February 23, 2019

शहर में बाढ़…”मांडा-जोदङो से चेन्नई एक्सप्रेस “

amittttttttttttttttttttji_nअमित लोकप्रिय
हङप्पा में कभी पनपा जीवन, काल के कपाल पर की गयीं वे नक्काशियां हैं जो नंगी आंखों से देखने पर महज मुर्दों का टीला नजर आता है और अंतर्जगत की आंखों से देखने पर जीवन में भरोसा पैदा करने वाला स्मारक । सदिया बीत गयीं । चार से पांच हजार वर्षों में हमने इतिहास को कई बार बनाया और ढहाया लेकिन आज अपनी तमाम कथित उन्नत वैज्ञानिक चेतना और उपकरणों के आविष्कार के बावजूद हम हङप्पा में खङे मलबा को ‘हटा’ नहीं पा रहे । कभी-कभी मलबे जीवित इमारतों पर भारी पङ जाते हैं और इनका होना हमारे वजूद को आश्वासन देते रहते हैं कि समृद्ध अतीत के होते चिंता की कोई बात नहीं प्यारे । अतीत में सब कुछ उम्दा हो यह कहना तो प्रतिक्रियावादी है लेकिन इतिहास के धनात्मक विरासत से कुछ न सीख पाना प्रगतिशीलता भी तो नहीं ! उपेक्षा का ही नतीजा है कि हमारी आधुनिकता कभी आजमाइश के वक्त जीवन की भीख मांगती दिख जाती है। …बिना किसी फाहियान-ह्वेनसांग के मलबा के ईंटों से जीवन के गीत लगातार गाये जा रहे हैं ,कोई सुने तो सही !

amit-lok-priya_nप्रसंगवश एक गीत सुनिए -“गीत गाया पत्थरों ने” की तरह । सिंधु घाटी सभ्यता ( हङप्पा सभ्यता) का एक केन्द्र था धौलावीरा । कच्छ के रेगिस्तान में मनुष्य के हाथों गढा गया एक नखलिस्तान जहाँ पानी के महत्व को समझते हुए उसकी वंदना की गयी थी। वहाँ के लोगों ने जल और जल जनित स्वच्छता के प्रति ऐसा राग छेङा था जिसकी धुन 16-17 वीं सदी तक यूरोप तक नहीं सुन सका। पानी के एक-एक बूंद की परवाह करने वाले धौलावीरों ने पूरे शहर के चारों ओर पतले नहरों से जुड़े कई तालाबों का एक जाल सा बिछा रखा था । बारिश का पानी हो या समीपवर्ती नदियों से लाया गया पानी , वे सभी क्रमशः एक तालाब को भरते दूसरे तीसरे तालाबों में जमा कर सुरक्षित कर लिये जाते थे । यह संचित जल दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त किया जाता । जिस अंग्रेज़ी टॉयलेट को लेकर एक गर्व का भाव नवधनाढ्यों में प्राय: पाया जाता है वह यूरोपियन कमोड पहली दफा धौलावीरा में उपयोग में लाये जा चुके थे । शौचालय का पानी निकालने के लिए एक नाली बनी होती जो गली के हरेक घरों को जोङते हुए सङक की मुख्य नाली से जुङ जाती । इन नालियों में एक निश्चित दूरी पर गाद को जमा करने के लिए चैम्बर बने होते जिनकी समय समय पर सफाई करा ली जाती थी। अब यहाँ का हमाम देखिये । तालाब से निकला एक पईन साफ पानी को ऊंचाई पर बनी पतली सी नाली के जरिये हमाम तक ले आता था जहाँ स्नान के निमित खङे व्यक्ति के ऊपर गिरकर आज के शॉवर सा अहसास करा जाता । शौचालय की तरह हमाम से भी गंदा पानी व्यवस्थित ढंग से बाहर निकल जाता । दीवारें इतनी मजबूत कि 2001 में भुज में आया भूकम्प हिला तक नहीं सकी जबकि तथाकथित मॉर्डन टेक्नोलजी से बनायी गयीं अट्टालिकाएं जमीनदोज हो गईं। यहाँ की सङकें और गलियां तक सब एक निश्चित पैटर्न पर हैं मानो जमीन पर कोई कविता लिखी गयी हो छंदों में बंधे हुए । यह छंद हङप्पा सभ्यता के सभी मानव बसावटों हङप्पा,मोहनजोदङो ,लोथल में एक समान ढंग से विन्यस्त हैं ।

