October 14, 2019

नवटोलिया के गांव से शहर बनने की यात्रा

डाॅ. संजय पासवान
जब हम लोग 10 वीं में थे तो गांव था, जब 12 वीं में आए तो वार्ड हो गया। जब गांव था तब था लभटोलिया, जब शहर हो गया तो नाम नवटोलिया हो गया। पंचायत था कबिलपुर। गांव के माहौल में भाव था, शहर के माहौल में दाव आ गया। गांव था तो मिट्टी की सड़कें थी। कुछ जगह ईंट का सोलिंग था, शहर हो गया तो कंक्रीट हो गया। आदमी का हृदय भी मिट्टी-सा नाजुक हुआ करता था, आज कंक्रीट-सा कठोर हो गया। गाय, बकरी का दूध, देशी मुर्गा-मुर्गी का अंडा सहज उपलब्ध था। अब कुछ भी सहज रूप से उपलब्ध नहीं। हम लोगों का जो नवटोलिया है, उसे ब्रम्हणों ने ही बसाया था। हमारे पूर्वज मजदूरी करते होंगे, उन्हीं का दिया हुआ नाम है नवटोलिया। आज भी जो जमीन है जिसमें हमारा घर बना है, उसका कोई कागज नहीं है। इसका मतलब है मालिक का दिया हुआ। ऐसे लगभग 250 घर है। मेरे पिताजी महावीर राम उस गांव के पहले मैट्रिक पास थे। डिप्लोमा किया और ओवरशियर हो गए। मेरे टोले के बगल में दूसरा टोला है बलभद्रपुर, वहां मेरा ननिहाल है। ननिहाल में ददिहाल जैसा ही प्यार मिला। ददिहाल है कि ननिहाल, पता ही नहीं चलता।

पढ़े-लिखे ओवरशियर बाप का बेटा होने के कारण तवज्जो अधिक था। लोग स्नेह करते थे। छोटे-मोटे उत्पात पर बउआ है, बउआ है, कहकर दर किनार कर दिया जाता था। 1977 में मैट्रिक पास किया प्रथम श्रेणी में। उसके बाद आगे की पढाई करने के लिए सेंट कोलंबस, हजारीबाग गया। गांव आया तो ऐसा स्वागत हुआ जैसे बड़ा हीरो आ रहा है। लेकिन मेरी स्थिति यह थी कि मन पर एक दबाव था। गांव से बाहर जाने की इच्छा नहीं थी। इच्छा थी कि स्थानीय कालेज में पढूं। गांव छोड़ते रोना आता था। खेलकूद, मित्र यार, नानीघर का दुलार, सब यहीं रह जाता था।
जब गांव शहर हो गया, तब वार्ड का चुनाव हुआ। हमें उम्मीद थी कि मुखिया जी इस चुनाव में खड़े होंगे, लेकिन मुखिया जी चुनाव में खड़े नहीं हुए। उनके बजाय गौरीशंकर झा नाम का व्यक्ति जो अपराधी प्रवृति का था, चुनाव में खड़ा हो गया। ऐसे में लोगों में दिमाग में आया कि इसको कैसे जीतने दिया जा सकता है। इसी माहौल में पहली बार गांव में जातीय गोलबंदी का दंश दिखा। ब्राहम्ण उम्मीदवार के खिलाफ गैर ब्राहम्ण उम्मीदवार खड़ा करने का विचार बना। हमने प्रत्याशी खड़ा किया वो हार गया, इसके साथ ही मतभेद शुरू हुआ। वह अपराधी पूरे ब्राहम्ण समाज का नेता बन गया। दूसरी बार जब हमारा प्रत्याशी पप्पू राय खड़ा हुआ वह काफी वोट से जीता। हमने तय कर लिया था कि मेयर के चुनाव में ब्राहम्ण का समर्थन करेंगे। हमने कांग्रेस नेता रमाकांत कुंवर को सपोर्ट दिया। इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक प्रशिक्षण हुआ। यह 1978 से 83 का वक्त था। इस दौरान हमारी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी, छात्र राजनीति में भी रहा, लेकिन दलगत राजनीति से इसका लेना देना नहीं था।
गांव में सबसे अधिक पासवान समाज के लोग हैं, उसके बाद सुनार और तीसरे स्थान पर कायस्थ जाति की संख्या है। मेरे गांव के बगल में गोविंदपुर और दूसरी ओर बलभद्रपुर है। गोविंदपुर और बलभद्रपुर के बीच होने से शायद धार्मिक संस्कारों पर प्रभाव पड़ा। ब्राहमण भले ही आमंत्रण न दें, लेकिन सुन-सुन के पूजा-पाठ के प्रति आर्कषण बढ़ा। कायस्थों का पूरा सहयोग मिला। समाज पूरा सहयोग देता था। जब मैं नवादा का सांसद हुआ तो लोगों को लगा कि बाहर जाकर सांसद हुआ है तो गांव में भी सम्मान बढ़ा। सामाजिक दूरियां कम हुई। आगे चलकर यह भी महसूस हुआ कि पहले ब्राम्हण पंचायत करते थे, अब हमें भी पंचायत करने के लिए बुलाया जाने लगा। समाज की बेहतरी का प्रयास लगातार जारी है। गांव में कायस्थों ने एक मध्य विद्यालय खोला था, जिसका नाम महीप नारायण मध्य विद्यालय था। ब्राहम्णों की जमीन पर पूर्वांचल हाईस्कूल बना था। अशफी महासेठ जो सूरी समाज के थे, उन्होंने कीर्तन भवन बनवाया।

