November 15, 2018

आलू की फसल को झुलसा रोग व माॅहू कीट से बचायें

amitesh-new-32अमितेश सिंह
गाजीपुर: समोसे का स्वाद लेना है तो आलू तो चाहिए ही। आपको आलू का स्वाद मिलता रहे इसके लिए हमारे किसान भाई जी तोड़ मेहनत करते हैं। आलू हर घर का प्रमुख सब्जी है। लेकिन उनकी मेहनत के बावजूद कभी आलू की फसल को पाला मार जाती है तो कभी झुलसा रोग। किसान भाई अपनी आलू की फसल को झुलसा रोग से कैसे बचायें इसके लिए कृषि विज्ञान केन्द्र, पी.जी. कालेज, गाजीपुर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डाॅ. आर.पी. सिंह ने जिले के किसानों को आलू की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग झुलसा से सावधान रहने और समय पर इसके निदान की सलाह दी है।

potato-photo-1क्या है रोग के लक्षण
इस संबंध में डॉ आर पी सिंह कहते हैं कि आलू की फसल में अगेती व पिछेती रोग का प्रकोप अधिक होता है। यह दोनों रोग एक प्रकार के फफूॅंद से होता है। अगेती झुलसा रोग की शुरूआत एवं इसकी तीव्रता प्रायः फसल में नत्रजन, फाॅस्फोरस व पोटाश की मात्राओं के असंतुलित प्रयोग से प्रभावित हेाता है। इस रोग के लक्षण सबसे पहले निचली पत्तियों पर दिखायी देते हैं तथा बाद में उपर की पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के गोलाकार धब्बे पड़ जाते हैं। रोग की उग्रता बढ़ने पर रोगी पौधे झुलस कर, सुखकर मर जाते हैं। पिछेती झुलसा रोग के लक्षण सबसे पहले पत्तियों के किनारें व सिरे पर तथा तनों पर हल्के भूरे, बैंगनी रंग के जलसिक्त धब्बों के रूप में दिखायी पड़ते हैं। जब वातावरण का तापमान 10-20 डिग्री सेल्सियस हो, आर्द्रता 80 प्रतिशत से अधिक हो, बदली छायी रहे तथा रूक-रूक कर बूॅदाबादी पड़ रही हो या कोहरा छाया हो तो इस रोग का फैलाव तीव्रता से हेाता है।
कैसे करें पहचान
डॉ सिंह का कहना है कि रोग की तीव्रता बढ़ने पर धब्बे बीच में काले या गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं जो लम्बाई में बढ़कर चारो ओर फैल जाते हैं और पौधा कुछ ही दिनों में मर जाता है। रोगग्रस्त एवं गल रहे पौधों से एक प्रकार की दुर्गन्ध आती है। दूर से ऐसा लगता है जैसे फसल में आग लगा दी गयी हो। इसकी रोकथाम में देरी होने पर यह फफूॅंद कंद तक पहुॅंचकर सड़न पैदा कर देता है, जिससे उत्पादन घट जाता है।

scientist-photo-potato-02क्या है निदान
उन्होंने बताया कि आलू की फसल अगेती व पिछेती झुलसा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है इसलिए इस रोग का समय से, उचित प्रबंधन उपाय अपनाकर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए बुआई से पूर्व खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें तथा फसल अवशेषो को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए।  इसके लिए जो प्रजातियां अनुशंषित की गयी हैं जैसे-कुफरी ज्योति, कुफरी नवीन, कुफरी सिन्दुरी, कुफरी आनन्द, कुफरी जवाहर, कुफरी चिपसोना-1 व 2 आदि की बुआई करनी चाहिए। बुआई से पहले कंद उपचार एगलाल या डाईथेन एम.-45 के 0.25 प्रतिशत घोल में 5-10 मिनट या ट्राइकोडर्मा पाउडर की 5-10 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के घोल में 20-25 मिनट तक करना चाहिए। जब फसल 6 सप्ताह की हो जाय तो डाईथेन एम.-45 की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब स,े अथवा कैब्रियोटाॅप 1.5 ग्राम या एक्रोबेट 1.5 से 2.0 ग्राम या मेटिराम 4 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से  घोल बनाकर सुरक्षात्मक छिड़काव अवष्य करना चाहिए। खड़ी फसल में झुलसा के लक्षण दिखते ही 15-15 दिनों के अन्तराल पर मेटालैक्सिल (रीडोमिल) अथवा कैब्रियो टाॅप की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल तैयार कर छिड़काव करना चाहिए अथवा काॅपरहाइड्राक्साईड की 3 ग्राम/लीटर पानी अथवा सिक्सर 2 ग्राम/लीटर पानी अथवा क्यूरेट गोल्ड  1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी अथवा मेलोडी 4 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। ध्यान रहे यदि मौसम में नमी तथा बादल रहे तो छिड़काव का अन्तर 6 दिन कर देना चाहिए। यदि रोग की प्रचण्डता 75 प्रतिशत से अधिक हो तो तनों को काटकर गड्ढ़ों में दबा देना चाहिए। आलू के फसल के पास टमाटर, मिर्च, बैंगन, तम्बाकू की फसलें नहीं लगानी चाहिए। क्योंकि ये फसलें रोग की परपोशी होती हैं।
मॉहू कीट से फैलता है मोजैक रोग
आलू की फसल में मोजैक रोग का प्रसार माॅहू कीट के द्वारा होता है। इस रोग में पत्तियों पर हरी-पीली धारियाॅं पड़ती हैं और पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है तथा आलू भी छोटे आकार के पड़ते हैं। पत्तियाॅं मुड़ जाती हैं और पौधे की बढ़वार कम हो जाती है इसलिए माॅहू कीट का प्रकोप होने पर डाईमेथियोएट अथवा मिथाईल-ओ-डिमेटाॅन की एक लीटर मात्रा 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। पानी की अनुपलब्धता होने पर मिथाईल पैराथियाॅन  2 प्रतिशत या मैलाथियाॅन 5 प्रतिशत या कार्बारिल 10 प्रतिशत चूर्ण की 20-25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सुबह या शाम को भुरकाव करना चाहिए। यदि किसान भाई उपरोक्त तरीके से  प्रबंधन कार्य करते हैं तो आलू से अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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