या? बाजारवादी उत्पादन की मजबूरियों से किसान उबर सकता है क्या ?
इससे भी बड़ी चुनौती सामाजिक ताने-बाने की है। बचे खुचे संयुक्त परिवार भी अब आगे चल पाएंगे क्या? महिलाएं ग्रामीण समाज में पर्दा और बंदिशों को आगे बर्दाश्त कर लेंगी क्या? जातिगत सोपानक्रम टूटने के बाद भी ग्रामीण राजनीतिक संरचना वैसी ही रह पाएगी क्या? गांव टीवी और शहरी प्रचार माध्यमों से बेखबर रह पाएगा क्या? उपभोक्तावाद की गिरफ्त से गांव बच जाएगा क्या? गांधीजी के आत्मनिर्भर गांव की परिकल्पना फिर से लोगों को आकर्षित कर पाएगा क्या? हमलोग बिना बिजली, बिना उपभोक्ता वस्तुओं, और बिना बाजारवादी उत्पादन के जीवन के लिए तैयार हैं क्या ? यह तो तय है कि जैसे ही बिजली और बाजारवाद आएगा, वैसे ही रूमानी अतीत का गांव गायब हो जाएगा। तो भविष्य का गांव कैसा होगा ? उसमें अतीत के कौन कौन से तत्व बचेंगे ?


क्या हो आगे की राह

किसी से कोई यह नहीं कह सकता कि आप शहर में बसे-बसाए काम-धंधे को छोड़ कर चुपचाप गांव आ जाइए। बस नौजवानों से यह कहा जा सकता है कि अपने समय का कुछ हिस्सा अपने गांव को दीजिये, यहां आना-जाना शुरू कीजिए। लोगों से बात कीजिए । समस्याओं और समाधानों को समझिए। पूरे देश की समस्याओं को छोड़ कर यदि हम सिर्फ एक पंचायत या अधिक से अधिक एक प्रखंड की समस्याओं को समझने पर ध्यान केंद्रित करें तो वह लाभदायक होगा। बिहार की सभी समस्याओं का समाधान राजनीति से नहीं संभव है। बिहार की अधिकांश समस्याएं उद्यम-कौशल (Entrepreneurship) से सुलझ सकती हैं। यदि हम सरकार पर निर्भरता कम रखें और ग्रामीण उत्पादन को आंदोलन बना दें तो हमारी सफलता तय है।
हर प्रखंड, हर पंचायत में हो पहुंच
हमें ध्यान रखना होगा कि बिहार के लोगों के पास पूंजी की कमी है, इसलिए छोटे-छोटे उद्यमों की स्थापना ही कामयाब होगी। बिहार में मछ्ली, डेयरी, पॉल्ट्री, फल, सब्जी, आदि के अतिरिक्त बांस, भूसा, पुआल आदि से बने सामान जैसे पेपर, फाइबर, प्लाईवुड, पार्टिकल बोर्ड, फर्नीचर आदि उद्योगों पर पहले चरण में ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। बिहार के 534 प्रखंडों में से प्रत्येक में यदि सिर्फ पांच ऐसे उद्यमी नौजवान अपना समय, चिंतन और उद्यम लगाएं, जो राज्य के बाहर रह कर व्यापार-धंधे का कुछ अनुभव हासिल कर चुके हैं, तो परिस्थिति बदल सकती है।
जब साधन संपन्न लोग बिहार में उद्यम स्थापित करने की कोशिश करेंगे तो एक राजनीतिक दबाव भी पैदा होगा, लेकिन सिर्फ सरकार और अधिकारीतंत्र के भरोसे बिहार के पुनर्निर्माण का काम अगले 100 वर्षों में भी पूरा नहीं हो सकेगा। पिछली सरकारों के साथ-साथ वर्तमान सरकार ने भी किसानों और कारीगरों की प्रोड्यूसर कंपनी बनाने के लिए नाबार्ड के माध्यम से बहुत सारी सुविधाओं का ऐलान किया हुआ है।

एफपीओ की ओर बढ़ाये जा सकते हैं कदम
प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान है कि प्रत्येक प्रखण्ड में कम से कम एक प्रोड्यूसर कंपनी यानी पूरे देश में 10,000 से अधिक ऐसी कंपनियों की स्थापना होनी चाहिए। यदि आप सचमुच देश को मजबूत बनाना चाहते हैं तो आपको इन प्रोड्यूसर कंपनियों की स्थापना और कारोबार बढ़ाने में अग्रिम भूमिका अपनानी चाहिए। लेकिन जब असली उद्यमी नहीं आते तो गलत किस्म के लोग इन योजनाओं का दुरुपयोग करते हैं। आप गांव के साथ नाता बनाकर अपने इलाके में ऐसी किसान और कारीगर कंपनियों का सफल संचालन कर सकते हैं।
सामूहिकता में छुपी है सफलता की राह

आखिरी बात, बिहार जैसे राज्यों में उद्यम इसलिए भी सफल नहीं हो पाते कि बिहार उद्यम-संस्कृति की दृष्टि से रेगिस्तान है। बिलकुल सूखा बंजर, अभावग्रस्त समाज। जब बाहर से आया व्यक्ति यहां अकेले तरक्की करना चाहता है, तो चिढ़ कर दूसरे लोग उसकी टांग खींच देते हैं। यदि आप कम्युनिटी लीडर बनें और अपनी तरक्की से दूसरों की तरक्की को जोड़ दें तो सफल होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। सामूहिक परियोजनाओं को रोकने से नेता और अधिकारी भी थोड़ा परहेज करेंगे। यदि मुझसे पूछा जाय कि पहले पांच कदम क्या होने चाहिए तो वो ये रहे
1.एक प्रखण्ड का चुनाव करें।
2.10 लोगों को लेकर एक प्रोड्यूसर कंपनी स्थापित करें ।
3.किसी एक उत्पाद को अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बनाएं।
4.इस प्रोड्यूसर कंपनी से कम से कम 1500 किसानों या कारीगरों को जोड़ें।
5.इस कंपनी के उत्पादित सामान को देश-विदेश में बेचने का उपाय करें ।
लेकिन यह तो सिर्फ एक विकल्प है, और बहुत से समाधान हो सकते हैं।

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