April 05, 2020

स्मृतियों में अटका मेरा गांव

हरिवंश

जहां मैं पैदा हुआ, उस गांव का नाम सिताबदियारा है. थोड़ा समझना शुरू किया, तो पता चला कि गांव में कुल 27 टोले हैं. यह गांव दो नदियों ‘गंगा और घाघरा’ के बीच है. गांव के उत्तर घाघरा या सरयू, तो दक्षिण में गंगा. चौथी क्लास में पहुंचा तो पता चला कि यह गांव दो राज्यों और तीन जिलों में पसरा हुआ है. उत्तर प्रदेश और बिहार के दो राज्यों के तीन जिलों बलिया (उ.प्र.) और सारण (छपरा—बिहार), भोजपुर (आरा—बिहार) के बीच बसा, पसरा. दियर का इलाका. बचपन में हम बच्चे हर साल बाढ़ का इंतजार करते. प्रतिवर्ष तीन,चार महीने गांव बाढ़ के पानी में घिरा रहता या डूबा रहता. बाढ़ का इंतजार इसलिए होता, क्योंकि हम बच्चों के लिए वह स्कूल में छुट्टी लेकर आता था. नदी के पानी में घंटों नहाने, उछलने, मछली पकड़ने की नाकामयाब कोशिश या छोटी नाव (जिसे डेंगी कहते) पर सवार होकर घर—घर जाने का अवसर मिलता. यही बाढ़ बच्चों के लिए जश्न-उत्सव का अवसर होता, तो गांववालों के लिए आफत व जीवन-मरण का द्वंद्व.

जुलाई आते—आते नदियों में पानी बढ़ने की सूचना आती. किसान, बुजुर्ग, व्यस्क पुरूष-महिलाओं के चेहरे पर चिंता ती लकीरें उभरने लगतीं. हम बच्चे झुंड में भाग-भाग नदी किनारे जाते कि पानी कितना बढ़ा, किस रफ्तार से बढ़ रहा है, कब तक घर तक पहुंचेगा? जुलाई यानी सावन की हरियाली भी स्मृति में है. भारी बरसात होती, तो घर वगैरह में पानी टपकता. बाढ़ कम आयी, तो खरीफ की कुछ फसल हो जाती. रहर, मसुरिया, ज्वार वगैरह. कास बड़े-बड़े उपजते. घोड़पड़ास, सियार, हुड़ाड़-आवारा पशुओं से बचाव के लिए मचान बनाता, रात-दिन खेतों की फसल अगोरने या बचाने के लिए. वहां रहने वालों के लिए घर से खाना जाता. गांवों में सावन की अद्भुत हरियाली के चटक रंग अब भी याद हैं. तेज व भयावह लू के थपेड़ों धूल की आंधी व भयावह गर्मी के बाद यह हरियाली आती. पढ़ाई में हमारी कक्षा बदलती, नयी किताबें आतीं. आपसी झंझट होता, खेत या किसी और कारण तो खराब माहौल होता. पर गांव के पंचो का इकबाल तब तक था. बड़े-बुजुर्ग पहलकर सुलझाने की कोशिश करते.


गांव के नजदीक का रेलवे स्टेशन लगभग 15 किमी की दूरी पर था, वहां जाने के लिए 10-12 किमी पैदल चलकर नदी पार करना होता था. बाढ़ के दिनों में यही यात्रा पूरे दिन की हो जाती थी, नदी में पानी के बहाव और हवा की दिशा पर निर्भर करता था कि उसे पार करने में कितना समय लगेगा. घर से नाव से 18-20 किलोमीटर की यात्रा. नाव डूबने का खतरा हमेशा रहता. नदियां जब भी अपनी धारा बदलती थीं, कटाव होता, तब घर गिरते थे. टोले के टोले डूब जाते थे. जिनके साथ ऐसा होता, वे फिर कहीं और बसते थे. इस बाढ़ का असर यह होता था कि महज एक फसल होती थी. रबी की. वजह, बाकी समय जमीन पानी में डूबी रहती थी. गांव की बसावट ऐसी थी कि घर एक जिला या एक प्रदेश में है, तो खेत दूसरे प्रदेश के दूसरे जिलों में भी. एक ही आदमी का घर यदि यूपी के इलाके में है, तो जमीन का एक हिस्सा बिहार के छपरा में है, तो दूसरा आरा में.


