June 23, 2018

ताल तलैयों की दुनिया और अनुपम मिश्र

deeeep-prakashh_nदीप प्रकाश

तुम धूप की तरह थे, धूप जिसकी कोई एक पहचान नहीं होती. एक धूप होती है पौष की, बड़ी नरम, बड़ी मुलायम. पर पता नहीं कब चली जाती है. देखो न तुम भी तो चले गये. लेकिन तुम फिर आओगे एक धूप बनकर, सावन-भादो के साँझ कि यकायक भूली हुयी, बादलों के पेड़ पर फूली हुयी और ओस के मोती बिछाने वाली धूप बनकर” अनुपम जी का जाना भारतीय समाज, खासकर ग्रामीण समाज के लिए अपूरणीय क्षति है. आज जब पूरी दुनिया यांत्रिकता के भंवरजाल में फंसकर हाई-प्रोफाइल होने का दंभ भारती नजर आती है, ऐसे में ताल-तलैयों की बात करना या उनके लिए काम करना बहुत मामूली सी बात लगती है लेकिन भारत जैसे देश में, जहाँ आये दिन बाढ़ और सूखे की मार झेलनी पड़ती है- यह एक क्रांतिकारी क्षेत्र है. वैचारिकी से मिश्र जी गांधीवादी थे और शायद यही वजह है कि वे पर्यावरणविद थे, क्योंकि गाँधी की वैचारिकी में ‘गाँव’ सर्वोपरि था. मिश्र जी पर्यावरण के लिए तब से कार्य कर रहे थे जब देश में पर्यावरण के लिए विभाग भी न था. बिना किसी आर्थिक मदद के, बिना किसी सरकारी मशीनरी के भी उन्होंने पर्यावरण के सन्दर्भ में खोज-खबर रखी थी, उतना करोड़ों रूपए की परियोजनाओं और विभागों के होते हुए भी सरकार नहीं कर पायी.

anupam-mishra-newअपनी पूरी जिंदगी पर्यावरण के प्रति समर्पित करने के पश्चात मिश्र जी हम सभी के लिए बड़ी ही अनमोल चीज छोड़ गये हैं और वो है उनके द्वारा लिखी पुस्तक- ‘आज भी खारे हैं तालाब’ ये किताब अपने आप में अनूठी है. मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राणा राजेंद्र सिंह कहते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है. यही नहीं मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलक्टर श्री बी आर नायडू, जिन्हें हिंदी थी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढने के बाद इतना प्रभावित हुए कि हर जगह लोगों से कहते फिरते थे कि ‘अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ’, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा. नायडू जी की ये मामूली पुकार ने सागर जिले १००० तालाबों को पुनः जीवित कर गया. आज देश में पानी की जो समस्या है उसकी सबसे बड़ी वजह है पारंपरिक तौर-तरीकों को नजरंदाज करना. प्रकृति अपना काम बखूबी करती है लेकिन हम अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते जिसकी वजह से असंतुलन होता है. प्रकृति अपने नियम से हर वर्ष नियमित पानी देती है लेकिन उस पानी को संजो कर साल भर हमारे उपयोग के लिए रखने वाले तालाबों को भर कर उस पर कॉम्पलेक्स, मॉल, बस स्टैंड आदि बना कर वर्षा के पानी को बह जाने देते हैं. मिश्र जी कहते हैं- “ तालाब, बावड़ी जैसे पुराने तरीकों की विकास की नयी योजनाओं में बहुत उपेक्षा हुयी है, न सिर्फ शहरों में बल्कि गांवों में भी तालाब को समतल कर मकान, दुकान, मैदान, बस स्टैंड बना लिए गये हैं. जो पानी यहाँ रुककर साल भर ठहरता था, उस इलाके के भूजल को ऊपर उठता था, उसे हमने नष्ट कर दिया है. उसके बदले आधुनिक ट्यूबवेल, नलकूप, हैंडपंप लगाकर पानी निकाला है. डालना बंद कर दिया और निकालने की गति राक्षसी कर दी.”

