December 14, 2018

सांसदों की लापरवाही : आदर्श गांव का सुपर फ्लॉप अफसाना

सांसद आदर्श ग्राम योजना सुपर फ्लॉप साबित हुई। बिहार में चयनित गांवों के विकास के लिए कोई स्कीम भी नहीं बन पाई। पूरी योजना फाइलों में अटकी रह गई । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2014 को इस योजना के शुरूआत की घोषणा की थी। देश के सभी सांसदों को एक-एक गांव गोद लेना था, उन्हें सरकारी योजनाओं का बेहतर प्रबंधन और गैर सरकारी प्रयासों के बेहतर नियोजन के माध्यम से आदर्श ग्राम के तौर पर विकसित करना था। परन्तु इस रचनात्मक कार्य में तथाकथित जन प्रतिनिधियों की दिलचस्पी का आलम यह था कि एक महीने की तय सीमा के भीतर केवल 200 सांसद ही गांव का चयन कर सके। कुल 793 सांसद हैं। यहाँ तक की भाजपा के केन्द्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नडढा, जयंत सिहा, मनोज तिवारी निशिकांत दूबे ने भी इस योजना में गाँव का चयन नहीं किया है।

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सांसद आदर्श ग्राम योजना का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में सरकारी सहयोग के बिना विकसित गांवों के उदाहरण दिए। कहा कि केवल सरकारी योजनाएं ही सब कुछ नहीं होती हैं। इसके सिवा भी बहुत कुछ होता है और यही सोच इस योजना की आत्मा है। अपनी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना पर उन्होंने कहा कि यह काम बहुत आसान हैं। हमें सिर्फ मिजाज बदलने की जरूरत है। उन्होंने आहवान किया कि सांसद किसी भी पार्टी के हों, सभी का विकास लक्ष्य होना चाहिए। गांवों के लोगों में विश्वास पैदा करना होगा जिससे वे गांवों पर गर्व कर सके।

प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान में शशी थरूर के शामिल होने से कोंग्रेस में नाराजगी उत्पन्न होने के बावजूद आदर्श ग्राम योजना के उदघाटन कार्यक्रम में कई कांग्रेसी सांसद भी पहुंचे थे। मोदी ने इसे लक्ष्य करके ग्रामीण विकास को दलगत विभाजनों से मुक्त रखने की अपील भी कर डाली थी। सोच यह थी कि गांवों के लिए संचालित 66 योजनाओं का कन्वजेंस करके आदर्श गांव में उन्हें जमीन पर उतारा जाएगा। इसके लिए सांसद जिला प्रशासन के साथ विभिन्न स्तरों पर तालमेल बिठाएंगे। पर करीब डेढ साल बीतने के बाद इस योजना की छानबीन करें तो योजना सुपर फ्लॉप दिखती है।

सांसद आदर्श ग्राम योजना के घोषित कार्यक्रम के अनुसार, सांसदों को एक महीने के भीतर एक गांव को गोद लेना और इसके बारे में संबंधित जिला प्रशासन को सूचित करना था। गांव का चयन करने में सांसदों की दिलचस्पी कम दिखने पर जिलाधिकारियों को संसदीय क्षेत्र से किसी गांव को चुनने और आदर्श गांव के नमूने के तौर पर विकसित करने की व्यवस्था करनी थी। इस योजना की नोडल एजेंसी ग्रामीण कार्य मंत्रालय को बनाया गया, पर प्रधानमंत्री कार्यालय से सीधे निगरानी करने की व्यवस्था हुई। राज्यों से 11 नवंबर तक उन सांसदों और गांवों की सूची मांगी गई जिन्होंने किसी गांव को गोद लेने की सूचना दी थी। इस मामले में उदासीन बने रहे सासंदों को स्मरण-पत्र भी भेजा गया। पर नतीजा क्या निकला?

देश में कुल 793 सांसद हैं, जिनमें लोकसभा के 543 और विधानसभा के 250 सांसद हैं। गांवों की संख्या देखकर 793 गांवों को आदर्श बनाने की योजना बहुत ही अपर्याप्त है। पर उसके प्रति सांसदों की लापरवाही और सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की निगरानी में चली योजना का हस्र अधिक बुरा है। भारत में कुल छ लाख 38 हजार 365 गांव हैं। देश की 68.84 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। दो लाख 36 हजार चार गांव ऐसे हैं जिनमें 500 से ज्यादा लोग रहते हैं। 3976 गांवों की आबादी 10 हजार से अधिक है। विकास का पैमाना अगर प्रचलित ढंग से बिजली, पानी और सडक को मान लें तो गांव की बहुत ही खराब है। बिजली अभी तक केवल एक लाख आठ हजार गांवों में पहुंचाई जा सकी है। पचास प्रतिशत गांव सडकों से नहीं जोड़े जा सके हैं। 11 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के पास पेयजल उपलब्ध नहीं है। केवल 24 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के पास शोचालय उपलब्घ है।

आदर्श गांव में सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, पुस्तकालय, सामुदायिक केन्द्र जैसे बुनियादी ढांचे का विकास, ई-गवर्नेस, ई-साक्षरता, समयबद्ध सेवा, शिकायत निवारण केंद्र पर्यावरण अनुकूल विकास के मानक पूरे होंगे। पर 200 से अधिक सांसदों ने गांव गोद नहीं लिए। गांव गोद नहीं लेने वाले सांसदों में अधिकतर विपक्षी दलों, खासकर तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, सपा और वामदलों के हैं, पर भाजपा के कई संासदों ने भी योजना से दूरी बनाए रखी है।

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केन्द्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नडढा, जयंत सिहा, मनोज तिवारी निशिकांत दूबे, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के नाम भी इनमें हैं। तृणमूल संासद डेरेक ओ ब्रायन के अनुसार, उन्होंने पार्टी की नीति के तहत गांव नहीं लिया। बंगाल के ग्रामीण इलाकों में तीन साल से काफी विकास कार्य हुए हैं। हमारा मानना है कि अगर एक गाव को गोद लिया जाता है तो दूसरे खुद को उपेक्षित महसूस करेंगे। माकपा के सीताराम येचुरी ने सवाल किया कि सिर्फ कुछ ही गांवों को विकास में प्राथमिकता क्यों मिले?

आदर्श ग्राम योजना का यह सकारात्मक पहलू जरूर है कि इसके बहाने सांसदों को विभिन्न सरकारी योजनाओं की जमीनी वास्तविकताओं की जानकारी होगी। देश के कानून बनाते वक्त या सरकार की नीतियों की समीक्षा करते वक्त वे जमीनी हकीकतों से वाकिफ होंगे। कानून या कार्यक्रम अधिक जनोपयोगी बन सकेंगे। आमलोग भी सरकारी कार्यक्रमों के प्रति जागरुक हो सकेंगे। परन्तु यह योजना हमारे कानून निर्माताओं के लकवाग्रस्त होने का एक नमूना बनकर रह गया है। सांसद चाहे तो 2016 के अंत तक गोद लिए गांवों में सरकारी योजनाओं को आरंभ करा सकते हैं, उनकी निगरानी के लिए वहां के निवासियों को जाग्रत कर सकते हैं। सरकारी कार्यक्रमों की जमीनी हकीकतों को जानने का प्रयास कर सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

About The Author

जनसत्ता (कलकत्ता) से जुड़कर बंगाल.. कलकत्ता, ओडीसा और पंजाब.. चंडीगढ़ में काम करने का मौका मिला। पूर्वोतर में रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव। पत्र पत्रिकाओं में नियमित लेखन।

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