January 19, 2020

गांधी के गांव का बदल गया समाजशास्त्र

विनोद कुमार मिश्र

मुझे याद है बुजुर्ग फोचाय मरर का वह गीत कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ, इसी गीत से गांव की सुबह की शुरुआत होती थी। फोचाय मरर के इस गीत के साथ शुरू होती थी कई आवाजे….मवेशियों के गले मे बंधी घंटिया, किसानों की चहल पहल..दूर से आती धान कूटती ढेकी की आवाज…उखल समाठ की आवाज ढाय ढाय… अल सुबह की ये सारी आवाजे मिलकर एक मेलोडी बना रही थी। कह सकते है कि बिहार के गांव की यह शाश्वत पहचान थी।

सामाजिक सरोकार का विहंगम दृश्य बिहार के हर गांव मे मौजूद था। जहां हर आदमी, हर गृहस्थ किसान की दैनिक जरूरतों में शामिल था। अपने इसी गांव को तलाशने मैं काफी अरसे के बाद गांव पंहुचा था। फोचाय मरर के कखन हरब दुख मोर हे भोला नाथ सुनने के लिए मैं सुबह से ही तैयार बैठा था। लेकिन न तो फोचाय मरर की आवाज सुनाई दी, न ही कहीं से मवेशियों की घंटी की आवाज, न ही कहीं किसानों की चहल पहल। ढेंकी और उखल न जाने कब के गायब हो चुके थे। गांव का नैसर्गिक-नेचुरल एम्बिएंस कहीं खो गया था, या यूं कहें कि गांव पूरी तरह से निशब्द हो गया था। मायूसी के साथ मैं उठा उस एम्बिएंस को तलाशने जो मेरे दिलो दिमाग में रचा बसा था। शायद इस भ्रम में कि विद्यापति खो गए तो क्या हुआ लोरिक सलहेस तो जिन्दा होंगे। दूर से आती आवाज ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। निशब्द गांव में छन-छन कर आती ये आवाज मुझे उद्वेलित कर रही थी। तेज कदमों से मुझे भागते हुए देखकर एक बुजुर्ग ने आवाज लगायी-मोर्निग वाक्। मैंने कहा हां ! नमस्ते ,आप कुशल हैं ? बस कट रही है उनका जवाब था। तब तक मैं एक भीड़ की शक्ल में खड़े लोगों के बिलकुल करीब था।

सुबह के 7 बजे होंगे तमाशबीन की भीड़ देखकर पहले तो मैं चौंका लेकिन सामने आने पर नजारा साफ हो गया था। मंच पर पसीने से तरबतर 17 -18 साल की नेपाली कन्या और उसके साथ झूमते दो तीन नौजवान। बैक ग्राउंड से आती उन्मुक्त और अश्लील भोजपुरी गीत। भीड़ से किसी ने जोर से आवाज लगायी यहां आ जाएं, बिलकुल पास में। यह नेपाल का मशहूर ओर्केस्ट्रा पार्टी है। भीड़ से बज रही सीटियों की आवाज मेरी अंतरात्मा को कचोट रही थी, क्या यही है मेरा गाँव। अपने गाँव के पुराने एम्बिएंस की तलाश में मै आगे बढ़ गया..पुनः अपने गांव को खोजने।

आर्थिक तरक्की के कारण सामाजिक बदलाव ने गांव का स्वरुप बदल दिया है। खेत-खलिहान भले ही खाली हो गए हों, लेकिन मनीऑर्डर इकोनोमी ने गांव को बाजार से सीधे जोड़ दिया है। जाहिर है आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भरता लगभग खत्म हो गयी है। आर्थिक विशेषज्ञ मानते है कि भारत के गांव मे बढा उपभोक्तावाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है, यानी मंदी के इस दौर में भी हमारी आर्थिक प्रगति 5 -6 फीसद के करीब है तो इसका श्रेय गांव को ही जाता है। लेकिन उपभोक्तावाद का यह अर्थशास्त्र गांधी के गांव में कैसे फिट बैठता है ? यह मेरी समझ से बाहर थी। उद्योग के नाम पर दूर दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है। लेकिन गांव में पारम्परिक भोज में लोग लाखों रूपये खर्च कर रहे हैं। हर चौक-चौराहे पर सजी धजी दुकानें, कोल्ड्रिंक से लेकर तमाम शहरी जीवन शैली लोगों की आम जरूरत में शामिल हो गयी है, बिहार में रोजगार का मतलब सरकारी नौकरी है या फिर पलायन के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

अब राम आशीष काका ने भैंस पालना बंद कर दिया है। उनके बच्चों ने सुधा दूध का डिपो खोल दिया है। अब भैंस की जगह इनके दरवाजे पर सुबह-सुबह मुजफ्फरपुर से गाड़ी आती है जो दूध से लेकर दही तक,घी से लेकर लस्सी तक हर चीज लोगों को मुहैया करा जाती है। ध्यान रहे यहां कोई उधार नहीं है, एकदम नगदी वो भी तुरंत।

