December 16, 2019

संपन्नता आई,पर जीवन का रंग चला गया

शिवमंगल सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

गांव में बजुर्गों का डेरा, गलियों में सन्नाटे का पहरा, बुंदेलखण्ड के दूसरे गांवों जैसी हालत है अपने गांव का, हुलिया भी कुछ वैसा ही है। सुबह का उल्लास मायूसी में बदल गया है, गोधूलि की चहचहाहट को खामोशी ने अपने आगोश में ले लिया है। दोपहरी में भी सिर्फ सांय-सांय का स्वर सुनाई देता है। गांव में सब कुछ तो बदल गया है। अब दोपहरी में नीम के नीचे न तो चौपड़-ताश खेलने-देखने वालों का जमघट लगता है और न ही जीत-हार पर उल्लास का स्वर सुनाई देता है। सुबह के अलाव कब के विदा हो गए। शाम को खेतों और बगीचों में होने वाली कबड्डी ने भी वर्षों पहले ही संन्यास ले लिया। अब न भुंजरियों का राग बचा और न ही होली का अनुराग। तो फिर बचा क्या है? कुछ नहीं! कुछ भी तो नहीं। पुरानी थाती तो कब की हमारे हाथों से रेत की तरह फिसल गई। यही हमारे गांव की कथा है और यही व्यथा है।

मेरा गांव यूं तो भौगोलिक लिहाज से बुंदेलखंड में आता है, राजनीतिक हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले जालौन का हिस्सा है। गांव भी बहुत छोटा है, मुश्किल से 350 की आबादी है। मैंने जबसे होश संभाला है, तब से जितना था उतना ही है, बढ़ा नहीं है। अमीर हो या गरीब जो एक बार गांव से गया तो समझो गया, फिर लौटता नहीं है। इसलिए न तो वोट बढ़ते हैं और न आबादी। माधौगढ़ तहसील का हिस्सा गांव का नाम है खुदातपुरा। गांव का खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले से बहुत मेल खाता है, इसकी वजह है मध्यप्रदेश बॉर्डर पास में होना। जब पैदा हुआ था गांव में तो गरीबी का डेरा था, लेकिन उस समय की युवा पीढ़ी हालात बदलने के लिए होड़ लगाए हुए थी। दिन-रात मेहनत में जुटी हुई थी। मेहनत का फल उस पीढ़ी को कितना मिला, पता नहीं लेकिन उसकी अगली पीढ़ी को जरूर मिली। इन सभी ने अपने-अपने सामथ्र्य के हिसाब से खूब पैसा कमाया। कमर तोड़ मेहनत से गरीबी की कमर तोड़ दी। बेटों को खूब पढ़ाया-लिखाया। बेटियों की अच्छी जगह शादियां कीं। सब खुशहाल हैं और अपने माता-पिता को इसका श्रेय भी देते हैं। लेकिन जो पीढ़ी गरीबी मिटाते-मिटाते खुद मिट गई, उसे क्या मिला, उसके खाते में क्या आया? उस मेहनत का फलसफा क्या रहा? अकेलापन, बचपन और जवानी की यादें। जिस पीढ़ी के लिए उन्होंने अपना जीवन खपाया वह तो बच्चे अपने बच्चों को साथ में लेकर फुर्र हो गए। बुजुर्गों दे गए एकाकीपन, अपने बेटे पोतों के आने का साल-साल भर का इंतजार। कोई-कोई निष्ठुर तो जीवन का भर के लिए ही तलाक-तलाक-तलाक बोलकर चले गए।

मुझे लगता है कि जो पीढ़ी गरीबी दूर करने के लिए लड़ी, आज गरीबी उन पर हंस रही है। पैसों के अभाव में नहीं, बल्कि जीवन के अभाव में। गांव में बिताए दिनों को जब याद करता हूं तब लगता है कि कितना कुछ खो दिया है हमने। हम तब गरीब नहीं थे अब गरीब हैं। तब अभाव था लेकिन अकेले नहीं थे। तब रुपए नहीं थे लेकिन रस था जीवन में, समाज में। उल्लास था, अपनापन था। एक-दूसरे के सुख-दुख में इकट्ठे होते थे। समरसता थी। सहकार था, तिरस्कार नहीं। एक-दूसरे का सम्मान था, लिहाज था। आज क्या बचा है ? गांव की होली, दिवाली, सावन, नवदुर्गा में क्या जीवन था। हर त्योहार के अलग-अलग रंग। सबके बीच में राग था। द्वेष का तो जैसे नामोनिशान नहीं था।