गांवों में कई तरह की समस्या हैं। पंचायत से विवादों को सुलझा लेने की व्यवस्था खत्म हो गई है। इससे आपस में दूरियां बढ़ी व संवाद कम हो गया। जमीन संबंधित विवाद बढ़ गया है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी की है, जो कि हर जाति, हर घर में हैं, जिससे हमलोगों को निपटना है। पूरे समाज की आर्थिक स्थिति एक जैसी ही है। बेरोजगारी की समस्या सभी जातियों में है। उपाय सरकार के पास नहीं है। स्वरोजगार, उद्यमशीलता का माहौल कैसे बने, इस ओर हमलोग प्रयास कर रहे हैं। मेरा गांव दरभंगा जिले में है और समस्तीपुर के वारिस नगर से विधानसभा चुनाव लड़ा था। इस इलाके में कुछ कर सकूं, यह यात्रा अनवरत चल रही है। दरभंगा, समस्तीपुर, नवादा ये तीनों क्षेत्र मेरे लिए समान है। यहां के लिए जो भी हो सके, वो करने की कोशिश रहती है, आगे भी जारी रहेगी।
हमारे यहां पलायन की बहुत बड़ी समस्या है। गांव के लोग पलायन करके हावड़ा, गोहाटी, लुधियाना, सूरत आदि शहरों में जाते हैं। पलायन को पूरी तरह से नकारात्मक भाव से नहीं देखा जाना चाहिए। शिक्षा बढ़ी है, नकद आने से लोगों का जीवन-स्तर बढ़ा है। लोग शहर जाकर बहुत कुछ सीखते भी हैं, लेकिन इसके बावजूद पलायन दुख का कारण है। लोगों को बुनियादी जरूरतों के लिए घर से बाहर जाना पड़ता है। एक तरफ जहां गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, वहीं पढ़ाई शहर केंद्रित होती जा रही है। शहर के लोग अधिकारों के प्रति सजग हैं, जबकि गांव में सुविधाओं में बढ़ोतरी होने के बावजूद अभी भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव दिखता है।
हम मानते हैं कि हमें जी एल ए डी रहना है। जी यानी गांधी, एल यानी लोहिया, ए यानी अंबेदकर, डी यानी दीनदयाल है। जो नया भारत बनना है, इसी के अनुरूप बनना है। गांधी के सर्वोदय, लोहिया का अभ्युदय, अंबेदकर का अंत्योदय, दीनदयाल का पुर्नरोदय यानी रिसरजेंट इंडिया, इन सबों में जो बात निहित है, वह यही है कि किसी को ‘अपीज’ नहीं करना और सबको ‘ईजी’ करना है और किसी को ‘टीज’ नहीं करना। समाज में सदैव समन्वय का भाव बना रहे, इसके लिए यह सब चीजें जरूरी हैं। हमें 5 पी पर ध्यान देने की जरूरत है। यानी पीपल, प्लैनेट, पीस, प्रोसपेरिटी और पार्टनरशीप। समाज की समृद्धि सुनिश्चित करना, सहयोग और समन्वय बनाए रखना बहुत जरूरी है ताकि सृष्टि बची रहे, धरा-धरणी दुरूस्त रहे। सबके ध्यान, संज्ञान में रहे तभी हम बेहतर की उम्मीद कर सकते हें।
हमने भगवती सीता का जन्मोत्सव ‘किशोरी दाई उत्सव’ के रुप में मनाना आरंभ किया। यह पर्व सामाजिक समरसता बढ़ाने वाला है, इसमें सभी समाज के लोग आते हैं। इस उत्सव के जरिए समाज में समरसता की स्थापना हुई है। सब लोग इकट्ठे होते हैं और आपस में संवाद करते हैं जिससे विवाद कम हुआ है। मेरी ऐसी सोच है कि पार्षद कोष से दरभंगा और समस्तीपुर में एक संस्कार संकुल खड़ा हो जिसमें ज्ञानशाला, यज्ञशाला, व्यायाम शाला एवं कौशल केंद्र विकसित हो। गांधी के 150 वीं वर्ष में यह काम शुरू हो। गांधी जी का एकादश व्रत-सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, सर्वधर्म समभाव, छुआछूत रहित समाज, श्रमनिष्ठा, भोजन नियंत्रण, अपरिग्रह के अनुरूप् काम को बढ़ाए जाने की जरूरत है।
यदि हम गांधी के सपनों के अनुरूप, ग्राम समाज की आत्मनिर्भरता के उनके आर्थिक, सांस्कृतिक व सामाजिक दर्शन के आईने में गांव को गढ़ने का प्रयास करें तो गांव आत्मनिर्भर होगा और संपन्न भी। भारतीय समाज के चार खंभें हैं और समाज की मजबूती के लिए इन चारों खंभों का स्थिर होना और मजबूती से टिका रहना जरूरी है। यदि हम इस चर्तुमुखी आदर्श को अपनाते हैं तो निश्चित रूप से भारत आने वाले वर्षों में विश्वगुरू के पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त करेगा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और विधान पार्षद

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