November 15, 2018

गांवो में सामूहिकता की भावना कम होने से बढ़ी स्वच्छता की चुनौती: नरेंद्र सिंह तोमर

संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: भारत के लिए स्वच्छता कोई नया विषय नहीं है। स्वच्छता हमारे संस्कार में है। परंपरा से ये बातें चलती आ रही है। गांव में एक तरह की सामूहिकता की परंपरा रही है। उस परंपरा में गांव में सॉलिड लिक्विड बेस्ड मैनेजमेंट की व्यवस्था न होते हुए भी गांव स्वच्छ होते थे। आज हमारे गांव में जैसे—जैसे सामूहिकता की परंपरा खत्म हुई है गांवो में भी स्वच्छता अभियान की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही है। आज गांवो में खेती का कचड़ा, गोबर, मानव मल, गंदगी का सामना करना पर रहा है,जबकि ये सारी चीजें पहले भी थीं। लेकिन साथ ही सामूहिक भाव भी गांव में था। जो गंदा पानी था वो बड़े इलाके में बहा दिया जाता था,ताकि गंदगी की वजह से प्रदूषण् न हो। महिलायें घर की सफाई करती थीं पुरूष बाहर की सफाई करता था। सामूहिक परंपरा थी,सामूहिक संस्कार था। यदि इस सामूहिकता के भाव को फिर से जाग्रत किया जाए तो घर ही नहीं पूरा मुहल्ला साफ हो जाएगा, और साफ सफाई रहेगी।

उपरोक्त बातें केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पब्लिक टॉक आॅफ इंडिया द्वारा स्वच्छता विषय पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए कही।
अब प्रश्न उठता है कि लोगों की स्वच्छता के प्रति इस तरह के मनोभाव के बावजूद स्वच्छता अभियान चलाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे कारण है मानव का एकांगी स्वभाव। जिसके कारण स्वच्छता के प्रति सामूहिकता की भावना कम हुई। स्वच्छता जो हमारा संस्कार हुआ करता था वो आज यूएन को बताने की जरूरत पर रही है कि भारत को स्वच्छ होना चाहिए। यदि हमने गांधी के स्व्च्छाग्रह को माना होता तो हमारे लोग जो यूरोप और अमेरिका में जाते हैं और वहां साफ सफाई देखकर उनकी प्रशंसा करते हैं उसकी जरूरत नहीं होती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को स्वच्छ करने का बीड़ा उठाया है और प्रधानमंत्री की प्रेरणा से यह आंदोलन बन गया है। हालांकि यह भी सही है कि कुछ काम सिर्फ सरकारी प्रयासों से पूरा नहीं हो सकता इसके लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है इसलिए स्वच्छता के संकल्प को पूरा करने के लिए सबको मिलजुलकर काम करने की जरूरत है।
यदि देश में चल रहे स्व्च्छता अभियान की सफलता को आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो देश में एक लाख 94 हजार गांव खुले में शौच मुक्त हो चुके हैं। देश के 137 जिलों को ओडीएफ घोषित किया गया है। केरल,हिमाचल और सिक्किम तीन राज्य खुले में शौच मुक्त घोषित किये गये हैं। सॉलिड—लिक्विड बेस्ड मैनेजमेंट का काम शहरों में नगर निगम के जरिए और गांवो में पंचायत के जरिए चलाया जा रहा है। स्वच्छता अभियान के लिए 14,000 हजार करोड़ रूपए का फंड दिया गया है। इ​तनी ही नहीं सरकार के अलग—अलग मंत्रालय इस काम में लगे हुए हैं और आंतरिक और बाह्य गंदगी को स्वच्छ किये जाना का प्रयास हो रहा है। क्योंकि स्व्च्छता के लिए जवाबदेही, व्यवहार परिवर्तन और सामूहिकता की जरूरत हे।

गांधी से सीखे स्वच्छता अभियानी  
वरिष्ट पत्रकार अ​रविंद मोहन ने कहा कि चंपारण के पूरे ईलाके में और अन्य जगहों पर जैसे—जैसे हैंड पंप का विस्तार हुआ है..इसके साथ ही पानी में आर्सेनिक की मात्रा देखी गयी है। लोग आर्सेनिक के चपेट में आ रहे हैं। जबकि पहले जो पानी की व्यवस्था थी उस लिहाज से लोगों ने काफी होशियारी दिखाई थी। लोग पानी के लिए गांवो में कुओं का इस्तेमाल करते थे। कुओं का पानी आज भी बेहतर है। हैंड पंप के बढ़ते इस्तेमाल के साथ आर्सेनिक आया है। कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिसमें हमारी जो पुरानी पीढ़ि थी वो साबुन का इस्तेमाल नहीं करती थी बावजूद इसके शारीरिक साफ सफाई के लिहाज से वे काफी सजग थे। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के विषय में कहा जाता है कि वे केवल होली के दिन ही साबुन लगाते थे। बावजूद इसके वे शारीरिक तौर पर काफी साफ सुथरे रहते थे। साबुन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ गंदगी बढ़ी है या कम हुई है इस सवाल पर भी विचार किया जाना चाहिए।
वर्तमान सरकार ने स्वच्छता को लेकर पहल की है। नाम भी बदल कर स्वच्छाग्रह किया गया है। प्रधानमंत्री इसे लेकर गंभीर हैं। ऐसे में मीडिया की अपनी जवाबदेही है। पत्रकार इस दिशा में लिख रहे हैं। उनका दायित्व निगराणी का भी है। वे समीक्षा करें, जहां गड़बड़ दिखे उसे उजागर करें। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है जहां यह अभियान समाज के अनुभव से अलग जा रहा है उस पर भी लिखा जाये।
इसके साथ ही सरकार द्वारा भी राजनीतिक अभियान और स्वच्छता अभियान के बीच के फासले को पाटा जाना जरूरी है। सरकारी स्तर पर कोशिश हो रही है लेकिन एक बार झाड़ू उठाने से बात नहीं बनेगी। जो लोग स्वच्छता अभियान को लीड कर रहे हैं वो गांधी से सीखें,परिस्थिति जन्य अनुभवों से सीखें तभी स्व्च्छाग्रह का सपना साकार होगा और देश साफ सुथरा होगा।

About The Author

एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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