August 15, 2020

गांवो के आत्मनिर्भरता की बात निकली है तो उत्तराखंड में दूर तलक जाएगी

मंगरूआ

  • उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में “कोरोना संकट : बचाव एवं राहत तथा आत्मनिर्भर गांव” बिषय पर आयोजित तीसरी सरकार अभियान के वेबीनार में वक्ताओं ने रखी राय

हरिद्वार: कोरोना महामारी के दौरान प्रवासियों के गांव लौटने का सिलसिला चला। स्वाभाविक था देश के अन्य राज्यों की तरह ही प्रवासी राज्य उत्पारखंड से भी बड़ी संख्या में प्रवासी देश के अन्य हिस्सों से गांव लौटे। ऐसे में गांव लौटे प्रवासी को लेकर गांवों में चर्चा स्वाभाविक थी। कोई इन्हें कोरोना कैरियर बताता हुआ पाया गया तो कोई कोरोना वॉरियर्स। लेकिन इस बीच गांवों के आत्मनिभर्रता को लेकर नये सिरे से विमर्श की प्रक्रिया भी शुरू हुई। इसी कड़ी में तीसरी सरकार अभियान के बैनर तले उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में “कोरोना संकट : बचाव एवं राहत तथा आत्मनिर्भर गांव” बिषय पर वेबिनार का आयोजन किया गया। इस दौरान वक्ताओं ने इस बात पर खुशी जताई कि महामारी के दौरान भी उत्तराखंड के गांवो ने अपनी व्यवस्था को इतना पुख्ता रखा कि एक तरफ गांव को कोरोना से बचाया गया वहीं दूसरी ओर बाहर से लौटे प्रवासियों को भी समायोजित करने और आगे का राह निकालने का प्रयास हुआ
इन वक्ताओं ने रखी राय
उत्तराखंड के इस वेबिनार में राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान के पूर्व महानिदेशक डॉ. डब्ल्यू. आर.रेड्डी, सोभित विश्वविद्यालय के कुलाधिपति कुंअर विजेन्द्र शेखर, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार एवं शांतिकुंज के प्रतिनिधि श्री वीरेश्वर उपाध्याय, श्री राम बहादुर राय अध्यक्ष इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नईदिल्ली, मिशन समृद्धि के सहसंस्थापक श्री योगेश एंडले, डा.दिवाकर सिन्हा आई.एफ.एस., डा.एच.सी.सेमवाल निदेशक पंचायतीराज उत्तराखंड, नरेश सिरोही, वासवराज पाटिल शामिल हुए।
क्या कहा डॉ प्राण ने
तीसरी सरकार अभियान के संस्थापक डा. चन्द्रशेखर प्राण ने वेबीनार का संयोजन करते हुए कहा कि तीसरी सरकार अभियान,पंचायतों के संस्थागत विकास और सशक्तीकरण का लोक अभियान है, जिसे देश के प्रबुद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, विचारकों, पत्रकारों, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों एवं जनता के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इस अभियान को 06 वर्ष पहले शुरु किया गया था। गत 14 अप्रैल 2020 को प्रधानमंत्री ने आह्वान किया था कि देश को आत्मनिर्भर बनना होगा और यह आत्मनिर्भरता गांव के माध्यम से आयेगी। उत्तराखंड आत्मनिर्भरता की दृष्टि से अपनी प्राकृतिक विशेषता के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।


केद्र और राज्य सरकारें नहीं दे रही पंचायतों पर ध्यान
राम बहादुर राय ने कहा कि कोरोना के संकट को अवसर में बदलने के लिए तीसरी सरकार अभियान का यह प्रयास सराहनीय है। संविधान निर्माताओं की मंशा और महात्मा गांधी के सपनों का गांव कैसे बने, तीसरी सरकार अभियान का यही प्रयास है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकार पंचायत पर ध्यान नहीं दे रही है। इसलिए हमको स्वयं अपनी गांव सरकार को मजबूत करना होगा।
कलस्टर बनाकर कार्य करें पंचायतें


राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान के पूर्व महानिदेशक डॉ. डब्ल्यू. आर.रेड्डी ने कहा कि वापस लौटकर आए सभी लोगों को रोजगार देने की स्थिति अभी नहीं है। कृषि भी सीमित है। परम्परागत खेती पर निर्भर नहीं रह सकते। कुछ लोगों को नया कौशल सिखाकर व्यवसाय से जोडने का विचार अच्छा है लेकिन इसे कैसे कार्यान्वित करेंगे? यह एक चुनौती है। कोरोना में बचाव, राहत और आत्मनिर्भरता के लिए कार्य पंचायत से ही होना है।पंचायत को मुख्य धारा में लाने का अच्छा अवसर है। उत्तराखंड में पंचायतें छोटी हैं। पंचायत कलस्टर बनाकर कार्य करना अच्छा रहेगा। पंचायत में प्रवासी मजदूरों का खाका होना चाहिए। कौन आ रहा है और कौन कहां जा रहा है, इसकी जानकारी रहनी चाहिए। अवसर बहुत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थानीय संसाधनों के आधार पर योजना बनानी चाहिए। आर्थिक गतिविधि के लिए रचनात्मक ज्ञान एवं ऊंचे दर्जे का हुनरमंद अनुभवी की सहायता चाहिए होगा। संस्थागत व्यवस्था की भी आवश्यकता होती है। कोआपरेटिव सफल नहीं है। इसलिए इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। पंचायत इस कार्य को कर सकती है लेकिन पंचायत नेतृत्व में जुनून और प्रतिबद्धता कैसे आए। उत्तराखंड में में बहुत क्षमता है। कृषि संबंधी विविधता है, तो यह देखना है कि हम क्या पृथक कर सकते हैं।
आपदा ने दिया आत्मनिर्भरता का अवसर
वहीं योगेश एंडले ने कहा कि कोरोना के कारण बड़ी संख्या में लोग अपने घर वापस आए हैं। इनमें से ज्यादातर लोग अपने सगे, संबंधी हैं। इनके लिए उपचार और राहत की व्यवस्था करनी है। कोरोना का संक्रमण इनके माध्यम से अन्य लोगों तक ना फैले, इसके लिए बचाव का भी प्रयास करना है। कोरोना महामारी तो है लेकिन इसने लोगों के दृष्टिकोण में बदलाव भी किया है। गांव और देश को आत्मनिर्भर बनाने का अवसर भी दिया है। जिसदिन लोगों में यह विश्वास आ जायेगा कि हम अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकते हैं, उसी दिन गांव ग्राम स्वराज्य की दिशा में बढ जायेगा।
उत्तराखंड पंचायतीराज निदेशक एच.सी. सेमवाल ने कहा कि उत्तराखंड में कोरोना का प्रकोप बहुत अधिक नहीं है। सरकार राहत एवं बचाव के लिए पूरा प्रयास कर रही है। राज्य में लगभग दो लाख प्रवासी मजदूर वापस आए हैं। इनको रोजगार से जोड़ने का प्रयास चल रहा है।आप सभी फील्ड में कार्य कर रहे हैं।आप अपने अनुभव के बारे में बताएं और सुझाव दें, जिससे हम ज्यादा अच्छा कार्य कर सकें।
पंचायत प्रतिनिधियों की राय
सरपंच मीनूबाला ने अपने वक्तव्य में कहा कि कोरोना से जीवन के लिए संकट तो खड़ा हुआ है लेकिन कई मामलों में सकारात्मक सुधार भी हुआ है। जैसे वातावरण शुद्ध हुआ है। लोगों की आदतों में बदलाव आया है। शादी-विवाह में खर्च कम हुआ है। अपराधिक घटनाओं में भी कमी आयी है। हम दृष्टिकोण में बदलाव करके आत्मनिर्भरता के लिए नये सिरे से शुरुआत कर सकते हैं। जैविक खेती, डेयरी फार्मिंग, कैश क्राप, लघु उद्योग एवं व्यवसाय करके सफलता पायी जा सकती है।
ग्राम पंचायत विकास अधिकारी संगठन के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राकेश शर्मा ने बताया कि उत्तराखंड में संक्रमण का बहुत अधिक प्रभाव नहीं है लेकिन जो प्रवासी लौटकर आए हैं, उन्हीं के कारण चुनौती बढ गयी है। राज्य सरकार के दिशा निर्देश पर बाहर से आने वालों को पंचायतों द्वारा क्वारंटीन किया जा रहा है। मजिस्ट्रेट द्वारा इसकी जांच भी की जा रही है। रोजगार की समस्या के समाधान के लिए सरकारी विभागों में तालमेल करके सहायता दी जा रही है।खादी ग्रामोद्योग, जिला उद्योग केंद्र, पर्यटन विभाग का भी सहयोग लिया जा रहा है। वापस लौटने वाले मजदूर खेती में भी नगदी फसल का कार्य कर रहे हैं।
लोगों के अंदर से डर निकालना होगा
सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद सिंह बिष्ट ने कहा कि लोग सपरिवार गांव लौटकर आए हैं। वह अब गांव में ही रहना चाहते हैं लेकिन गांव में रोजगार के संसाधन बहुत कम हैं। ऐसे तमाम गांव हैं जो शहर या कस्बे के निकट हैं लेकिन उनमे भी सार्थक संबंध नहीं है। जो गाँव जिला मुख्यालय से दूर हैं, उनकी स्थिति ज्यादा खराब है। ऐसे में व्यवसाय कैसे हो सकता है। कृषि जोत का क्षेत्र वनों से जुड़ा है। जंगली जानवर भी नुकसान करते रहते हैं। लोग डरे हुए हैं। इनको उत्साहित करने की आवश्यकता है।
उपलब्ध संसाधनों का हो बेहतर इस्तेमाल
उत्तराखंड के सेवानिवृत अधिकारी डा.दिवाकर सिंह ने उत्तराखंड राज्य की भौगोलिक क्षेत्र की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि राज्य में 86 प्रतिशत पर्वतीय क्षेत्र और 14 प्रतिशत कृषि क्षेत्र है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 70 लाख लोग रहते हैं। मनरेगा में लगभग 28 लाख मजदूर हैं। सभी को नियमित काम नहीं मिल पाता है। लगभग 10 लाख ऐसे मजदूर हैं, जिन्हें 15 दिन ही काम मिल पाता है।राज्य में लगभग 60 लाख हेक्टेयर मैदानी एरिया है।इसमें लगभग 08 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि है। राज्य में उपलब्ध संसाधनों का कैसे अच्छा इस्तेमाल करते हुए प्रयास किया जा सकता है। राज्य के उत्पादों में वैल्यूएडीसन करके मार्केटिंग की संभावनाओं को देखा जा सकता है।