amittttttttttlok_nआज का भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और शहर उसके इंजन बन सकते हैं। सामाजिक जङता की सङसीं से पकङे गये गांव बेहतर बन नहीं सकते ऐसा मानने के पीछे कई कारण गिनाये जाते हैं। आज भी जाति ग्राम समाज का ड्राइवर बना हुआ है । किसी गांव में बहुधा एक ही बिरादरी के जमावङे के कारण गांव की गतिशीलता की संभावनाएं कुंद रही हैं। सामाजिक हैसियत की श्रेष्ठता के भाव में जो राजसी तसल्ली है वह किसी ‘टाटा अंबानी बिङला’ बनने में कैसे आ सकता है ! गांव संख्या में ज्यादा भी हैं । इनके आधुनिकीकरण के लिए किसी आर्थिक मॉडल जैसे पुरा (PURA) को रखना और उसको पूरा करना सरकारी खजाने के सेहत को लकवाग्रस्त कर सकता है। जो मध्यवर्गीय वर्ग राजनीति का एजेंडा तय करता है वह भी गांवों में कहां रहता है ! शहर में ही उसकी रोजी रोटी होती है यह ऐतिहासिक सच है। वहाँ शासकों का कोई लुटियन जोन होता है , लूटने लूटाने के लिए मॉल होता है , सैर सपाटे के लिए रिंग रोड होता है , शासकों से नजदीकी का अहसास कराने वाला कोई राइटर्स बिल्डिंग होता है और किसी डालमिया महिन्द्रा के चैरेटी शो में हिस्सेदारी का मौका होता है । समस्त भूभाग से पैसों का बहाव जिधर होता है वहीं ‘आम्रपाली’ का ठहराव होता है ।

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यदि शहरीकरण विकास की निशानी है तो ऐसा होना रोका नहीं जा सकता। शहर बसते रहे हैं और आगे भी बसेंगे लेकिन आज के शहरों का डिजायनर है राजनेता और वास्तुशास्त्र है राजनीति । वोटर विदके नहीं और माल मिलता रहा इससे ज्यादा जरूरत क्या है ? जिसे भी जैसे भी मकान बनाना हो बनाये सरकारी मशीनरी को कोई परवाह नहीं । आखिर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का अधिकार जो मिला हुआ है सबको । सरकारी जमीन पर कब्जा चाहिए ,कोई दिक्कत नहीं लेकिन वाटर बॉडीज ! ऐं …..!! पर्यावरणीय क्लीयरेंस का लोचा तो ….पर हम (अहम!) किस लिए बैठे हैं ..बस पार्टी फंड में थोङा दान कर दीजिए । जमीन आपकी हुई और नदी तालाब की जमीन पर बनने वाली इमारतें मुनाफा सहित आपके लिए हाजिर होंगे । इमारतें बनेंगी तब तो सबका ‘विकास’ होगा !! विपक्षी पार्टी भी मौन क्योंकि सत्ता में आना नहीं चाहता कौन ! तब दंड कौन देगा ? प्रकृति ही न ! प्रकृति किसी दवाब में नहीं आती और न ही पहचानती है कि अपराधी गरीब है कि अमीर ,स्वर्ण है कि शूद्र ,मुस्लिम है कि हिन्दू , शासक है कि शासित । अपने वजूद पर हुए हमले का बदला लेती है । मानवीय आपदा को प्राकृतिक बताने वालों से मानो उम्मीद ही क्या की जा सकती है ! जम्मू कश्मीर के बाद चेन्नई को बाढ का दंड मिल चुका है । पता नहीं अगला नंबर किसका हो । मतदाता को झेलने के लिए तैयार रहना है और राजा को “कि फरक पैंदा ।” ठोस बुनियाद की जगह मुफ्त साङी देंगे, टीवी देंगे , 2 रूपये किलो चावल देंगे में जो आकर्षण है वह ‘स्मार्ट सिटी’ में कहाँ !!! हमसे ज्यादा स्मार्ट तो हमारे पुरखों की सिटी निकली ।

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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