July 14, 2020

मंडी में टमाटर,प्याज के दाम में भारी गिरावट, आम उपभोक्ताओं को ज्यादा फायदा नहीं

पंचायत खबर टोली
नयी दिल्ली: आत्मनिर्भर भारत की चाहत रखने वाले अब तक इस सवाल से मुंह से मोड़ते आये हैं कि चाहे कोई भी संकट हो इस देश में सबसे ज्यादा परेशान होता है तो वो है अन्नदाता। उन अन्नदाताओं में भी सबसे ज्यादा किसी पर मार पड़ती है वो है सब्जी उत्पादक किसान। वर्तमान में कोरोना महामारी के दौर में भी किसी पर सबसे ज्यादा मार पड़ रही है तो वो है सब्जी उत्पादक किसान। कभी वो आलू के आंसू रोता है तो कभी प्याज के तो कभी टमाटर के। कभी उसका संतरा रूपये किलो बिकता है तो कभी टमाटर। ऐसे में किसान फसल खेत में लगाने के जब बाजार जाता है, या जब व्यापारी उसके तैयार फसल का औने पौने दाम लगाते हैं तो उसे समझ नहीं आता कि वो किसे दोष दे। उससे क्या गलती हुई है। हालाकि सियासत का ये दावा अक्सर सुनने को मिलता है कि किसानों की आमदनी दुगुनी होगी। उसे अपने फसल के लागत पर डेढ़ गुणा मूल्य मिलेगा। 

कुछ यही आलम इन दिनों बाजार में दिख रहा है जब आलू, प्याज उत्पादक किसानों का है। महामारी के दौरान जिस तरह से लॉकडाउन लंबा खिंच रहा है, उसमें टमाटर की कीमत काफी गिर गई है और अन्य सब्जियों का खरीदार भी बाजार में नहीं दिख रहा है।

जी हां, देश की राजधानी दिल्ली की थोक मंडियों में टमाटर, प्याज समेत तमाम सब्जियों के दाम में भारी गिरावट देखी जा रही है। फलों और सब्जियों की एशिया की सबसे बड़ी थोक मंडी, दिल्ली स्थित आजादपुर मंडी में टमाटर एक रुपया प्रति किलो से भी कम भाव पर बिकने लगा है। मंडी के कारोबारी और आढ़ती बताते हैं कि सब्जियों के फुटकर विक्रेताओं की तादाद मंडी में काफी कम हो गई है, जिसके कारण मांग कम है। मंडी में दो रुपये किलो भी टमाटर का कोई लेने वाला नहीं है। प्याज का भाव भी काफी गिर गया है और यह 2.50 रुपये किलो तक थोक में पहुंच गया है। दिल्ली से लाखों लोगों के पलायन कर जाने से दाम घट गया है।

मौसमी सब्जियों की कीमतों में भी गिरावट
केवल टमाटर ही क्यों, अन्य हरी सब्जियां भी औने-पौने दाम पर बिक रही हैं। मौसमी सब्जियां मसलन घिया का थोक भाव दो से तीन रुपये प्रति किलो हो गया है और तोरई छह रुपये किलो बिक रही है। इसी प्रकार, अन्य सब्जियों के दाम में भी गिरावट आई है। न तो मंडी में खरीदार हैं और न ही किसान की फसल आ पा रही है। इतना ही नहीं बड़ी संख्या में राजधानी दिल्ली से पलायन का असर भी मंडी पर पड़ा है। साथ ही लॉकडाउन के कारण खाने पीने का होटल, ढ़ाबा,टिफिन सेंटर आदी बंद होने से भी सब्जी के खपत पर असर पड़ा है।

उल्लेखनीय है कि मंडी में भीड़भाड़ कम करने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए टोकन सिस्टम से प्रवेश की व्यवस्था की गई है। सब्जी मंडी में कोरोना संक्रमण के फैलाव के खतरे को देखते हुए लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिग का पालन पुख्ता तरीके से किया जा रहा है। इस वजह से भी छोटे सब्जी विक्रेता मंडी आने से कतरा रहे हैं। मंडी में टोकन सिस्टम के कारण ग्राहकों को काफी इंतजार करना पड़ जाता है, जिससे वे सब्जी लेने के लिए मंडी नहीं आना चाहते हैं। हालांकि फल कारोबारियों का कहना है कि फलों की मांग कम नहीं हुई है, इसलिए फलों के दाम में कमी नहीं आई है।
आजादपुर मंडी एपीएमसी के रेट के अनुसार, टमाटर का थोक भाव जहां एक मई को 6-15.25 रुपये प्रति किलो था, वहां विगत तीन दिनों से यह 0.75-5.25 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. इसी प्रकार प्याज का थोक भाव जहां एक मई को 4.50-11.25 रुपये प्रति किलो था, वहीं शनिवार को यह 2.50-8.50 रुपये प्रति किलो था।
खेत से ही खरीदी जा रही है सब्जियां

हालाकि दिल्ली और आसपास के वैसे किसान जो यमुना किनारे सब्जी की खेती करते थे छोटे व्यापारी व ग्राहक लॉकडाउन में मौसमी सब्जियों की खरीदगी के लिए डायरेक्ट किसानों के खेतों में ही पहुंच रहे हैं। जहां उन्हें ताजी सब्जियां कम कीमत में मिल जा रही है। लोग मंडी जाने से कतरा रहे हैं और खेतों से ही सब्जियां खरीद रहे हैं।
आम उपभोक्ताओं को नहीं हो रहा है फायदा
हालांकि देश की राजधानी और आसपास के इलाकों की कॉलोनियों में सब्जी विक्रेता टमाटर 15-20 रुपये प्रति किलो बेच रहे हैं। इसी प्रकार अन्य सब्जियों के दाम भी थोक भाव से काफी ऊंचे चल रहे हैं। जब सब्जी विक्रेताओं से इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने बताया कि मांग में कमी होने और लॉकडाउन के कारण आने जाने में परेशानी होने के कारण लोग सब्जी मंडी नहीं पहंच रहे हैं। जो पहुंच रहे हैं उनको भी काफी देर लग रहा है तथा सामान लाने में अधिक कीमत देनी पड़ रही है। साथ ही साथ कई लोगों कोरोना के कारण गलियों में आने जाने में प्रतिबंध लगा दिया है। बाजार भी 6 बजे ही बंद हो जा रहे हैं। इन सब का असर बिक्री पर पड़ा है। इसके साथ ही मंडी से जो विक्रेता थोक में जो सब्जी या फल लाते हैं, उनमें से कुछ सब्जी व फल खराब हो जाते है। इसलिए उनको थोक बाजार के मुकाबले ऊंचे दाम पर बेचना पड़ता है।

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