नयी संभावनाओं का हो सृजन

सोभित विश्वविद्यालय के कुलाधिपति कुंअर विजेन्द्र शेखर ने कहा कि कोरोना के कारण लोग लौटकर आए हैं। इस परिस्थिति में एक सवाल हैं। वह यह कि जो वापस लौटकर आया है, वह गया ही क्यों था? गया इसलिए था,क्योंकि उसके पास यहां कोई रोजगार नहीं था। क्या इतने दिनों में हमने उनके लिए कुछ संभावनाएं बनायी हैं? यदि नहीं तो स्थिति सामान्य होते ही वह फिर चला जायेगा। हमें यह भी समझना है कि जो वापस लौटकर लोग आए हैं, वह अनस्किल्ड नहीं हैं। उन्हें सिर्फ मनरेगा में नहीं लगाया जा सकता है। इन मजदूरों में क्या स्किल है, इसको रिकॉर्ड में लेने की आवश्यकता है।हमने अपने विश्व विद्यालय के माध्यम से उनको सहयोग करने का प्रयास किया है। इनमें जो स्किल है उसके अनुसार उनके लिए स्थानीय इंडस्ट्रीज में एप्रोच करने की जरूरत है।
इस मामले में उ.प्र.सरकार की एक जनपद एक उत्पाद को प्रमोट करने की पहल अच्छी है। उत्तराखंड बहुत खूबसूरत राज्य है। यहां हर जिले में कुछ ना कुछ अद्वितीय है। मेरे विश्वविद्यालय के स्तर पर यदि कोई सहयोग बन सकता है तो मैं अवश्य करूँगा।
योगेश धस्माना ने कहा कि जो प्रवासी लौटकर आए हैं उनमें कोई लेबर नहीं है।वह स्किल्ड लोग हैं, इनमें से 90 प्रतिशत वापस चले जाएंगे। उत्तराखंड के ज्यादातर जिलों में कनेक्टिविटी की समस्या है।सड़कें भी नहीं हैं और डिजिटल कनेक्टिविटी कम है। यदि कोई ठोस योजना नहीं बनती तो प्रतिभा पुनः स्थानांतरित करेगा।
प्रत्येक गांव की बने अलग योजना
उत्तराखंड प्रशासनिक अकादमी की प्रवक्ता मीता उपाध्याय ने बताया कि प्रत्येक गांव की परिस्थितियां और पर्यावरण अलग हैं। इसलिए प्रत्येक गांव के लिए अलग प्लानिंग होनी चाहिए। कोरोना काल में कुछ लोग प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना चाहते हैं। इसलिए ‘घर पर रहना’ की योजना अच्छी है। यात्रा और पर्यटन में भी संभावनाएं हैं।
गांव में आत्मनिर्भरता का भाव जगाना होगा
किसान चैनल के पूर्व सलाहकार और किसान नेता नरेश सिरोही ने कहा कि पहले देश में उदारीकरण और बाजारीकरण की बात हो रही थी, कोरोना के कारण गांव को मजबूत करने की बात हो रही है। गांव को कैसे और किस तरह का आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं? इस विषय में आत्मचिंतन की आवश्यकता है। हमारे गांव पहले आत्मनिर्भर हुआ करते थे लेकिन अब पराधीन हो गए हैं। पहले बाजारों पर हमारी निर्भरता नहीं के बराबर थी,अब हम ज्यादातर चीजों के लिए बाजार पर आश्रित हो गए हैं। हमें अपने फसल चक्र को समझते हुए अपनी खाद्य पदार्थों की जरूरत गांव से ही पूरी करने का प्रयास करना होगा। बाजार पर निर्भरता को निरंतर कम करना पड़ेगा। पर्यावरण को भी संरक्षित करना होगा। न्याय पंचायत स्तर पर एक संकल्पना बनानी होगी। मकानों को भी स्थानीय संसाधनों से कैसे अच्छा बना सकते हैं, इस पर विचार करना होगा।पशुधन,पेड़,जैवविविधता आदि पर भी सोचना चाहिए कि पहले कैसा था अब कैसा हो गया है। लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, वर्कशॉप, छोटे रेस्टोरेंट आदि किये जा सकते हैं।


