November 16, 2019

शहरों की काॅपी बने गांव,खत्म हो रही है साझी विरासत की थाती

शैलेन्द्र कुमार सिंह
मंजिल करीब आते ही एक पांव कट गया.
चौड़ी हुई सड़क तो मेरा गांव कट गया.
मशहूर शायर मुनव्वर राना
की ये लाइनें मेरे गांव अजमतउल्ला गंज पर सटीक बैठती है जो पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में पड़ता है। इस गांव में पिछले 40 साल में कई बदलाव हुए। जैसे- प्राइमरी के साथ मिडिल स्कूल का बन जाना, गांव में अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र का खुल जाना, गांव की नदी पर पुल बन जाना, कच्ची सड़क का पक्कीकरण हो जाना, जो गलियां बारिश में कीचड़ से भर जाती थीं उनका कंक्रीट की सड़क बन जाना, लेकिन इस दौरान अपनत्व और भाईचारा कम हुआ है। विकास और बाजार ने संवेदनशील ग्रामीण-संस्कृति की जड़ में मट्ठा डालने का काम किया है।
जब हमने पढ़ना शुरू किया था तब हमें गांव से पांच किलोमीटर दूर गंगागंज पढ़ने जाना काफी कठिन था। पांच साल की उम्र में पांच किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। स्कूल आने-जाने में ढाई से तीन घंटे का समय लगता था। अगर सात बजे का स्कूल होता था, तो साढ़े पांच बजे ही घर से निकलना पड़ता था और छुट्टी के बाद डेढ़ घंटे घर आने में लगता था। सड़क बनी थी जो कच्ची थी। अगर बारिश होने लगती थी, तो कच्ची सड़क पर पैदल चलना मुश्किल हो जाता था क्योंकि पैर में मिट्टी चिपकने लगती थी। तब हमें अपने चप्पल और जूते उतार कर नंगे पांव आना-जाना पड़ता था। अगर किसी के पास साइकिल होती थी तो उसके टायर में मिट्टी भर जाती थी। पैदल साइकिल लेकर चलना अधिक मुश्किल हो जाता था। लेकिन अब गांव तक पक्की सड़क बन गयी है। बच्चों को पैदल स्कूल नहीं जाना पड़ता है, लगभग सभी नामी स्कूलों की बसें गांव में आती हैं और तय समय में तैयार होकर बच्चे गांव के बाहर एकत्र होते हैं और स्कूल चले जाते हैं।

हालांकि गांव अब शहर की कॉपी लगने लगे हैं। अगर खेती के काम-धंधे को छोड़ दें, तो गांव पूरी तरह से शहर बनता जा रहा है। सुविधाओं से लेकर स्मार्ट फोन का प्रयोग सब में। हमारे बचपन में मेलों का बड़ा महत्व होता था, लेकिन अब मेलों की महत्ता घट गई है। पहले गांव में बैलगाड़ी और पैदल गंगा स्नान की होड़ लगती थी। सैकड़ों की संख्या में लोग पैदल और बैलगाड़ी से कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान के लिए जाते थे। साइकिल आई तो थोड़ी आसानी हो गयी, लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। मोटरगाड़ी ने परिवहन की शक्ल बदल दी है। कुछ घंटे में गंगा स्नान करके लोग घर लौट आते हैं। हम महाशिवरात्रि मेले का जिक्र करना चाहेंगे जिसके बिना गांव की कहानी अधूरी रहेगी। इस मेले का हम लोग महीनों इंतजार करते थे। रात में 12 बजे घर से निकल जाते, इसके पीछे लोभ रहता था कि रात में जल चढ़ाने के बाद जलेबी खाने को मिलेगी और फिर दिन में जब मेले जाएंगे, तो दुबारा जलेबी खाएंगे।
पहले मेले और त्योहार लोगों के आपसी मिलन का केंद्र होते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे आपसी मेलजोल खत्म होता जा रहा है। एक त्योहार होता था, नवा-सितंबर, अक्तूबर के महीने में पड़ता था, जब धान कटता था। उस दिन नए चावल का भात, उड़द की दाल और बरा बनता था। शाम को पूरे गांव के लोगों से मिलने जाना होता था। सब लोग एक-दूसरे को नवा की मुबारकबाद देते थे। हम बड़ों के पैर छूते थे, वे आर्शीवाद देते। कई घरों में लोग खाने की जिद करते थे। कहते थे कि हमारे घर में नवा मना लो। लेकिन अब नवा का चलन खत्म हो गया। जोहार बोलने की परंपरा भी जाती रही। गांव में पहले आपसी मेलजोल का महत्व था। छोटे-बड़े का अदब होता था, लेकिन बदलाव ने मर्यादा की इस दीवार को गिरा दिया है।
हम एकाकी होते जा रहे हैं। इससे जो सुनापन उत्पन्न हुआ है, वह हमारे समाज को खोखला कर रहा है। आगे क्या होगा, नहीं कह सकते। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह स्मार्ट संस्कृति हमें ऐसे मोड़ पर ले जा रही है, जहां गांव का अपना कुछ भी नहीं होगा, सब ग्लोबल हो जाएगा। बाजार में संवेदनशीलता के कोई मायने नहीं होते क्योंकि बाजार मूल्य तय करता है। आज सभी चीजों के मूल्य तय हो रहे हैं, रिश्तों पर संकट गहराता जा रहा है।