anupa_nआधुनिकता के नाम पर हम जिन प्राकृतिक तौर-तरीकों को दरकिनार करते जा रहे हैं उन्हीं का फल है कि थोड़ी सी बारिश में भी दिल्ली, मुंबई जैसे अत्याधुनिक शहर नदी की शक्ल ले लेते हैं. अगर बारिश के पानी को ठहरने के लिए जगह दी जाये तो वो वहां साल भर तक आराम करेगी. लेकिन इसके लिए हमे जल संरक्षण के पुराने तरीकों को अपनाना होगा. तालाब और बावड़ी फिर से खोदने होंगे नहीं तो ऐसे ही हम चुल्लू भर पानी में मरते रहेंगे. आधुनिकीकरण अच्छी चीज है लेकिन जब कोई भी जरुरत से ज्यादा होती है तो हर्ज कर सकती है. हमने एक एक खास तरह की सोंच विकसित की है और वो सोंच है कि जो पुराना है वो गंवई और अनाधुनिक है. अब यह सोंच गांवों में भी पसरने लगी है. अब गांवों में भी कुंए और तालाब नहीं मिलते. बड़े तालाबों को भरकर खेत बना दिए गये हैं और कूओं की जगह हैंडपंप ने ली है. वर्तमान समय में ‘पानी’ अब राजनीति का विषय है. इसके आधार पर चुनाव लड़े जा रहे हैं. दिल्ली में जो सरकार बनी है वो पानी और बिजली के नाम पर ही बनी है. पानी को लेकर ही तमिलनाडु और कर्णाटक में तकरार है, पानी को लेकर ही पंजाब और हरियाणा जूझ रहे हैं. जो पंजाब और हरियाणा हरित क्रांति के संवाहक थे आज पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण है वे बीज जो पानी की ज्यादा खपत चाहते हैं, छोटी-छोटी नदियाँ जो प्राकृतिक नहर हुआ करती थीं उन्हें हमने नालों में तब्दील कर दिया है, गाँव के बाहर पूर्वजों द्वारा बनाए गये बड़े तालाब अब मैदानों की शक्ल ले चुके हैं  और फिर भी कहते हैं सब मौसम की वजह से हो रहा है.

anapppa0739 मिश्र जी कहते हैं “हमें भूलना नही चाहिए कि अकाल, सूखा, पानी की किल्लत, ये सब कभी अकेले नहीं आते. अच्छे विचारों और कामों का अभाव पहले आ जाता है. हमारी धरती सचमुच मिटटी की एक बड़ी गुल्लक है. इसमें १०० पैसा डालेंगे तो १०० पैसा निकाल सकेंगे. लेकिन डालना बंद कर देंगे और केवल निकालते रहेंगे तो प्रकृति चिट्ठी भेजना भी बंद करेगी और सीधे-सीधे सजा देगी.” एक कहावत है ‘आग लगने पे कुंआं खोदना’ आज के सन्दर्भ में ये कहावत एकदम सटीक बैठती है. आज जल संरक्षण को लेकर जो सरकारी योजनायें बन रहीं हैं वो इसी का प्रतीक हैं. पहले तो सारी प्राकृतिक व्यवस्था को तोड़-मरोड़ दिया और अब उसकी जगह वाटरशेड डेवलपमेंट जैसी आधुनिक व्यवस्था लाये हैं. अरे जब हजारों लाखों सालों से प्रकृति ने अपना तरीका नहीं बदला तो उसे संजोने का पारंपरिक तरीका बदल कर क्या हासिल होगा. करोड़ों अरबों रूपए खर्च करके भी अभी तक हम इस समस्या का हल नहीं निकाल पाए तो समझ जाना चाहिए कि हम गलत दिशा में प्रयास कर रहे हैं. फसल के रंग को देखकर किसान समझ जाता है कि क्या गलती हुई है और क्या करने की जरुरत है लेकिन हमारी सरकारें इतनी नादान हैं कि इतनी योजनाओं के बाद भी नहीं समझ पायीं गलती कहाँ हो रही है.

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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