क्या यह सब कुछ गांव ने कुछ खोकर पाया है। 80 के दशक में बिहार के गांव से शुरू हुआ भारी पलायन, ग्रामीण अंचलों में एक बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आई। गांव के तमाम पारंपरिक उद्योग ठप पड़ गए, पहले मजदूरों का पलायन हुआ बाद में किसानो का। लेकिन इस पलायन ने गांव की तस्वीर बदल दी। लोगों के स्टाइल बदल दिए ,यहां की संस्कृति बदल दी। लेकिन क्या हमने जो चमक पाई है वह स्थायी है। कभी मुंबई तो कभी दिल्ली तो कभी पंजाब तो कभी इंदौर हमें मुंह चिढ़ाता है, हमारे श्रम का उपहास करता है, कभी खदेड़ता है तो कभी पुचकारता है। पंजाब में खेतिहर मजदूरों की कमी हो जाती है, उनके सीजनल उद्योग में मजदूरों की कमी होती है तो हमारे सस्ते मजदूरों के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास करते है। लेकिन काम निकलते ही ये मजदूर भइया बन जाते है, बिहारी बन जाते है। बिहार से आया एक नौजवान मुझे एक सवाल करता है कि बिहार के गांव के एक किसान पांच छः एकड़ के मालिक होते हुए भी दिल्ली और मुंबई में मजदूरी करता है, लेकिन दिल्ली और मुंबई के एक-आध एकड़ जमीन के मालिक करोड़पति बन जाते है। यह कैसा अर्थशास्त्र है? जमीन का यह अर्थशास्त्र हमारी व्यवस्था ने वनाई है। पिछले 70 साल की हमारी व्यवस्था ने सिर्फ शहरों को बनाया है, देश के पूरे संसाधन को झोंक कर शहरों की भीड़ बढा दी है, लेकिन गांव को तरक्की की धारा से पूरी तरह काट दिया गया है।


ग्राम स्वराज वाले गांधी के देश में वोट की लालच में हर चीज फ्री मिलनी शुरू हो गयी है। पंचायत की ग्राम सभा अब तय करने लगी है कि गरीब कौन है, पैसा कहां लगेगा। लेकिन पंचायत पैसा कैसे उपार्जन करेगा उसकी कोई रुपरेखा नहीं है। सस्ते चावल और अनाज ने किसानो को फसल उगाने की जरुरत को खतम कर दिया है। अगर सरकार किसानों के फसल नहीं खरीदे तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अनाज की कोई कीमत नहीं है। अब अनाज के बदले छटाक-भर नमक नहीं मिलता। हर टोले पर स्कूल है, आंगनबाड़ी है लेकिन शिक्षक कहीं नहीं है। सरकारी स्कूलों में शिक्षक पढाई से ज्यादा बच्चो के दोपहर के भोजन के लिए प्रयत्नशील होते है। हर गांव में ध्वस्त हो रही प्राथमिक शिक्षा के बीच पब्लिक स्कूलों की भरमार है। जेवियर्स से लेकर मोंटेसरी संत यहां कैसे पहुंच गए, यह मिसिनरी वालों को भी नहीं पता होगा। लेकिन बालोहं जगतानंद,नमेवाला …का क्रेज अब यहां खत्म हो रहे हैं। सब से ज्यादा सुखद अनुभव यह है कि गांधी के गांव ने भी समझ लिया है कि ज्ञान से सब कुछ हासिल हो सकता है।

इसी गांव यानी सतघारा के डी एन झा सम्प्रति दुबई स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी के अधिकारी हैं। लेकिन गांव और अपने प्राथमिक विद्यालय से उनका लगाव बना हुआ है। उनका मानना है कि मातृभाषा के साथ अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है। उन्होंने इंग्लिश स्पीकिंग की एक पुस्तक लिखी है जिसमें बच्चे कुछ वाक्य बनाने की कला सीख कर फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकते हैं। झा यह पुस्तक अपने गाम के अलावा प्रदेश के ग्रामीण विद्यालयों में मुफ्त उपलब्ध कराते हैं। व्यवस्था परिवर्तन की चिंता छोड़कर गांव से बाहर गए पढ़े—लिखे लोग ग्रामीण शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। शिक्षा के व्यापक प्रचार के कारण पिछड़े वर्ग की बस्तियों में, दलित बस्तियों में प्राइवेट ट्यूशन ले रहे बच्चो को देखकर यह जरूर लगता है कि अपना हक पाने के लिए दलित पिछड़ों लोगों में भी चेतना जगी है और वह आरक्षण से नहीं कॉम्पिटिशन से कुछ हासिल करने के लिए अपने बच्चे को तैयार कर रहे हैं।

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