जब कक्षा पांच में गया तो एहसास हुआ कि हमारे गांव के सबसे मशहूर व्यक्ति जयप्रकाश नारायण जी —जेपी— हैं. उनका घर बिल्कुल हमारे घर के पास था. बचपन में गांव के दो उत्सव या मेला स्मृति में हैं. ये आयोजन हम बच्चों की उत्सुकता का केंद्र होते . पहला 12 फरवरी, दूसरा 11 अक्टूबर. 11 अक्टूबर जेपी का जन्मदिन था और 12 फरवरी गांधीजी का स्मृति दिवस. जेपी ने अपनी जमीन में अपने घर के परिसर से जुड़े स्थल पर सर्वोदय आश्रम और गांधी खादी भंडार के लिए जगह दी थी. उस दियारे में पैदल पहुंचे विनोबा भावे ने इसका उद्घाटन किया था. वहीं यह आयोजन होता. गांव के स्थानीय लोग 11 अक्टूबर को उनका जन्मदिन मनाते. हम बच्चों के लिए वह उत्साह का दिन होता. हमारी समझ सीमित थी. कक्षा पांच में 12 फरवरी का अर्थ ज्यादा पता चला. हमारे टूटे-फूटे प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक ने कहा कि वहां बच्चों का भाषण होता है, तुम्हें गांधी पर भाषण देना होगा. उन्होंने भाषण लिखकर रटाना शुरू किया. स्कूल के अन्य बच्चे भी अन्य कार्यक्रम में थे. याद है, खादी टोपी और गांधी कुर्ता पहनकर गया था. पहला भाषण डरते—कांपते माइक पर वहीं दिया. गांव के बड़े लोगों ने कितना स्नेह दिया, मनोबल बढ़ाया, वह अब भी याद है. यह आयोजन जेपी ने आरंभ किया था. जब गांधी जी नहीं रहे, तो जेपी ने हिंदू परंपरा के अनुसार 13 वें दिन उनकी स्मृति में मेले का आयोजन कराया कि लोग गांधी को याद करें. भारतीय रीति-रिवाज के तहत श्राद्ध दिवस को एक तरह से गांधी स्मृति दिवस के रूप में मनाने की परंपरा की शुरुआत. इस अवसर पर ग्राम स्वराज्य को समझें, गांव की स्वायत्ता को पहचानें, विकेंन्द्रीकरण को जाने, यही कोशिश थी. विनोबा जी भी आए थे. सूत कातना, खेती, स्वदेशी इन सब की चर्चा लोगों की जुबान पर रहती थी.महिलाएं या पुरूष चरखा कातते,सूत बिकता.खादी आश्रम चलता.छोटी जगह में.एक खादी दुकान भी थी.


हमारे परिवार और गांव के लोगों ने जमीन देकर जेपी के नाम पर हाईस्कूल बनवाया. प्राइमरी के बाद कक्षा छह में वहीं पढ़ने गया. गांव के अधिकतर लोग अपढ़ थे.बहुत ज्यादा धन—संपत्ति नहीं थी.खेत थे.परंपरागत ढंग से खेती होती. बाढ़ के कारण, एक ही फसल. अच्छी बाढ़ से खेतों की मिट्टी उर्वर हो जाती, तो परिवार के गुजारा भर अन्न हो जाता. जातिगत विभेद था, पर लोगों का एक दूसरे के प्रति अपनत्व, स्नेह अद्भुत था. लोग गांव छोड़कर जाना नहीं चाहते थे. कई लोगों के विषय में सुनता. आईए—बीए करते ही पुलिस की नौकरी मिल गई पर नौकरी छोड़कर गांव लौट आये. गांव का जीवन, माहौल उनको ज्यादा प्रेरक लगा. सड़कें नहीं, बिजली नहीं, आवागमन के साधन नहीं, आधुनिक साधन-सुविधाएं नहीं, पर मानवीय रिश्ते बेहतर थे, आत्मीय थे, संवेदना पर आधारित थे. संयुक्त परिवार का दौर था. बुजुर्गों की अलग अहमियत थी.


रामायण और महाभारत पर चर्चा होती.रामायण का गायन भी.हरिकीर्त्तन होता.अनेक अपढ़ लोग थे, लेकिन रामचरित मानस उन्हें कंठस्थ था.साधु संतों का बड़ा आदर होता. भिखारी ठाकुर का नाच बड़ा मशहूर था. खेती जमकर होती, पशुधन बड़ा महत्वपूर्ण माना जाता था. पशुओं से मानवीय स्नेह, बचपन में यहीं घर से सीखा. बड़े स्नेह एवं सेवा से लोग पशुओं की देखभाल या जतन करते.गाय दूध की स्रोत थी. बैल हल का माध्यम, खेत जोतने वाले. भैंस भी होती. घोड़ा या घोड़ी भी लोग पालते. दियारे या रेत में सवारी के लिए. हाथी पालने की परंपरा छीज रही थी. सार्वजनिक चर्चा के विषय गांवों की समस्याएं, लोगों के दैनिक दुख-दर्द, आपस की समस्याएं, मुकदमें, साधु-संत, खेती वगैरह होते. आपस में कठोर कटुता होती, फिर भी मरने या शादी में बैर रखने वाले भी दुश्मन के घर मदद में होते. बाहरी झगड़ों में गांव के व्यक्ति की इज्जत, गांव की इज्जत मानी जाती. साधु-संतों का बड़ा आदर होता, वे अधिसंख्य साधु-संत भी आज जैसे नहीं थे. एक घर से एक शाम भिक्षाटन करते या बहुत आग्रह पर कही एकाध रात ठहरते.कहा भी जाता था, रमता जोगी, बहता पानी. गांव में ही गोरखपंथी व नाथ संप्रदाय के योगियों को देखा. उनका गायन सुन आंखो में आंसू आते. खासतौर से महिलाएं असहज होतीं. वे एक रात बमुश्किल एक जगह ठहरते. एक त्यागी बाबा आये, विलक्षण संत.मेरे एक संत चाचा ले गये. बियाबान में ठहरे थे. सरयू के किनारे. रात में अकेले रहते. आध्यात्मिक रूप से जागृत संत के रूप में उनकी कई विलक्षण यादें अब भी स्मृति में है.आमतौर से धोखा, झूठ, छल-प्रपंच जैसे प्रसंग बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते.
क्रमश: जारी…

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