विकास की जिस अवधारणा पर बढ़ते हुए सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात होती है, पंचायतों को अधिकार देने की बात होती है, वह सिद्धांत के रूप में तो सही लगती है, लेकिन अगर जमीनी हकीकत की बात करें, तो यह बेमानी लगती है। जैसे ग्रामसभा में विकास योजनाओं को बनाना और उनका कार्यान्वयन। वास्तव में गांव के विकास के लिए कितना पैसा आया है, इसके बारे में ग्रामीणों को कभी पता नहीं चलता। जबकि किस मद में क्या खर्च हो रहा है, इसे सार्वजनिक तौर पर लिखा जाना जरूरी है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। आखिर यह किसकी मदद से होता है और क्यों होता है। ऐसे सवालों का जबाव ढूंढने की कोशिश करेंगे, तो जवाब मिलने के बजाय आप उसमें उलझते चले जाएंगे। अगर आपने सही बात कहनी शुरू की, तो आपको तरह-तरह से परेशान करना शुरू कर दिया जाएगा। यह हालत किसी एक गांव की नहीं, लगभग हर गांव में ऐसा होता और दिखता है।
विकेंद्रीकरण की व्यवस्था और पंचायतों को सीधे पैसे देने की स्कीम ने एक चीज जरूर कर दिया है। गांव में गुटबाजी लगातार बढ़ती जा रही है। प्रधान का गुट अलग है तो विरोधी का गुट अलग। इस गुटबाजी में जिसकी लाठी, उसकी भैंस, वाला हाल होता है। कहने की जरूरत नहीं, प्रधान का ग्रुप भारी पड़ता है क्योंकि उसके साथ स्थानीय प्रशासन भी होता है। विकेंद्रीकरण ने गांवों में नए तरह की अर्थव्यवस्था को जन्म दे दिया है। हम कितना फैल जाएं, कितनी सरकारी जमीन पर कब्जा कर लें, यह भावना लगातार बढ़ती जा रही है। पहले गांवों में खुला स्थान होता था, जहां पेड़ पौधे और जंगल थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में वहां नए घर बन गए हैं। पहले लोग सहअस्तित्व की भावना से एक घर में रह लेते थे, लेकिन अब जितने भाई हैं, उतने घर की बात होने लगी है। शादी होते ही घर में अलगाव होने लगा है। सहनशीलता खत्म हो रही है, कोई एक दूसरे को बरदास्त नहीं करना चाहता। जिस साझी विरासत को हम अपनी थाती मानते थे, वह अब किस्से-कहानियों की तरह होती जा रही है।
(राजनीतिक संपादक, जी हिंदुस्तान बिहार,झारखंड।)

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