August 20, 2019

गांव स्मार्ट हों तभी शहर हो पाएंगे खुशहाल

  • शहरों की ओर लगातार हो रहे पलायन को रोकने के लिए गांवों के हालात बेहतर बनाने होंगे
  • देश में करीब ढाई लाख पंचायतें हैं। अगर एक पंचायत के विकास की जिम्मेदारी सीएसआर वाली एक कंपनी को दे दी जाए तो गांवों में बदलाव दिखने लगेगा

उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

मानसून के असमान वितरण के चलते ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाली की कहानियां एक बार फिर सामने हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में कई गांव पानी में डूबे हैं। जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल और असम समेत पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्से बारिश की तबाही के आदी रहे हैं। शरद ऋतु की ठंडक जैसे-जैसे नजदीक आती है, पता चलता है कि मानसूनी बौछार ने प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार पानी देने के साथ-साथ कितनी सारी चीजें छीन भी ली हैं। बिजली के टूटे खंभे, टूटी सड़कें, आवागमन के ध्वस्त साधन और बड़ी बिल्डिंगों में आईं दरारें- हर साल हमें ये बारिश के साइड इफेक्ट्स की तरह नजर आते हैं।

उपेक्षित पड़े गांव

ज्यादा बारिश वाले इलाके के शहरों में तो फिर भी बुनियादी ढांचा जल्दी दोबारा खड़ा कर लिया जाता है, लेकिन देहाती इलाकों को इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। इसका असर देहात के रोजी-रोजगार पर पड़ता है और फिर शहरोन्मुखी पलायन बढ़ने लगता है। प्रसिद्ध ललित निबंधकार और गंवई गंध के चितेरे विवेकी राय ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘गांव अब पगडंडियों से निकलकर सड़क पर आ गया है लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी आत्मा मरी है। विकास के मौजूदा मॉडल के बावजूद उसके यहां शहरों की तुलना में बुनियादी सुविधाएं कम हुई हैं। आज गांव की इच्छा शहर बनने की है लेकिन नौकरशाही के रवैये के चलते गांव न तो शहर बन पा रहा है और न ही गांव रह गया है।’

राजनीति जब भी चुनावी मोड में आती है, वह गांव, गरीब और किसान के विकास की बहुत बात करती है। हकीकत में विकास की असल कमान नौकरशाही के हाथ होती है। चूंकि व्यवस्था तंत्र के केंद्र में गांव है ही नहीं, लिहाजा विकास को नियंत्रित करने वाली नौकरशाही का पूरा ध्यान शहरों पर होता है। हमारा मीडिया भी शहरोन्मुखी है। अगर दिल्ली, मुंबई, चेन्नै या कोलकाता में पांच दिन तक बिजली ना आए, वहां की सड़कों में गड्ढा हो जाए, वहां दूध-सब्जी की सप्लाई रुक जाए तो मीडिया आसमान सिर पर उठा लेता है। लेकिन जब पता चलता है कि फलां गांव में दस दिनों से ट्रांसफार्मर जला पड़ा है और ढिकां गांव जाने वाली सड़क महीनों से टूटी पड़ी है, तब उसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती।

 

दरअसल हमारी व्यवस्था में मान लिया गया है कि देहात को असुविधाएं झेलने का अभ्यास है। लिहाजा उसके लिए कोई मुहिम चलाने की जरूरत नहीं है। हालांकि 2011 की जनगणना के मुताबिक जनसंख्या का 68 फीसद हिस्सा अब भी ग्रामीण इलाकों में रहता है। शहरों में सिर्फ 32 फीसद आबादी ही निवास करती है। इसमें भी महानगरों में रहने वाले करीब 25 करोड़ लोगों की असुविधाएं ही मीडिया, नौकरशाही और राजनीतिक तंत्र को परेशान करती हैं। यह विकास के मौजूदा मॉडल की नाकामी ही है कि भारत में लगातार शहरों की ओर पलायन बढ़ता गया है। इससे शहरों की परिधि पर बसे इलाके नरक बनते गए। खुली हवा, माकूल निवास और उचित रिहाइश शहरों की बड़ी आबादी के लिए अब भी सपना ही है।

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में शुरू किए गए स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट का एक मकसद जनसंख्या दबाव से जूझ रहे शहरों की बड़ी आबादी को जीवन की बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना भी था लेकिन इसका पूरा फायदा होता नजर नहीं आ रहा है। शहरों की तरफ पलायन रुका नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक साल 2001 में शहरों या दूसरे इलाकों में काम करने के लिए 14 करोड़ 40 लाख लोगों का पलायन हुआ। इसके बाद से हर साल यह संख्या बढ़ती ही रही है। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के गठन का भी एक मकसद इन राज्यों से महानगरों की ओर हो रहे पलायन को रोकना था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के जरिए पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के पीछे भी इरादा पंचायतों को केंद्र और राज्य सरकारों की तरह तीसरी सरकार के तौर पर प्रतिष्ठा देना था। सोच यही थी कि गांव में हालात बेहतर होंगे तो शहरों की ओर पलायन रुकेगा। अभी सरकारी योजनाओं का पैसा गांवों में जा रहा है, लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

चौदहवें वित्त आयोग ने पंचायतों के लिए दो लाख करोड़ की रकम का आवंटन किया है, जो प्रति व्यक्ति के हिसाब से करीब 2300 रुपये बैठती है। इस पर केंद्र और राज्य सरकारों का हक नहीं है। इस रकम को ग्राम सभा के जरिए बनाई गई योजनाओं में खर्चने का प्रावधान है। लेकिन ज्यादातर ग्रामीण, ग्राम पंचायत के सदस्य और ग्राम प्रधान इस तथ्य को नहीं जानते। ग्राम पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। कुछ राज्यों में कहा जाता है कि ग्राम्य विकास अधिकारी का काम पंचायत प्रतिनिधि को भ्रष्टाचार की ट्रेनिंग देना मात्र रह गया है। ऐसे में बेहतर यही होगा कि स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट ग्राम की परियोजना के बारे में सोचा जाए। इसमें सीएसआर यानी कारपोरेट सोशल फंड के तहत आने वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
 बदलेगा माहौल

देश में करीब ढाई लाख पंचायतें हैं। अगर एक पंचायत के विकास की जिम्मेदारी सीएसआर वाली किसी एक कंपनी को दी जाए तो गांवों में बदलाव दिखेगा। सीएसआर वाली कंपनी अपना कर्मचारी नियुक्त करेगी और अपना पैसा वह भ्रष्टाचार में नहीं जाया होने देगी। इसका असर यह होगा कि गांवों में बढ़िया रास्ते बनेंगे, बिजली के खंभे लगेंगे, पानी के निकास की उचित व्यवस्था होगी। सीएसआर फंड से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय उपज और मौसम के मुताबिक उत्पादन केंद्र भी बनाए जा सकेंगे। इसकी वजह से निर्माण भी होगा। उसका सीधा फायदा ग्रामीण आबादी को रोजगार के तौर पर मिलेगा। इससे गांवों का बुनियादी ढांचा दुरुस्त होगा तो बाढ़ और सुखाड़ का प्रकोप अगर हुआ भी तो उसका असर कम होगा।

(नवभारत टाईम्स से साभार)

 

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