मेरे गांव में राजपूत और चमारों की ही अधिक आबादी है। एक घर बढ़ई का और एक घर धोबी का। बाकी और जातियां नहीं। कर्मकाण्ड के लिए ब्राह्मण दूसरे गांव से आते हैं। बाल्मीकि समुदाय, नाई और अन्य जातियों के लोग दूसरे गांवों से ही आते रहे हैं। गांव में कभी मैंने किसी तरह का जातीय संघर्ष तो दूर की बात, मनमुटाव तक नहीं देखा। रक्षाबंधन के दिन सभी एक-दूसरे को भुंजरियां भेंट करते थे। क्या ठाकुर और क्या चमार। बहन-बेटी चाहे ठाकुर की हो या चमार की, यदि कोई घर पर भुंजरिया देने आया है तो बहन राखी जरूर बांधती थी। जाति का कोई बंधन नहीं था। गांव के बाहर तालाब किनारे एक नीम था, उसमें झूला डाला जाता था। पूरे गांव का जमावड़ा। सभी जातियों की महिलाएं साथ में झूलतीं थीं। किसी के सम्मान को न तो ठेस पहुंचती थी और न ही पहुंचाई जाती थी। महिलाएं तो वैसे भी उदारमना होती हैं, सभी मिलकर सावन के गीत भी गाती थीं। अब न वो नीम रहा और न ही वह मेल-जोल। होली का भी अलग उल्लास था। लगभग एक हफ्ते फाग का माहौल रहता था। जो मिले उसे ही रंग लगा दो। फाग सभी के दरवाजे पहुंचती थी। पांच से सात फाग होती थीं, प्रत्येक दरवाजे पर। यहां भी कोई भेदभाव नहीं। फगवारे ठाकुर भी होते थे और चमार भी। एक ही जाजम (फर्श) पर सबको हुनर दिखाने का मौका मिलता था। दूसरे गांवों से भी लोग आते थे। जिसके दरवाजे पर फाग हो रही होती थी वह सबका सत्कार करता था। रंग भी बिना भेदभाव के डाला जाता था। दीवाली में भी सब देव स्थानों पर पूजा करने जाते थे, वहां न पंडित की व्यवस्था थी और न ही किसी अन्य जाति के व्यक्ति का तिरस्कार। सब अपनी-अपनी पूजा करते थे और आज भी करते हैं। लोगों को खेती-बाड़ी के कामों ने भी आपस में जोड़ रखा था। एक दूसरे की जरूरत तो ही लोगों में आपसी प्रेम और भाईचारा भी था। लोगों को चिंता रहती थी कि कहीं किसी का त्योहार तो फीका नहीं रह गया, किसी के घर का चूल्हा तो ठंडा नहीं रह गया।

पिताजी किसान हैं तो दूध और अनाज हमेशा घर में भरपूर रहा। पैसे की कमी तब भी थी और आज भी है। मुझे अच्छे से याद है कि दीवाली से एक हफ्ते पहले से ही गांव के कई घरों में चुन-चुनकर दूध पहुंचाने जाता था। इनमें ऐसे घर हुआ करते थे जिनकी गाय अथवा भैंस दूध नहीं दे रही होती थी, कुछ ऐसे असमर्थ लोग जो मजदूरी पर जीवन यापन करते थे, गाय और भैंस उनके घर में नहीं होती थी। यह दूध पूरी तरह से निशुल्क तो होता था। अब सारा दूध दूधिया ले जाता है, किसको फुरसत है कि देखे-आपको त्योहार फीका रहा या अच्छा। बेटी की शादियों में भी लोग हाथ बंटाते थे। मैंने अपनी बहनों की शादी में देखा है कि गांव का गरीब से गरीब व्यक्ति वह किसी भी जाति का हो, अपनी सामथ्र्य के हिसाब से कुछ न कुछ रुपए का योगदान जरूर करता था। इसे स्थानीय भाषा में त्योहार कहते हैं। इसका बाकायदा लेखा-जोखा होता था। जब वह व्यवहार देने आता था तो उसका सत्कार भी किया जाता था।

अब हालात पर नजर डालते हैं तो कुछ तो रोजगार, काम का तनाव और राजनीतिक वजहों ने गांव के रंग में भंग डाला है। त्योहारों पर अब वह मेलजोल नहीं रहा। लोग अपने तक सीमित हो चले हैं। गांव में पहुंचे टीवी और मोबाइल ने भी आपस के मेलजोल को औपचारिकताओं तक सीमित कर दिया है। एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने की सिर्फ औपचारिकता भर रह गई है। गांव में उल्लास नई पीढ़ी से होता है। नई पीढ़ी अब गांवों में बची नहीं है। जिनके पास थोड़ा सा भी पैसा आया वे गांव से रुखसत हो गए, उनके बच्चे भी अब शहरी हैं। गांव में अब न भुजरियां हैं, न होली के रंग हैं, फाग भी फीकी है। दीवाली के दीपकों में भी अब अब निराशा की टिमटिमाहट रहती है। गांव का यह शोकगीत अंतहीन है और निराशा का पहाड़ भी बहुत बड़ा है। इसलिए क्या लिखूं और क्या छोड़ दूं।
खुदातपुरा, माधौगढ़, जिला जालौन, उत्तर प्रदेश
शिवमंगल सिंह
(वरिष्ठ पत्रकार,राजस्थान पत्रिका में डिप्टी न्यूज एडिटर)

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