तीसरी सरकार को बनायें प्रभावशाली
वीरेश्वर उपाध्याय शांतिकुंज हरिद्वार से जुड़े वीरेश्वर उपाध्याय ने तीन बिंदुओं पर कार्य करने की जरूरत पर बल दिया
1- कोरोना संकट में हम राहत,बचाव या उपचार और जागरूकता में क्या कर सकते हैं।
2- जहां उत्पाद होता हैं, वहां से मार्केटिंग कैसे कर सकते हैं।इसका रास्ता निकालना पड़ेगा।
3- पंचायत के रूप में तीसरी सरकार सबसे प्रभावशाली है, इसको कैसे मजबूत किया जा सकता है। इसतरह के कार्यक्रम बना कर कार्य शुरू करना चाहिए।

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संयोजक बसवराज पाटिल ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हिमालयन स्टेटस् में कोआपरेटिव का अभाव है। भूटान में हम लोगों की प्रेरणा से एक ड्रयूप कम्पनी बनी, जो 40 तरह के प्रोडक्ट्स बनाती है।आज इस कम्पनी का कारोबार लगभग 1300 करोड़ का है। यह जैविक खाद और देशी घी भी बनाते हैं।यह कम्पनी मांग का 20 प्रतिशत भी पूरा नहीं कर पा रही है। हमें इसी तरह के प्रयास की दिशा में विचार करना होगा तभी आत्मनिर्भरता आ पाएगी।
सामाजिक कार्यकर्ता मनीष कुकरेती ने गांव में होने वाले फल के प्रशोधन के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यदि गांव की शुद्धता के आधार पर मार्केटिंग की जाय तो सफलता मिल सकती है। जैम ,सास,शहद,दूध और घी जैसे उत्पाद लाभदायक सिद्ध होंगे।


कुल मिलाकर इस परिचर्चा से जो महत्वपूर्ण बातें निकल कर सामने आयी वो ये हैं
1- स्थानीय आवश्यकता, परिस्थितियां और संसाधनों के आधार पर गांव के आत्मनिर्भरता के लिए प्रयास करना होगा।
2- उत्तराखंड में कोरोना का संकट बहुत नहीं है लेकिन फिर भी बचाव के लिए जागरूकता का कार्य किया जाना चाहिए।
3- उत्तराखंड में बड़ी विभिन्नता और संभावनाएं हैं।यहां नये सिरे से सोचने और करने की आवश्यकता है।
4- उत्तराखंड के साथी इस वेबिनार की शीघ्र फालोअप मीटिंग की तिथि निश्चित करके निर्णय क्रियान्वयन की दिशा में बढ़ेंगे।
5- कार्य को शुरू करने के लिए नेटवर्क की जरूरत होती है। इसलिए उन क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए, जहां पहले से अपना कोई परिचित व्यक्ति या संस्था कार्य कर रही है, जिसमें एक व्यापक नेटवर्क इस कार्य के लिए तैयार किया जा सके।
उल्लेखनीय है कि इस वेबीनार में 75 से अधिक पंचायत प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार तथा अन्य प्रबुद्धजन शामिल रहे।

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