November 15, 2018

सिर्फ नदियों से ही नहीं बनेगा पूरा देश स्वच्छ

  • जल को कम खर्च करना और नदियों को मैला होने से बचाना, दोनों अंत में हमें एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।

 

बिना स्वच्छ नदियों के स्वच्छ भारत नहीं हो सकता है, और स्वच्छ नदियां बिना स्वच्छ भारत के नहीं हो सकतीं। अपने आस-पास देखकर तो ऐसा लगता है कि सभी जगह कूड़े को पानी के साथ बहाने की प्रवृत्ति घर कर गई है। आस-पास की नालियों को देखें, तालाब-झीलों को देखें, नौले, धारों, नहरों को देखें और नदियों का तो कहना ही क्या? नहरों में कूड़े का अंबार न लगता रहे, इस कारण देहरादून जैसे शहर में, जिसे कभी नहरों का शहर कहा जाता था, वहां अब नहरों को ढंक दिया गया है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब नहरों से पानी खेतों में सिंचाई के लिए पहुंच रहा है, तो साथ में कूड़ा-कचरा, प्लास्टिक गंदगी भी पहुंच रही है। उसे खेतों से बाहर निकालना ही समस्या हो गई है। पहाड़ों में सड़कें बनती हैं, तो मलवा, पत्थर आदि नदी-नालों में फेंक दिए जाते हैं या बहा दिएजाते हैं। सिर मुंड़ाने के बाद केश, शवदाह के बाद अस्थि, भस्म, पुष्प आदि को नदी-नालों में बहा देना तो धार्मिक कर्मकांड का ही हिस्सा होता है। इधर कुछ साल से ऋषिकेश, हरिद्वार ही नहीं, गंगोत्री और गोमुख तक भी यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि लोग स्नान-पूजन करके अपने पहने हुए कपड़े चप्पल और खासकर पूजा सामग्री आदि भी जल स्त्रोतों के किनारे ही छोड़ देते हैं।

नदियों की सफाई के संदर्भ में हम यह सब इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि जब जुलाई 2014 में केंद्र में पहली बार बने गंगा मंत्रलय ने गंगा मंथन का वृहद कार्यक्रम आयोजित किया था, तो वहां मौजूद जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी का कहना था कि प्रदूषित पानी को हर हालत में गंगा में जाने से रोकना होगा, बिना इसके गंगा साफ नहीं की जा सकती है। लेकिन यदि नदी, नालों, नहरों में जान-बूझकर और पूरे होशोहवास में कूड़ा बहाया जाएगा, तो यह सब कैसे होगा? पहले कहा जा रहा था कि निजी सार्वजनिक उपक्रम में जो लोग प्रदूषित जल को उपचारित करने में धन का निवेश करेंगे, वे उपचारित जल को उद्योगों को बेचकर कमा भी सकते हैं। मगर इतना समय बीतने पर भी ऐसे उद्योग जानकारी में नहीं आए हैं, जो उपचारित जल का उपयोग कर रहे हों, या ऐसा कोई बाजार हो, जहां इस तरह के जल की मांग हो। हालांकि ऐसे उद्योगों की सूची बढ़ी ही है, जिनमें होटल, खनन, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग, विद्युत उत्पादन, स्वास्थ्य सेवा देने वाले उद्योग भी शामिल हैं, जो जल-वाहिनियों को कूड़ा-वाहिनी बनाने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं। बेशक, इसी के साथ जुड़ा सवाल हमारी मानसिकता का भी है। जहां नदी, धारे दिखते हैं, वहीं आपको कई बार तीर्थ यात्रियों, सैलानियों और पिकनिक पर निकले लोगों के वाहन इसलिए भी खड़े मिलेंगे कि लोग वहां नहा सकें, शौच जा सकें, अपने कपड़े धो सकें और जरूरत होने पर वाहन चालक अपने वाहन की धुलाई कर सकें। नदियों में जानवरों को नहलाने का काम तो खैर होता ही है।मानसिकता की बात को हमें इसके साथ एक-दूसरे संदर्भ में भी जरूर देखना चाहिए। गंगा को साफ रखने के लिए दूसरों के उपचारित गंदे पानी के उपयोग की बात तो दूर रही, कंपनी की सामाजिक जिम्मेदारी यानी ‘कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ की अवधारणा के तहत ही यदि अपने उद्योगों, उपक्रमों के उपचारित जल का उपयोग कर या अपने उपक्रमों से शून्य प्रदूषित जल निकासी का भी आदर्श कुछ उपक्रम स्थापित कर सकें, तो वह बहुत बड़ी बात होगी।

अगर हम जल की गंदगी से बचना चाहते हैं, तो हमें अपने सामाजिक व्यवहार में एक आदत लानी ही होगी कि हम जल के उपयोग में हर तरह की मितव्ययिता बरतें। यह काम हमें हर जगह करना होगा- चाहे शौचालय में, चाहे स्नानागार में, रसोई में और अंतत: कृषि में। जल उपयोग में जितनी मितव्ययिता होगी, उतना कम पानी खुले बहावों में नालियों में और सीवर लाइनों में बहेगा। जल को कम खर्च करना और नदियों को मैला होने से बचाना, दोनों अंत में हमें एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। खेती में इस्तेमाल होने वाले उर्वरक व कीटनाशक रसायनों का बहाव भी जलस्नेतों के लिए एक समस्या पैदा करता है। हर क्षेत्र में जल मितव्ययिता लाने में तकनीक व नवाचार हमारी बहुत मदद कर सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं…हिन्दुस्तान से साभार)

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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